#FarmersMarchToMumbai: महाराष्ट्र में किसान आंदोलन सफल, क्या फल भी मिलेगा?

महाराष्ट्र के वर्तमान किसान आंदोलन को सफल हुआ माना जा सकता है। इसकी वजह ये है कि नासिक से महाराष्ट्र पैदल चलकर आते हुए किसानों ने महाराष्ट्र के लोगों को अपने आंदोलन से कनेक्ट किया है, देश के लोगों की सहानुभूति पायी और महाराष्ट्र की सियासत की तो रंगत ही बदल दी है। बीजेपी को छोड़ दें तो कोई ऐसी पार्टी नहीं है जो इन किसानों के साथ खड़ी नहीं है। बीजेपी भी अपनी सरकार के माध्यम से इस आंदोलन के साथ सहानुभूति दिखाती दिख रही है। इस मायने में किसानों के आंदोलन की जीत हो चुकी है।याद आती है अन्ना आंदोलन की। अन्ना हजारे के नेतृत्व में लोकपाल का आंदोलन भी सफल आंदोलन था।

लोकपाल विधेयक पारित होने के बावजूद राज्यों में लोकपाल अब तक बहाल नहीं हुए हैं। केंद्र सरकार ने इस पर अमल नहीं किया है। भ्रष्टाचार मिटाने का लक्ष्य तो बहुत दूर का सपना है। फिर भी ये आंदोलन सफल इसलिए था कि इस आंदोलन के साथ पूरे देश की सहानुभूति थी और बातचीत तक को तैयार नहीं होने वाली सरकार एक समय बाद सबकुछ मानने को तैयार दिख रही थी। आंदोलन की अपनी सीमाएं होती हैं। यह सफल होकर भी फल हासिल नहीं कर पाती है। क्या महाराष्ट्र आंदोलन भी ऐसा ही होगा? ये बड़ा सवाल है।

जो राजनीतिक दल किसानों के साथ सहानुभूति जता रहे हैं, जो महाराष्ट्र सरकार किसानों की हर बात मानने को तैयार दिख रही है क्या वाकई ऐसा है? अगर ऐसा है तो किसानों की समस्या ही क्यों पैदा हुई? पैदा हुई तो विकराल होती क्यों चली गयी? राजनीतिक दलों में प्राय: सभी प्रमुख राजनीतिक दल महाराष्ट्र की सियासत में हिस्सेदारी कर चुके हैं। फिर भी किसानों का सवाल अनसुलझा क्यों रह गया?

क्या है किसानों की मांग?

क्या है किसानों की मांग?

महाराष्ट्र के किसानों की जो मांगें हैं वो पूर्ण रूप से कर्ज मुक्ति, स्वामीनाथन समिति की सफारिशें लागू करना, सिंचाई के लिए किसानों को पानी उपलब्ध कराना, बिजली बिल की माफी प्रमुख हैं। महाराष्ट्र सरकार ने पिछले साल ऐतिहासिक ऋणमाफी का एलान किया था। 34 हज़ार करोड़ ऋण माफ कर दिए गये थे। पर, ये घोषणा कागजों में ही रही। एक साल बाद भी किसानों पर ऋण का बोझ पड़ा हुआ है। वह बढ़ता जा रहा है।

क्यों हुए किसान नाराज?

क्यों हुए किसान नाराज?

कई कारण हो सकते हैं। इनमें किसानों का डिजिटली साक्षर नहीं होना, बैंक पर काम का बोझ, लालफीताशाही वगैरह..वगैरह। मगर, ऋणमाफी में देरी की वजह से किसान इतने नाराज़ होंगे, ऐसा नहीं लगता। अगर उन्हें भरोसा दिला दिया जाता कि ऋण माफी का मतलब ऋणमाफी। चिन्ता करने की जरूरत नहीं है, तो ऐसी बेचैनी नहीं होती।

सशर्त ऋणमाफी से कम नहीं हुई मुसीबत

सशर्त ऋणमाफी से कम नहीं हुई मुसीबत

दरअसल ऋणमाफी सशर्त थी। डेढ़ लाख रुपये के ऋण सीधे माफ कर दिए गये। जबकि, 6 लाख तक के लोन के लिए यह शर्त थी कि डेढ़ लाख रुपये एकमुश्त देकर ऋण माफ करा लिए जाएं। इसके अलावा उन किसानों को भी फायदा होना था जिन्होंने नियमित किश्तों का भुगतान किया है। उन्हें बाकी किश्तों का एक चौथाई या 25 हज़ार में से जो ज्यादा की रकम होती, उसे माफ कर दिया जाना था।

दिखावा बन कर रह गयी 34 हज़ार करोड़ की ऋणमाफी

दिखावा बन कर रह गयी 34 हज़ार करोड़ की ऋणमाफी

ऋणमाफी की यह प्रक्रिया ही ऐसी थी कि 34 हज़ार करोड़ की ऋणमाफी दिखावा बन गयी। बहुत कम किसान हैं जिन पर डेढ़ लाख से कम का लोन बकाया है। 2009 के बाद यानी 10 साल में 75 हज़ार का ऋण भी डेढ़ लाख पार कर चुका है। अब ज्यादातर किसानों के लिए स्थिति ये हो गयी कि डेढ़ लाख से ज्यादा और 6 लाख से कम के लोन हैं तो वन टाइम सेटलमेंट करो। अब वे डेढ़ लाख रुपये कहां से लाएं? इसलिए किसानों का इस ऋणमाफी पर गुस्सा भड़का। अब किसान चाहते हैं कि ऋणमाफी में कोई शर्त ना हो।

फडणनवीस सरकार के पास साख बचाने का मौका

फडणनवीस सरकार के पास साख बचाने का मौका

महाराष्ट्र सरकार को चाहिए कि इस सफल किसान आंदोलन को फल देकर लौटाएं। पूर्ण ऋणमाफी का एलान उन्हेंसतोष दिला सकता है। अन्यथा महाराष्ट्र सरकार की बातों पर यकीन करना किसानों के लिए मुश्किल होगा। अगर एक भी मांग पर सरकार ने विश्वास दिला दिया तो बाकी मांगों के लिए किसान उन पर जरूर भरोसा करेंगे। देवेंद्र फडणनवीस की सरकार पहल करके तो देखें। उनके सामने अपनी गिर चुकी साख को बचाने का एक मौका है।

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