महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमा विवाद क्या है, सुप्रीम कोर्ट क्यों पहुंचा बेलगावी का मामला ? जानिए
महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमा विवाद 6 दशकों से भी ज्यादा समय से दोनों राज्यों के बीच हिंसक टकराव की वजह बना हुआ है। इस मुद्दे को सुलझाने के लिए पहले की कोशिशों पर अमल नहीं हो पाया है। यह मसला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में है।
Maharashtra-Karnataka border dispute: महाराष्ट्र-कर्नाटक के बीच भाषा के आधार पर जारी विवाद 6 दशक से भी पुराना है। पिछले एक दशक से हर बार ठंड के दिनों में यह मामला फिर से सुलग जाता है। बेलगावी ज्यादा चर्चा में रहता है, क्योंकि कर्नाटक का यह जिला महाराष्ट्र से सटा हुआ है। इसे निपटाने के लिए दशकों पहले सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज की अगुवाई में बने आयोग ने भी अपनी सिफारिशें दी थीं। लेकिन, उसपर कभी अमल नहीं हो पाया। लगभग दो दशकों से तो यह मामला सुप्रीम कोर्ट में भी पड़ा हुआ है। आइए जानते हैं कि बेलगावी सीमा विवाद क्या है ? ठंड के दिनों में यह क्यों सुलगने लगता है ? इसपर राजनीति करने का फायदा अबतक किसने उठाया है ?

महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमा विवाद क्या है ?
महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमा विवाद देश के सबसे पुराने अंतरराज्यीय विवादों में से एक है। यह मामला 6 दशकों से भी ज्यादा समय से चला आ रहा है और बीच-बीच में उबल पड़ता है। अभी महाराष्ट्र और कर्नाटक दोनों जगहों पर बीजेपी की अपनी या गठबंधन वाली सरकारें हैं। इसलिए ताजा विवाद की वजह से पार्टी की परेशानी ज्यादा बढ़ी हुई है। महाराष्ट्र सरकार इस मसले को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंची है। महाराष्ट्र ने राज्य पुर्गठन कानून, 1956 के कुछ प्रावधानों को चुनौती दे रखी है। वह भाषाई आधार पर कर्नाटक के पांच जिलों से 865 गांवों के अपने प्रदेश में शामिल किए जाने की मांग कर रही है। क्योंकि, कर्नाटक का खासकर बेलगावी जिला महाराष्ट्र सीमा से सटा है, इसलिए वहां पर इस बार भी तनाव काफी बढ़ चुका है।

महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमा विवाद कब शुरू हुआ ?
1956 में संसद से पास होकर राज्य पुनर्गठन अधिनियम बना था। तभी से दोनों राज्य अपनी सीमाओं के कुछ गांवों और कस्बों को भाषाई आधार पर अपने क्षेत्र में शामिल किए जाने की मांग को लेकर भिड़ते रहे हैं। यह अधिनियम जस्टिस फजल अली आयोग की सिफारिशों के आधार पर बना था, जिसका गठन 1953 में हुआ था और उसने 1955 में अपनी रिपोर्ट केंद्र को सौंपी थी। 1 नवंबर, 1956 को मैसूर राज्य का गठन हुआ, जिसे बाद में कर्नाटक नाम दिया गया। इसी तरह पड़ोसी बॉम्बे प्रांत को बाद में महाराष्ट्र के नाम से जाना गया। तभी से भाषाई आधार पर इस सीमा विवाद ने तूल पकड़ना शुरू कर दिया। महाराष्ट्र का नजरिया यह रहा है कि कर्नाटक का उत्तरी-पश्चिमी जिला बेलगावी उसका हिस्सा होना चाहिए था। यहीं से हिंसक प्रदर्शन ने जोर पकड़ लिया। इसके लिए महाराष्ट्र एकीकरण समिति का गठन हुआ, जो आज भी जिले के कुछ इलाकों में प्रभावी है।

