'मैं चैन से जी नहीं पाऊंगा', मालेगांव ब्लास्ट में अपनों को खोने वाले परिवारों का दर्द, सुनकर पिघल जाएगा कलेजा
Malegaon Blast verdict 2025: मालेगांव बम धमाके 2008 के लगभग 17 साल बाद भाजपा की पूर्व सांसद प्रज्ञा ठाकुर समेत सात आरोपियों को एनआईए (NIA) की विशेष अदालत ने बरी कर दिया। यह घटना भीखू चौक पर एक मोटरसाइकिल में रखे बम के फटने से हुई थी। इस घटना में हुई छह मौतों और 100 से अधिक घायल लोगों के परिवारों के लिए यह फैसला एक कड़वा घूंट बनकर रखा गया।
इस फैसले ने कुछ पीड़ित परिवारों की उस उम्मीद को तोड़ दिया जिससे वे अपने प्रियजनों के लिए न्याय पाने की उम्मीद लगाए बैठे थे, जबकि अन्य लोग दो दशक पुराने सदमे को भुलाकर अपनी जिंदगी फिर से शुरू करने की कोशिश में आगे बढ़ गए थे। इस विस्फोट में सबसे ज्यादा प्रभावित 75 वर्षीय निसार बिलाल हुए, जिन्होंने अपने 19 वर्षीय बेटे अजहर को खो दिया। अजहर उन छह मृतकों में से एक था, जिनकी 29 सितंबर 2008 को मालेगांव में मौत हो गई थी।

निसार बिलाल बोले- आज का फैसला विश्वास को पूरी तरह तोड़ गया
इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक 75 वर्षीय निसार बिलाल आज भी अपने 19 वर्षीय बेटे अजहर की तस्वीर सीने से लगाए रखते हैं। अजहर वह कुरान का छात्र और फ्रिज मैकेनिक बनने की तैयारी कर रहा था। मस्जिद से घर लौटते वक्त उसने रोज के रास्ते के बजाय एक दूसरा रास्ता चुना, लेकिन यह फैसला उसकी जिंदगी का आखिरी फैसला बन गया। धमाके से उड़े लोहे के टुकड़े उसके शरीर में धंस गए और उसकी मौके पर ही मौत हो गई।
उस दिन के बाद से निसार बिलाल ने केस की पैरवी में कोई कसर नहीं छोड़ी। महाराष्ट्र एटीएस द्वारा गिरफ्तार किए गए 11 आरोपियों को जब जमानत मिली, तब उन्होंने कोर्ट में कई बार हस्तक्षेप याचिकाएं दायर कीं। सालों तक उन्होंने मुंबई की अदालतों के चक्कर लगाए और उन चंद पीड़ित परिजनों में शामिल रहे जिन्होंने पूरे केस की बारीक निगरानी की और न्याय की उम्मीद नहीं छोड़ी।
निसार बिलाल कहते हैं, ''मेरा मकसद था कि हमारे शहर पर हमेशा इसी विश्वास को बनाए रखा जाए कि न्याय संभव है। आज का फैसला उस विश्वास को पूरी तरह तोड़ गया।"
लियाकत शेख बोले- 'अब में कभी भी चैन से जी नहीं पाऊंगा।'
एक और लगातार सक्रिय कार्यकर्ता 67 वर्षीय लियाकत शेख हैं, जो विस्फोट की सबसे छोटी पीड़िता 10 वर्षीय फरहीन शेख के पिता हैं, जो नाश्ता खरीदने के लिए बाहर गई थी और उसकी मौत हो गई थी।
लियाकत शेख ने कोर्ट के फैसले पर कहा, ''अब फैसला सुनकर हमारे भीतर एक गहरा दर्द है। मेरी जिंदगी का आखिरी पड़ाव है-और इस फैसले ने कह दिया कि शायद मैं कभी चैन से नहीं जी पाऊंगा।''
रेहान शेख की कहानी
जहां एक ओर शेख और बिलाल जैसे परिजन 2008 मालेगांव ब्लास्ट केस में लगातार न्याय की लड़ाई में जुटे रहे, वहीं कई अन्य परिवारों ने अपनी पीड़ा को किस्मत मानते हुए अपने जीवन की रोजमर्रा की जद्दोजहद को प्राथमिकता दी। ऐसा ही एक परिवार है रेहान शेख का।
38 वर्षीय रेहान शेख के पिता, 42 वर्षीय शेख रफीक ब्रेस, उस धमाके में मारे गए थे। रेहान बताते हैं कि पिता की गैरमौजूदगी और मां की बीमारी ने उन्हें बहुत कम उम्र में काम करने के लिए मजबूर कर दिया। आज वे मालेगांव से मुंबई और वापस मालेगांव के बीच चलने वाली बस में कंडक्टर हैं।
