मोदी कैबिनेट में होने जा रहा है बदलाव? इन 2 सीक्रेट घटनाओं ने अचानक बढ़ाई हलचल, BJP फिर से देगी सरप्राइज!

Modi Cabinet Reshuffle: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राजनीति की सबसे बड़ी खासियत यही मानी जाती है कि उनके अगले कदम का अंदाजा लगाना बेहद मुश्किल होता है। कैबिनेट विस्तार हो, संगठन में बदलाव हो या किसी बड़े चेहरे की नई जिम्मेदारी, फैसला तब तक सामने नहीं आता जब तक प्रधानमंत्री खुद उस पर मुहर नहीं लगा देते।

लेकिन पिछले कुछ दिनों में हुए दो अलग-अलग घटनाक्रमों ने एक बार फिर मोदी कैबिनेट में फेरबदल की चर्चाओं को हवा दे दी है। सवाल यही है कि क्या मानसून सत्र से पहले सरकार कोई बड़ा फैसला लेने जा रही है या फिर यह बदलाव कुछ महीने बाद देखने को मिलेगा।

Modi Cabinet Reshuffle

पहला घटनाक्रम: अमित शाह की डिनर डिप्लोमेसी और कश्मीर का कनेक्शन

पहली बड़ी घटना केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से जुड़ी है। उन्होंने हाल ही में इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) के रिटायर्ड डायरेक्टर तपन डेका के लिए एक डिनर होस्ट किया। चौंकाने वाली बात यह रही कि अमित शाह ने खुद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इस डिनर की तस्वीरें शेयर कीं और डेका की जमकर तारीफ की। आम तौर पर खुफिया एजेंसियों के प्रमुखों की विदाई को इतना सार्वजनिक नहीं किया जाता।

इस कदम के बाद कयास लगाए जा रहे हैं कि तपन डेका को जल्द ही कोई बड़ा पोस्ट-रिटायरमेंट रोल मिल सकता है। चर्चा है कि उन्हें जम्मू-कश्मीर की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है, जहां फिलहाल मनोज सिन्हा उपराज्यपाल (LG) की भूमिका में हैं। अगर डेका वहां जाते हैं, तो मनोज सिन्हा की दिल्ली वापसी हो सकती है और उन्हें केंद्रीय कैबिनेट में शामिल किया जा सकता है।

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दूसरा घटनाक्रम: भूपेंद्र यादव के मंत्रालय में अचानक एक्शन और कांग्रेस का हमला

दूसरी घटना पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से जुड़ी है, जिसके मुखिया भाजपा के कद्दावर रणनीतिकार भूपेंद्र यादव हैं। इस मंत्रालय में अचानक एक बड़ा प्रशासनिक बदलाव देखा गया, जहां यादव के चार प्रमुख निजी सहयोगियों (Aides) को उनके पदों से हटा दिया गया। भूपेंद्र यादव सिर्फ एक मंत्री नहीं हैं, बल्कि संगठन में भी उनका कद बहुत बड़ा है। ऐसे में उनके मंत्रालय में इस तरह की हलचल ने सबको चौंका दिया।

इस मुद्दे को लपकते हुए विपक्षी कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने इसे 'गवर्नेंस का फेलियर' करार देते हुए मंत्रालय में एक बड़े घोटाले का आरोप लगा दिया। यह सिर्फ एक रूटीन प्रशासनिक फेरबदल है या किसी बड़ी सियासी उठापटक का संकेत, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन इसने भूपेंद्र यादव को लेकर अटकलें जरूर तेज कर दी हैं।

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मानसून सत्र से पहले बदलाव की कितनी है उम्मीद?

अब सवाल यह है कि क्या यह बदलाव 20 जुलाई से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र से पहले होगा? अंदरूनी सूत्रों की मानें तो इसकी संभावना थोड़ी कम दिख रही है। सरकार का पूरा ध्यान इस समय विधायी कामकाज और बिलों को पास कराने पर है। इसके अलावा पीएम मोदी का शेड्यूल भी काफी व्यस्त है। जानकारों का कहना है कि अगर 20 जुलाई से ठीक पहले नए मंत्रियों को शामिल किया भी जाता है, तो उन्हें संसद सत्र की तैयारी के लिए बहुत कम समय मिलेगा।

हालांकि राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं है। जुलाई 2021 का उदाहरण सबके सामने है, जब मानसून सत्र के बिल्कुल करीब एक बड़ा कैबिनेट रीशफल किया गया था, जिसमें कई सीनियर मंत्रियों की छुट्टी हुई थी और नए चेहरों को मौका मिला था।

नितिन नबीन की नई टीम और 5 राज्यों के चुनाव

पीएम मोदी जब अपने तीन देशों के दौरे से वापस लौटेंगे, तो सबकी नजरें 7, कल्याण मार्ग पर टिकी होंगी। सवाल सिर्फ कैबिनेट का नहीं, बल्कि बीजेपी संगठन का भी है। देश को यह देखना है कि क्या मानसून सत्र से पहले पार्टी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन अपनी नई टीम का ऐलान करेंगे या नहीं।

