पीएम केयर्स फंड को स्वतंत्र ऑडिटर से ऑडिट कराएगी सरकार, ऐसे होगी नियुक्ति
नई दिल्ली। कोरोना को लेकर बनाए गए पीएम केयर फंड को लेकर सवाल उठ रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि जब देश में प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष मौजूद था, तो एक नए फंड की जरूरत क्यों पड़ी? अब खबरें आ रही हैं कि, सरकार पीएम केयर फंड को स्वतंत्र ऑडिटरों से ऑडिट करवाने पर विचार कर रही है। इन ऑडिटर्स की नियुक्ति फंड के ट्रस्टियों द्वारा की जाएगी। जिनमें खुद पीएम नरेंद्र मोदी भी शामिल हैं।

नए फंड को फॉरेन कॉन्ट्रिब्यशून रेगुलेशन एक्ट से भी मिली छूट
इकनॉमिक टाइम्स में छपी खबर के मुताबिक, सरकार ने निर्धारित किया है कि पीएम-कार्स फंड का ऑडिट एक या अधिक योग्य स्वतंत्र ऑडिटर द्वारा किया जाएगा, जिन्हें ट्रस्टी द्वारा नियुक्त किया जाएगा। इस फंड को अब विदेशों से दान के लिए भी खोल दिया गया है। इस नए फंड को फॉरेन कॉन्ट्रिब्यशून रेगुलेशन एक्ट से भी छूट दी गई है। यही नहीं इस फंड में दान करने वाले लोग पीएम-केयर्स फंड के पोर्टल से दान की रसीद भी डाउनलोड कर सकते हैं।

सोनिया गांधी समेत कई नेताओं ने फंड पर उठाए सवाल
बता दें कि, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस सप्ताह के शुरू में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे पत्र में कहा था कि पीएम-कार्स फंड के तहत सभी धनराशि प्रधानमंत्री की राष्ट्रीय राहत कोष में हस्तांतरित करने की मांग की थी। सोनिया गांधी ने कहा था कि, पीएम केयर्स फंड में जमा रकम को पीएम रिलीफ फंड में ट्रांसफर करने से दक्षता, पारदर्शिता, जवाबदेही आएगी और रकम को ऑडिट भी किया जा सकेगा। इसके साथ ही उन्होंने कहा था कि एक ही उद्देश्य के लिए दो फंड तैयार करना क्षमता और संसाधनों को व्यर्थ करने जैसा है। हालांकि सरकार ने दोनों फंडों को एक साथ लाने की मांग को खारिज कर दिया था।
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कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने उठाए सवाल
वामपंथी दलों ने भी पीएम-केयर्स फंड के मुद्दे पर सरकार को घेरते हुए कहा था कि इसमें डोनेशन देने पर प्राप्ति रसीद नहीं मिल पा रही है। इसके अलावा कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने सवाल उठाया था कि आखिर पीएम केयर्स फंड की तरह ही सीएम रिलीफ फंड को कंपनियों के सीएसआर फंड से रकम क्यों नहीं मिल पा रही। वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों ने कहा कि अधिकांश कांग्रेस सीएम द्वारा उठाया गया मुद्दा जुलाई 2013 में यूपीए सरकार द्वारा पारित एक कानून (कंपनी अधिनियम) का परिणाम है, जिसके तहत राज्य सरकार द्वारा स्थापित धन को 'पात्र निधियों' की सूची से हटा दिया गया था जो CSR से मिलती हों।












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