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Modi AT 75: धारा 370 से लेकर ऑपरेशन सिंदूर तक रहे कामयाब! बस यहां चूक गए पीएम मोदी

Modi AT 75: 21वीं सदी के सबसे प्रभावशाली नेताओं की जब भी बात होगी, उस लिस्ट में नरेंद्र मोदी का नाम टॉप-10 लोगों में होगा। वे उन नेताओं में से हैं जिन्होंने अपने दम पर एक छोटे से कस्बे से लेकर दिल्ली के 7 लोक कल्याण मार्ग तक की यात्रा कामयाबी के साथ तय की और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के सर्वोच्च पद तक पहुंचे। एक ऐसा देश में जहां कई भाषाएं और हजारों परम्पराएं साथ में तैरती हों वहां सभी जगह अपनी जड़ें मजबूत करना आसान नहीं होता है।

RSS के रास्ते राजनीति में एंट्री

किशोरावस्था में नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी कि RSS से जुड़ गए थे। RSS ने उन्हें संगठन, अनुशासन और नेतृत्व के गुर सिखाए। यही गुण आगे चलकर उनकी राजनीति की नींव बने। मोदी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत RSS प्रचारक के रूप में की। वे लगातार यात्रा करते, स्थानीय समस्याओं को समझते और संगठन को मजबूत करते। उनकी रणनीतिक समझ और मेहनत ने भाजपा का ध्यान खींचा और उन्हें पार्टी में जिम्मेदारियां दी गईं।

Modi AT 75

पहला चुनाव

90 के दशक आते-आते मोदी भाजपा के चुनावी अभियानों के प्रमुख रणनीतिकार बने। वे अपनी योजनाओं, बूथ-स्तर के प्रबंधन और कार्यकर्ताओं से सीधी जुड़ाव के लिए पहचाने जाने लगे। आगे चलकर उन्हें गुजरात का मुख्यमंत्री बनायाा गया। हालांकि वे तब तक विधायक नहीं थे तो इसलिए उनका पहला चुनाव उन्होंने सीएम बनने के बाद उपचुनाव के रूप में गुजरात की राजकोट-2 सीट से लड़ा और आधिकारिक तौर पर विधानसभा के सदस्य बने।

वाइब्रेंट गुजरात और मोदी मॉडल

साल 2001 में आए गुजरात भूकंप और राजनीतिक अस्थिरता के बीच सीएम बने मोदी को उस वक्त प्रशासन का कोई अनुभव नहीं था। लेकिन जल्द ही उन्होंने अपने निर्णयों और काम करने की गति से खुद को एक सशक्त प्रशासक साबित किया। इसके बाद मोदी ने गुजरात में इंडस्ट्रियलाइजेशन, सड़क और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं पर जोर दिया। "वाइब्रेंट गुजरात समिट" जैसे कार्यक्रमों से वे राज्य में भारी निवेश खींचने में सफल रहे।

2004 से 2014

2004 में अटल के कार्यकाल और आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा की हार हुई, 2009 में जब दिग्गज नेता लाल कृष्ण आडवाणी के चेहरे पर चुनाव लड़ा गया तब भी बीजेपी को विपक्ष की कुर्सियां ही नसीब हुईं। फिर साल 2014 में आडवाणी ने खुद को पीछे कर नरेंद्र मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ने का निर्णय लिया। 2011 से तैयारियां शुरू हुईं और पूरे देश का माहौल बदल गया।

2014 का लोकसभा चुनाव भारतीय राजनीति में एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ। जब नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने 282 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया। यह पिछले 30 सालों में पहली बार हुआ जब किसी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिला।

'भारत कैसे हुआ मोदीमय'

किताब भारत कैसे हुआ मोदीमय में पत्रकार संतोष कुमार लिखते हैं कि मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने चुनाव प्रचार को एक नए स्तर पर पहुंचाया। उन्होंने न केवल बड़ी जन सभाओं और डिजिटल प्रचार का इस्तेमाल किया, बल्कि छोटे-छोटे बूथ स्तर पर भी रणनीति बनाई। भाजपा ने अपनी पुरानी "बनिया-ब्राह्मण पार्टी" की छवि तोड़ने की कोशिश की और गरीबी, विकास और जनहित के मुद्दों और कांग्रेस के काल में हुए भ्रष्टाचार के मुद्दों को उठाकर केंद्र में पहुंचे। इसेक अलावा जातीय समीकरणों, ग्रामीण-शहरी मतभेदों और स्थानीय मुद्दों को ध्यान में रखकर अलग-अलग रणनीतियां बनाई गईं।