रेहान याद करते हैं कि उनके पिता एक ड्राइवर थे और रोज की तरह उस दिन भी रात के खाने के बाद पान खाने निकले थे, लेकिन किस्मत ने उनकी जिंदगी छीन ली। धमाके ने न सिर्फ उनके पिता को उनसे छीना, बल्कि उनका बचपन भी छीन लिया। परिवार की जिम्मेदारियां इतनी जल्दी आ गईं कि उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी और काम पर लगना पड़ा, ताकि बीमार मां और बुज़ुर्ग नाना-नानी का सहारा बन सकें।
रेहान कहते हैं, ''विस्फोट ने सिर्फ मेरे पिता को ही नहीं छीना, मेरी मासूमियत और आजाद जिंदगी भी उसी दिन खत्म हो गई थी।''
रेहान शेख बताते हैं, ''रिश्तेदारों ने हमें अकेला छोड़ दिया। पिता की मौत के बाद मुझे अपनी बीमार मां और नाना-नानी की देखभाल करनी पड़ी। ऐसे हालात में केस को ठीक से फॉलो करने का वक्त ही नहीं मिला।''
उस्मान खान बोले- ये फैसला हमारे लिए बहुत दुखद है
इसी तरह का एक और प्रभावित परिवार था 23 वर्षीय इरफान खान का। इरफान एक ऑटो चालक थे और 2008 के मालेगांव विस्फोट में घायल होने के दो दिन बाद उनकी मौत हो गई थी। उनके चाचा, उस्मान खान, जो एक पावरलूम चलाते हैं, बताते हैं, ''इरफान की मौत ने हमारे पूरे परिवार को तोड़कर रख दिया।''
उस्मान खान कहते हैं कि वे कोर्ट की कार्यवाही को हर दिन फॉलो तो नहीं कर पाए, लेकिन अब जब अदालत का फैसला आया है, तो दिल टूट गया है। उन्होंने कहा, ''हम जरूर चाहते थे कि जो लोग इस धमाके के जिम्मेदार हैं, उन्हें सजा मिले। भले ही हम हर सुनवाई में न पहुंच पाए हों, लेकिन यह फैसला हमारे लिए बहुत दुखद है।''
उस्मान ने कहा, ''मेरा भतीजा दो दिन तक तड़पता रहा और फिर दुनिया छोड़ गया। जाहिर है, हम चाहते थे कि उसके साथ जो हुआ, उसके गुनहगारों को भी वही दर्द महसूस हो।''
हारून शाह का परिवार अब भी दर्द में
2008 मालेगांव ब्लास्ट के सबसे बुजुर्ग शिकार 60 वर्षीय हारून शाह का परिवार भी अब तक उस दर्द से उबर नहीं पाया है। अपनी उम्र के बावजूद हारून शाह मजदूरी करते थे। धमाके के बाद 12 दिनों तक जिंदगी और मौत से जूझने के बाद उन्होंने दम तोड़ दिया।
आज करीब दो दशक बाद, उनके बेटे हुसैन शाह और पोते आमिन शाह मालेगांव के एक बड़े स्कूल के बाहर सैंडविच बेचकर अपना गुजारा करते हैं। उस वक्त आमिन की उम्र महज 14 साल थी। उन्हें अपने जल चुके दादा की देखभाल करनी पड़ी, जबकि उनके पिता हुसैन एक मिस्त्री का काम करते थे।
आमिन शाह बताते हैं, ''मेरे दादा ने बहुत पीड़ा में दम तोड़ा। उनकी पूरी देह जल चुकी थी, सिर्फ दाढ़ी के नीचे थोड़ी-सी त्वचा बची थी। उनके जले हुए शरीर की बदबू से मुझे खुद बुखार आ गया था। मैं बीमार पड़ गया था। मुझे उम्मीद थी कि जिन्होंने ये सब किया, उन्हें एक दिन इंसाफ के कटघरे में खड़ा किया जाएगा।''
इन परिवारों की कहानियां केवल दर्द की नहीं, बल्कि उम्मीद, न्याय और जिंदगी की लड़ाई की कहानी भी हैं। यह फैसला -न्याय की प्रतीक्षा को खत्म करता हुआ एक जख्म जैसा है, जो उनके दिलों में आज भी ताजा है।
पूर्व बीजेपी सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर
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