‘मर्सल’ के मैदान में बीजेपी को लगा रजनीकांत स्टाइल झटका
तमिल फिल्म ‘मर्सल' पर मर्दानगी दिखाने में बीजेपी उतनी ही कमजोर पड़ती दिख रही है जितनी कि दक्षिण में बीजेपी की असली ताकत है। क्योंकि ‘मर्सल' ने ‘बाहुबली' को भी पछाड़ दिया है। तमिलनाडु में बीजेपी के अध्यक्ष तमिलसाईं सुंदरराजन पर नामचीन फिल्मी हस्तियों ने जोरदार हमले करने शुरू कर दिये हैं।
नई दिल्ली। तमिल फिल्म 'मर्सल' पर मर्दानगी दिखाने में बीजेपी उतनी ही कमजोर पड़ती दिख रही है जितनी कि दक्षिण में बीजेपी की असली ताकत है। क्योंकि 'मर्सल' ने 'बाहुबली' को भी पछाड़ दिया है। तमिलनाडु में बीजेपी के अध्यक्ष तमिलसाईं सुंदरराजन पर नामचीन फिल्मी हस्तियों ने जोरदार हमले करने शुरू कर दिये हैं। इस फेहरिस्त में बॉलीवुड से लेकर दक्षिण के सिनेमा के सुपरस्टार भी शामिल हैं।


'मर्सल' से आई 'आंधी' फिल्म की याद
‘मर्सल' विवाद से मुझे गुलजार निर्देशित फिल्म ‘आंधी' की याद आ गई। जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी या उसकी सत्ता पर कोई टिप्पणी नहीं थी, केवल एक महिला राजनेता को सिल्वर स्क्रीन पर शराब और सिगरेट पीते हुये दिखाया जाना तत्कालीन कांग्रेस पार्टी के नेताओं को रास नहीं आया। पहले तो उस दृश्य को सेंसर किया गया, फिर बाद में सुचित्रा सेन में इंदिरा गांधी की छवि और हाव-भाव की समानता को देखते हुए फिल्म के प्रदर्शन पर रोक लगा दी गई। ऐसी घटनाएं इकलौती नहीं हैं। ऐसी तमाम फिल्में जो सेंसर से पास हो चुकी थीं, लेकिन राजनीतिक दबाव के चलते उनको विवाद झेलना पड़ा।

शिवसेना का काम कर रही है बीजेपी!
पहले जो काम केवल शिवसेना करती थी, अब वही बीजेपी कर रही है। लेकिन दिलचस्प बात तो यह कि इससे फिल्म के बिजनेस पर कोई असर नहीं हुआ। यही हाल ‘मर्सल' का भी है। विवाद जितना गहराता गया, उससे फिल्म को उतना ही फायदा होता गया। एक सौ तीस करोड़ के बजट वाली यह फिल्म पिछले तीन दिन में ही सौ करोड़ का बिजनेस कर चुकी है। यानी कमाई के मामले में यह ‘बाहुबली' से भी आगे निकल गई तो भला बीजेपी के सुंदरराजन के रोके कैसे रुकने वाली है!

रजनीकांत ने की 'मर्सल' फिल्म की तारीफ
तमिल सिनेमा के ‘थलाइवा' कहे जाने वाले रजनीकांत ने ‘मर्सल' विवाद के बावजूद अभिनेता विजय की पीठ थपथपाई है। और फिल्म में विवादित जीएसटी वाले डायलॉग को गलत नहीं बताया है। गौरतलब है कि बीजेपी को रजनीकांत से बहुत उम्मीद रही है लेकिन फिलहाल रजनीकांत ने बीजेपी को अपने ही स्टाइल में झटका दे दिया। रजनीकांत ने ट्वीट किया "बेहद जरूरी मुद्दे पर बात रखी गई है। वेल डन। मर्सल टीम को बधाई।" उधर ‘दशावतारण' जैसी फिल्म बनाने वाले कमल हासन ने तो यहां तक कहा कि "जो फिल्म पहले ही सेंसर बोर्ड से पास हो चुकी है उसे पोलिटिकल पार्टी री-सेंसर ना करें। आलोचना तार्किक होनी चाहिए। आलोचकों की जुबान को चुप किया जाना ठीक नहीं। भारत तभी चमकेगा जब उसे अभिव्यक्त करने का मौका मिलेगा।" बिहारी बाबू और बीजेपी के वरिष्ठ नेता शत्रुघ्न सिन्हा ने तो यहां तक कह दिया कि "जीएसटी और नोटबंदी का विरोध करने का यह मतलब नहीं कि वे देशद्रोही हो गये।" फरहान अख्तर तो बीजेपी प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा पर इसलिये भड़क गये क्योंकि नरसिम्हा ने यह कह दिया था कि फिल्मवालों को राजनीतिक जानकारी नहीं होती है।

फिल्म में के GST पर डायलॉग को लेकर विवाद
दरअसल अटल्ली द्वारा निर्देशित और विजय द्वारा अभिनीत इस फिल्म के कुछ दृश्य और संवाद पर तमिलनाडु बीजेपी के अध्यक्ष तमिलसाई सुंदरराजन ने आपत्ति जताई थी। उनका कहना था जीएसटी और डिजिटल इंडिया के बारे में फिल्म में मौजूद सीन और संवाद से लोगों को गलत जानकारी दी जा रही है। यह सुंदरराजन की अपनी राय थी। जाहिर है कोई भी सत्ताधारी पार्टी के नेता अपनी सरकार की नीतियों अथवा योजनाओं का विरोध या मजाक बर्दाश्त नहीं करना चाहते, लेकिन सेंसर बोर्ड जैसी संस्था द्वारा पास की हुई फिल्म के संवाद और दृश्य को निकलवाने का दबाव बनाना किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता। क्योंकि सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष भी कोई गैर नहीं। पहलाज निहलानी भले गये लेकिन अब वहां प्रसून जोशी आसीन हैं। क्या बीजेपी को प्रसून जोशी की बुद्धिमत्ता पर भरोसा नहीं है? इस विवाद से यह कैसे न कहा जाये कि सत्ता में रहते हुये जो काम पहले कांग्रेसी नेता कर चुके हैं, वही काम अब सत्ता मिलने के बाद बीजेपी के नेता भी कर रहे हैं।

कांग्रेस से कैसे अलग हुई भाजपा?
गौरतलब है कि सिनेमा कभी भी सत्ता का चितेरा नहीं रहा है, लेकिन हाल के सालों में कई नामचीन सितारों की ऐसी बहुत सी फिल्में आईं हैं, जो सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार और सत्ता सुविधा या नजदीकी हासिल करने के मक़सद से बनाई गई हैं। ऐसे में किसी फिल्म में रचनात्मक स्तर पर जरा-से कटाक्ष की ‘नसबंदी' करने की खतरनाक प्रवृति शुरू हो गई है। ‘नसबंदी' और ‘किस्सा कुर्सी का' जैसी फिल्में याद है न! उनका क्या हश्र किया गया था? तो बीजेपी आखिर कांग्रेस से अलग कैसे हो गई, जिसे अब अपने ऊपर किया गया कटाक्ष बर्दाश्त नहीं हो रहा है! हालांकि पूरी मामले पर मधुर भंडारकर ने यह कहकर विरोधियों को आड़े हाथ लिया कि मेर्सल का विरोध करने वाले इंदु सरकार के वक्त चुप क्यों थे?
तो यानी कि सत्ता चाहे जब जिसकी हो, फिल्मकार केवल भजन लिखे और कीर्तन गाये?












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