सीधा फायदा और आत्म-निर्भर भारत

प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने कई महत्वाकांक्षी योजनाएं शुरू कीं, जिनका उद्देश्य आम जनता का जीवन बेहतर बनाना था। इसमें जन-धन योजना के जरिए करोड़ों लोगों को सीधा बैंकिंग से जोड़ा ताकि योजनाओं का पैसा सीधा उनके अकाउंट में पहुंचे न कि किसी दफ्तर के बाबू के पास। इसके अलावा स्वच्छ भारत अभियान ने भी मोदी की छवि को साफ किया।
पूरे देश में घर-घर शौचालय बनवाए गए। वहीं मेक इन इंडिया जैसी नीतियों ने देश के भीतर मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दिया। वहीं उनकी डिजिटल इंडिया स्कीम ने ऑनलाइन मनी ट्रांजेक्शन में पारदर्शिता लाई और पर्स रखने की जरूरत ही खत्म करा दी। इसके अलावा आयुष्मान योजना, आवास योजना जैसी योजनाओं ने नरेंद्र मोदी को पहली बार में ब्रांड मोदी बना दिया।

2019 का चुनाव और आदमकद मोदी

2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 303 सीटों के साथ और भी बड़ी जीत दर्ज की। यहां गठबंधन की जरूरत पूरी तरह खत्म हो चुकी थी। चुनावी नतीजों ने बताया कि ब्रांड मोदी और ज्यादा मजबूत हुआ। इसके बाद पीएम मोदी ने फ्रंट फुट पर खेलना शुरू कर दिया। जिसमें शुरुआत जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को हटाकर की। इसके बाद जम्मू-कश्मीर भारत का पूर्ण हिस्सा बन गया।

इसके अगले साल सीएबी लाकर दूसरे देशों से लोगों को वैध नागरिकता देने पर काम किया। साथ ही चीन से टक्कर लेने के लिए आत्मनिर्भर भारत अभियान की शुरुआत की। मोदी सरकार ने इस दौरान बड़े पैमाने पर हाईवे, बंदरगाह, मेट्रो, एक्सप्रेसवे जैसी परियोजनाओं पर बड़ा निवेश किया। मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने पार्टी संगठन को बेहद मजबूत बनाया। जिसके लिए में बूथ स्तर तक पहुंच बनाने के लिए डेटा और सर्वे का इस्तेमाल किया गया।

मोदी और वैश्विक राजनीति

11 सालों में मोदी ने भारत को वैश्विक राजनीति में मजबूत आवाज के रूप में स्थापित किया। G20, BRICS, QUAD, COP और आसियान जैसी समिट्स में उनकी सक्रिय मौजूदगी, रणनीति ने भारत का एक बैंचमार्क सेट किया और आलम ये हुआ कि भारत और मोदी दोनों नाम इंटरनेशनल पॉलिटिक्स में चर्चा में रहने लगे। इसका असर तब और गहरा हुआ जब भारत ने सितंबर 2023 में G20 समिट की अध्यक्षता की। इसके अलावा उनके विदेशों के दौरे और उन दौरों के दौरान उन्हें मिले उन देशों के सर्वोच्च सम्मानों ने भी खूब सुर्खियां बटोरी।

24 में कहां हुई चूक?

सफलता और असफलता एक ही सिक्के के दो पहलू हैं जहां बड़ी तादाद में सफलताएं मोदी के खाते में चढ़ी हैं तो वहीं कुछ ऐसे मामले भी हैं जहां या तो नीति निर्माताओं के कारण, या पार्टी के नेताओं के कारण पीएम मोदी की छवि को झटका भी लगा है।

इसमें किसान आंदोलन, आर्थिक मंदी, महंगाई और रोजगार के मुद्दों पर उन्हें घेरा भी गया और विपक्ष ने इन मुद्दों को खूब उछाला। शायद यही कारण है कि उन्हें 2024 में पीएम बने रहने के लिए गठबंधन का सहारा लिया।

इस विश्लेषण पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट में बताएं।

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