Mizoram Election: क्या है ग्रेटर मिजोरम की मांग, जिसपर सत्ताधारी MNF ने चला है दांव?
मिजोरम विधानसभा चुनाव के लिए 7 नवंबर यानि मंगलवार को मतदान होना है। पूरे चुनाव प्रचार अभियान के दौरान पड़ोसी राज्य मणिपुर की जातीय हिंसा को खासकर सत्ताधारी मिजो नेशनल फ्रंट (MNF) और राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी जोराम पीपुल्स मूवमेंट (ZPM) ने बड़ा मुद्दा बनाया है। इसके चलते बीजेपी मुख्य तौर पर निशाने पर रही है।
चुनाव में कड़े मुकाबले को देखते हुए एमएनएफ ने एक बार फिर से ग्रेटर मिजोरम की मांग को हवा देने की कोशिश की है। यह एक तरह से जो (Zo) एकीकरण की मुहिम है, जो जातीय आधार पर बहुत बड़े क्षेत्र को एक प्रशासनिक दायरे में लाने का मंसूबा रहा है।

ग्रेटर मिजोरम क्या है?
दरअसल, मिजोरम के मिजो (Mizos), मणिपुर के कुकी-जोम (Kuki-Zo) और म्यांमार एवं बांग्लादेश के चिन (Chins)समुदाय खुद को एक ही जाति समूह के मानते हैं। इनकी संस्कृति, धर्म, परंपरा एक तरह की है और यह समान वंश से निकले हुए माने जाते हैं। सैद्धांतिक तौर पर ये समुदाय भारत और उसके बाहर के जिन क्षेत्रों में रहते हैं, उसे मिलाकर एक ग्रेटर मिजोरम की परिकल्पना की गई है।
एमएनएफ का वादा
एमएनएफ ने अपने घोषणा पत्र में दोबारा सरकार बनने पर एक प्रशासन के तहत जोफा (Zofa या Zohnahthlaks) या जो समुदाय से जुड़े लोगों को एकजुट करने का वादा किया है। घोषणापत्र में वादा किया गया है कि संबंधित देशों में बिखरे हुए जोफा को संयुक्त राष्ट्र के 2007 के मूल निवासियों के अधिकारों की घोषणा के मुताबिक 'उच्च अधिकार' वाली एक सरकार के तहत एकजुट किया जाएगा।
एमएनएफ का एजेंडा
तथ्य यह है कि मणिपुर में शुरू हुए जातीय संघर्ष के बाद से करीब 12 से 13 हजार कुकी-जो समुदाय के लोग शरणार्थी बनकर मिजोरम में डेरा डाले हुए हैं। वहीं फरवरी 2021 में जब म्यांमार में सैन्य विद्रोह हुआ था, तब से करीब 35,000 म्यांमारी (चिन समुदाय) भी राज्य में शरण लिए हुए हैं। इसी तरह से बांग्लादेश के चटगांव पहाड़ी से भी करीब 1,000 लोग मिजोरम में शरणार्थी बनकर रह रहे हैं। एमएनएफ का कहना है कि ये सारे लोग उनके भाई हैं और उनके दुख-दर्द में मिजोरम आंखें मूंदकर नहीं रह सकता।
मणिपुर की घटनाओं ने दिखाया रास्ता
गौरतलब है कि मणिपुर हिंसा के दौरान कुकी समुदाय के 10 विधायकों (7 बीजेपी) और कई कुकी संगठनों ने अपने लिए अलग प्रशासन की मांग तेज कर दी थी। मिजोरम के मुख्यमंत्री और एमएनएफ के प्रमुख जोरमथांगा ने हाल में अपने पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा था कि 'मणिपुर में जातीय मिजो भाई अब एक अलग प्रशासन की मांग कर रहे हैं, जो फिर से एकीकरण पाने का रास्ता दिखा रहा है।' हालांकि, उन्होंने कहा था कि इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत आगे बढ़ना चाहिए।
इससे पहले 19 मई को उन्होंने ग्रेटर मिजोरम या मणिपुर के निकटवर्ती क्षेत्रों के एकीकरण पर अपना रुख साफ करते हुए कहा था, 'इस समय म्यांमार और बांग्लादेश के 'जो' जनजाति निवास स्थलों का एकीकरण मुश्किल होगा......मणिपुर, असम और त्रिपुरा जैसे भारतीय राज्यों में रहने वाले जातीय मिजो क्षेत्रों का एकीकरण एमएनएफ की ओर से हर समय प्रस्तावित किया गया है...'
वहीं, मिजोरम की मुख्य विपक्षी पार्टी जेडपीएम भी इसी तरह से जो-एकता की वकालत करती है। इसके अध्यक्ष लालदुहोमा ने कहा है,'हमारा दृष्टिकोण ये है कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब सभी जो-लोगों को एक ही प्रशासनिक इकाई के अंदर रखा जाएगा - यह हमारा मिशन है.....भारतीय संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत यह संभव है।'












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