हिंसक हुए संत रामपाल के समर्थकों में ज्यादातर ने उन्हें देखा तक नहीं
नई दिल्ली (विवेक शुक्ला)। संत रामपाल को हरिय़ाणा के बाहर कम ही लोग जानते हैं। हां, उनके समर्थकों और पुलिस के बीच जिस तरह से तनातनी चली, उसके बाद वे अखिल भारतीय स्तर कुख्यात जरूर हो गए। पर कोई इस बात से इंकार नहीं कर सकता कि उनके समर्थक बहुत बड़ी तादाद में हैं। उनमें दलितों की संख्या खासतौर पर काफी है।

अगर संत रामपाल से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातों पर चर्चा करें तो सबसे अहम यह है कि ज्यादातर लोगों ने न तो उनके दर्शन तक नहीं किये हैं। और तो और न ही वे उनकी अध्यात्म की व्याख्या से परिचित हैं। पर संत रामपाल खुद कहते हैं कि वे हिंदू नहीं हैं और खुद को ही परमेश्वर मानते हैं।
लोकप्रिय तो हैं रामपाल
वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल इस बात को मानते हैं कि संत रामपाल अपार लोकप्रिय हैं। उनके भक्त उनके लिए अपनी जान तक दे सकते हैं। संत परंपरा वैदिक अथवा ब्राह्मण परंपरा नहीं है। संत परंपरा श्रावक व श्रमण परंपरा तथा पश्चिम के सेमेटिक दर्शनों का घालमेल है। पर जो व्यक्ति संत की पदवी पा जाता है उसके भक्त उसको ईश्वर अथवा ईश्वर का दूत मानने लगते हैं। वैदिक परंपरा ईश्वर को नकारती है।
सभी रामपाल के खिलाफ
हिंदुओं के लगभग सभी सेक्ट उनके खिलाफ हैं खासकर आर्य समाज से तो उनकी प्रतिद्वंदिता जग जाहिर है। वे कबीर साहब के आराधक हैं और मानते हैं कि वे इस दुनिया में आने वाले पहले गुरु थे। संत रामपाल के भक्त कोई चतुर, सुजान अथवा अपराधी प्रवृत्ति के नहीं हैं। वे सामान्य मानव हैं और अपने को सताए जाने से दुखी हैं वे किसी आध्यात्मिक शक्ति की खोज में हैं जो उनके कष्ट समाप्त कर सके। संत रामपाल ने उन्हें कोई राह तो दिखाई होगी वर्ना यूं ही कोई इतना लोकप्रिय नहीं हो सकता। पर यहां यह बात मैं जरूर कहूंगा कि भले संत रामपाल ईश्वर हों लेकिन चूंकि वे इस मानवी दुनिया में और वह भी ईश्वर की भूमि कहे जाने वाले भारत में प्रकट हुए हैं इसलिए उन्हें यहां के सारे गुण-दोष मानने पड़ेंगे।
कानून को मानें रामपाल
बहरहाल संत रामपाल को भारतीय संविधान, कानून और नियम सब मानने पड़ेंगे। वे संविधानेतर नहीं हैं। जानकार ठीक ही कहते हैं कि उन्हें भारत की न्यायपालिका पर भरोसा होना चाहिए। तब ही वे अपने को परमेश्वर के रूप में और स्थापित कर पाएंगे।












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