केंद्र सरकार ने क्या किया ?
इस मामले को लेकर महाराष्ट्र की ओर से तभी से दबाव बनाया जाता रहा है। इसका कोई हल निकालने के लिए तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने 25 अक्टूबर, 1966 को सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस मेहरचंद महाजन की अगुवाई में एक आयोग का गठन किया है। ऐसी उम्मीद थी कि आयोग की सिफारिशें दोनों राज्यों को मान्य होगी और इस विवाद का हमेशा के लिए अंत हो सकेगा। एक साल बाद ही अगस्त, 1967 में आयोग ने अपनी रिपोर्ट केंद्र को सौंप भी दी। आयोग ने कर्नाटक के 264 कस्बों और गांवों को महाराष्ट्र में और महाराष्ट्र के 247 गांवों को कर्नाटक में विलय का सुझाव दिया।

महाजन आयोग की सिफारिशों का क्या हुआ ?
तीन साल तक रिपोर्ट पर बैठे रहने के बाद तत्कालीन केंद्र सरकार ने 1970 में आकर उसे संसद में पेश किया, लेकिन कभी चर्चा शुरू नहीं करवाई। नतीजा ये हुआ कि महाजन आयोग की सिफारिशें संसद की फाइलों में धूल चाटती रह गईं और मराठी भाषी क्षेत्रों को महाराष्ट्र में और कन्नड़ भाषी क्षेत्र को कर्नाटक में शामिल किए जाने की मांग जोर पकड़ती चली गई। महाराष्ट्र एकीकरण समिति ने इसे चुनावी मुद्दा बनाया और बेलगावी के कुछ क्षेत्रों में कई चुनाव भी जीत गई। लंबे समय तक यह मामला राजनीतिक ध्रुवीकरण का हथकंडा बना रहा। लेकिन, 1999 के आसपास एमईएस को हार मिली और वह सीमावर्ती क्षेत्रों में एक भी सीट नहीं जीत सकी।

ठंड में बेलगावी में क्यों बढ़ जाता है तनाव ?
2007 कर्नाटक ने बेलगावी इलाके पर अपने दावे को पुख्ता करने के लिए सुवर्ण विधान सौधा (विधानसभा) का निर्माण शुरू किया। 2012 में बेलगावी में विधानसभा का उद्घाटन हुआ और तब से शीतकालीन सत्र हर साल यहीं पर आयोजित होने लगा। जब भी बेलगावी में विधानसभा सत्र का वक्त आता है, सीमा विवाद फिर से सुलग उठता है। 2021 में भी बेलगावी सत्र के दौरान सीमावर्ती इलाके में हालात विस्फोटक हो गए थे। दोनों राज्य के लोगों की ओर से ऐसी स्थिति पैदा की जाती है, जिससे हिंसा भड़कने की आशंका बढ़ जाती है। इस बार भी यही चिंता है कि कन्नड़ और मराठी भाषी कुछ लोग आग में घी डालने की कोशिश कर सकते हैं। 3 दिसंबर को महाराष्ट्र के दो मंत्री चंद्रकांत पाटिल और शंबुराजे देसाई बेलगावी जाने की तैयारी में हैं। कन्नड़ भाषी लोगों की ओर से ऐसी ही मांग बसवराज बोम्मई सरकार से भी की गई है।

सुप्रीम कोर्ट में कब पहुंचा मामला ?
महाराष्ट्र सरकार ने साल 2004 में राज्य पुनर्गठन कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। इसमें मांग की गई कि कर्नाटक के पांच जिलों के 865 गांवों और कस्बों को प्रदेश में मिला दिया जाए। कर्नाटक के वे 5 जिले हैं- बेलगावी, बीदर, कलबुर्गी, विजयपुरा और कारवार। लेकिन, कर्नाटक सरकार की दलील रही है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत राज्यों की सीमाएं तय करने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट के नहीं, बल्कि सिर्फ संसद को है। वहीं, महाराष्ट्र सरकार दलील देती है कि अनुच्छेदर 131 के तहत केंद्र सरकार और राज्यों के बीच के विवादों में सुप्रीम कोर्ट को सुनवाई का अधिकार है। इस मामले को लगभग दो दशक होने वाला है, लेकिन फिलहाल कोई रास्ता नहीं निकलता दिख पा रहा है। (बेलगावी से संबंधित तस्वीरें-फाइल)












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