यह टाइमिंग इसलिए बेहद खास है क्योंकि कुछ ही महीनों में उत्तर प्रदेश सहित पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। एक्सपर्ट्स का मानना है कि जो भी बदलाव होने हैं, वे इन चुनावों से पहले ही होंगे। अगर मानसून सत्र से पहले ऐसा नहीं होता है, तो अगस्त के आखिरी हफ्ते या सितंबर में इसकी पूरी उम्मीद है। इतिहास गवाह है कि पीएम मोदी ने 3 सितंबर 2017 को चातुर्मास के दौरान भी कैबिनेट फेरबदल किया था, यानी धार्मिक काल उनके फैसलों के आड़े नहीं आता।

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संगठन और सरकार के बीच कैसा होगा संतुलन?

पार्टी सूत्रों का कहना है कि जो मंत्री कैबिनेट से हटाए जाएंगे, उन्हें शायद संगठन में जगह न मिले। इसके बजाय, पीएम मोदी संगठन में पुराने और अनुभवी नेताओं को बनाए रख सकते हैं, जबकि राज्यों के कुछ कद्दावर और जमीन से जुड़े नेताओं को बड़ी जिम्मेदारियां दी जा सकती हैं।

भाजपा के इतिहास में यह पहली बार है जब नए अध्यक्ष के चुनाव में लगभग तीन साल का वक्त लगा और नई टीम बनने में छह महीने से ज्यादा की देरी हुई है। इसके बावजूद, नितिन नबीन चुनावी राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड का दौरा अपनी मौजूदा टीम के साथ कर चुके हैं। आरएसएस और बीजेपी के शीर्ष नेताओं के बीच कई दौर की बैठकें हो चुकी हैं और नई टीम पूरी तरह तैयार बैठी है, बस पीएम मोदी की हरी झंडी का इंतजार है।

क्या यूपी और उत्तराखंड में बनेगा नया चुनावी फॉर्मूला?

इस बार बीजेपी एक नया प्रयोग करने की तैयारी में है। सूत्रों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश, गोवा, मणिपुर और उत्तराखंड जैसे राज्यों में मौजूदा मुख्यमंत्रियों के रहते हुए भी पहली बार 'चुनाव प्रबंधन या अभियान समितियां' बनाई जा सकती हैं। इस रणनीति के पीछे का मकसद उन नेताओं को संतुष्ट करना है जो नाराज चल रहे हैं, ताकि चुनावी मशीनरी को और मजबूत किया जा सके।

नितिन नबीन की टीम का पूरा फोकस इन विधानसभा चुनावों पर रहेगा। इसके पीछे एक दूरगामी लक्ष्य भी है। जुलाई 2027 में राष्ट्रपति चुनाव होने हैं, जहां एनडीए को अपनी पूरी ताकत दिखानी होगी।

क्या पीएम मोदी फिर देंगे कोई चौंकाने वाला सरप्राइज?

पीएम मोदी को सरप्राइज देने के लिए जाना जाता है। पिछली बार द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाकर उन्होंने विपक्ष के पिछड़े वर्ग और महिला प्रतिनिधित्व के नैरेटिव को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया था। आज भी राजनीतिक हालात कुछ वैसे ही हैं।

विपक्ष एक बार फिर पिछड़े वर्ग की राजनीति को धार दे रहा है, जबकि सरकार लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण देने का कानून पास कर चुकी है। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि अगला बड़ा सियासी मौका किसी महिला नेता को मिलता है या सामान्य वर्ग के किसी बड़े चेहरे को।

मिशन 2029 की तैयारी: डेलिमिटेशन बिल पर टिकी नजरें

बीजेपी के लिए 2029 के आम चुनावों की तैयारी अभी से शुरू हो चुकी है। पश्चिम बंगाल में जीत के बाद पार्टी अपनी विस्तार नीति को आक्रामक बना रही है। इसकी पहली झलक मानसून सत्र में देखने को मिल सकती है, जहां सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता डेलिमिटेशन अमेंडमेंट बिल (परिसीमन संशोधन विधेयक) को पास कराना है। यह बिल महिला आरक्षण कानून को लागू करने के लिए बेहद जरूरी है।

संसद के समीकरण भी अब बदल चुके हैं। विपक्ष में बिखराव दिख रहा है; कांग्रेस और डीएमके का गठबंधन कमजोर हुआ है, तृणमूल कांग्रेस बंगाल में चुनावी झटके के बाद अंदरूनी दिक्कतों से जूझ रही है, महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की पार्टी टूट चुकी है और शरद पवार के बदले रुख ने नई अटकलों को जन्म दिया है। आम आदमी पार्टी और पंजाब कांग्रेस भी आंतरिक कलह से परेशान हैं।

इन हालातों में सरकार के लिए डेलिमिटेशन बिल पास कराना आसान हो सकता है, जो 2029 की चुनावी बिसात को पूरी तरह बदल कर रख देगा। कैबिनेट में बदलाव और संगठन की नई टीम, इसी मिशन 2029 की बुनियाद रखने के लिए तैयार की जा रही है।

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