लोकसभा चुनावों से पहले बीजेपी ने अजित पवार के सामने घुटने क्यों टेके? 'त्याग' के पीछे है बड़ी मजबूरी

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा था कि तीन पार्टियों की गठबंधन सरकार में बड़े भाई होने के नाते बीजेपी को त्याग के तैयार रहना होगा। एक दिन बाद ही पार्टी के कोटे से मंत्री और वरिष्ठ नेता चंद्रकांत पाटिल को अपने ही क्षेत्र में आसमान से जमीन पर उतरने को मजबूर कर दिया गया।

पाटिल पुणे से एमएलए हैं, लेकिन उन्हें हटाकर जिले के संरक्षक मंत्री (guardian minister) की जिम्मेदारी डिप्टी सीएम अजित पवार को सौंप दी गई है। पुणे के संरक्षक मंत्री के तौर पर पाटिल ने जिला योजना और विकास समिति से मई महीने में ही यहां के लिए 400 करोड़ रुपए का प्रोजेक्ट पास कराया था।

 maharashtra bjp and ajit pawar

अजित पवार का महाराष्ट्र सरकार में बढ़ता जा रहा है दबदबा
लेकिन, अजित पवार के सरकार में आते ही पुणे में उनकी सुनने वाला कोई नहीं रह गया था। सबकुछ डिप्टी सीएम ने अपने नियंत्रण में ले लिया था। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली शिवसेना-बीजेपी और एनसीपी सरकार में अजित पवार ने शामिल होते ही ऐसा जलवा दिखाना शुरू किया कि एक महीने बाद ही उन्होंने अपने मनपसंद वित्त विभाग पर भी कब्जा जमा लिया और भाजपा बड़े 'भाई की जिम्मेदारी' निभाने में लगी रही।

इससे पहले पाटिल पुणे के लिए पास कराई गई योजनाओं के लिए फंड के लिए छटपटाते रहे, लेकिन पुणे में पवार के निर्देश के बिना पत्ता हिलना तक बंद हो गया था। इसके बाद भाजपा के वरिष्ठ नेता ने मुख्यमंत्री शिंदे से लिखित शिकायत तक की, लेकिन अधिकारी पवार से निर्देश लेते रहे। इसके चलते पाटिल और बीजेपी कार्यकर्ताओं को कई बार मायूसी झेलनी पड़ी।

पवार के 9 में से 7 मंत्रियों को बनाया गया संरक्षक मंत्री
बुधवार को सिर्फ अजित पवार को ही उनके मनचाहे जिले का संरक्षक मंत्री नहीं बनाया गया है, एनसीपी के 9 में से 7 अन्य मंत्रियों को भी ऐसी जिम्मेदारी अलग-अलग जिलों के लिए दी गई है। पुणे को पवार की राजनीति का गढ़ माना जाता है। उनके सात मंत्रियों को जो नई जिम्मेदारी मिली है, उसमें पुणे के साथ-साथ कोल्हापुर और बीड जैसे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जिले भी शामिल हैं।

'महाराष्ट्र में अभी बहुत कुछ देखने को है'
राजनीतिक विश्लेषक रविकिरण देशमुख ने 'एक्स'('ट्विटर) पर इसके बारे में लिखा है, 'आखिरकार अजित पवार ने बीजेपी को 9 और एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाली शिवसेना के 3 जिलों की गार्डिअन्शिप में बदलाव के लिए मजबूर कर दिया....।' उन्होंने अगले पोस्ट में लिखा है, '....अभी बहुत कुछ देखने को है, जो सुलझता हुआ दिखता है.....'

अजित पवार की ओर से दिख रहा था 'दबाव'
दिलचस्प बात ये है दो दिन पहले ही मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और डिप्टी सीएम देवेंद्र फडणवीस बड़े नेताओं और केंद्रीय मंत्रियों से मुलाकात के लिए दिल्ली गए थे। लेकिन, अजित पवार उनके साथ नहीं थे। हालांकि, अपनी पार्टी से जुड़े कार्यों में वह पहले की तरह से सक्रिय थे। जानकारी के मुताबिक इससे पहले वे कैबिनेट की एक बैठक में भी नहीं पहुंचे थे। उसके बाद ही जिलों के संरक्षक मंत्रियों के रूप में उनकी पार्टी को 'उपहार' मिला है।

गणपति उत्सव के दौरान केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह मुंबई दौरे पर आए थे। लेकिन, उनके साथ हुई सीएम और डिप्टी सीएम की मुलाकात में भी वे उपस्थित नहीं हुई थे। बाद में उनकी ओर से कहा गया कि वह किसी पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम में व्यस्त थे। यह भी कहा गया कि उनकी व्यस्तता की जानकारी गृहमंत्री के दफ्तर को दे दी गई थी।

एनसीपी-शिवसेना को मिलाकर भी ज्यादा एमएलए हैं बीजेपी के पास
महाराष्ट्र में एनडीए सरकार की ओर से 288 विधायकों वाली विधानसभा में अलग-अलग मौकों पर 210 से 220 एमएलए के समर्थन का दावा किया जाता रहा है। इनमें सीएम शिंदे की शिवसेना के पास पार्टी के कुल 56 में से 40 विधायकों के समर्थन का दावा किया जाता है। जबकि, अजित पवार की अगुवाई वाली एनसीपी के साथ पार्टी के कुल 54 में से 43 विधायकों के समर्थन की बात कही जाती है। वहीं बीजेपी के पास 105 एमएलए हैं।

2024 बीजेपी से जो न करवाए!
महाराष्ट्र सरकार में शामिल शिवसेना और एनसीपी के कुल विधायकों से ज्यादा एमएलए होने के बावजूद बीजेपी अगर छोटे पवार के सामने घुटने टेकने के लिए मजबूर है, तो उसके पीछे राज्य की 48 लोकसभा सीटें हैं। 2024 में भाजपा किसी भी कीमत पर यूपी के बाद सबसे ज्यादा सांसद भेजने वाले महाराष्ट्र पर से पकड़ ढीली नहीं होने देना चाहती है।

2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी (23) -शिवसेना (18) गठबंधन ने राज्य में क्लीन स्वीप किया था। लेकिन, उसके बाद वहां राजनीतिक समीकरण काफी बदल चुके हैं। एनसीपी जो कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ी थी और करीब 16% वोट लाई थी, वह बंट चुकी। वहीं, शिवसेना भी दो फाड़ हो चुकी है। लेकिन, बंटवारा सिर्फ सांसदो और विधायकों का हुआ है। वोटरों में कितना विभाजन हुआ है, इसकी गारंटी देना मुश्किल है।

यही वजह है कि बीजेपी 48 सीटों में से अधिकतर पर तीनों दलों की जीत के हिसाब से चुनावी समीकरण बनाने में जुटी हुई है। अभी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का पहला लक्ष्य लोकसभा चुनाव है और तबतक शायद पवार के ऐसे कुछ और भी मांगों के सामने झुकना उसकी मजबूरी बनी रहेगी!

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