79 के पवार ने दिखाया पॉवर, एनसीपी को जिताया ही, कांग्रेस को दुर्गति से उभारा

मुंबई। महाराष्ट्र चुनाव में भले भाजपा शिवसेना को बहुमत मिला हो लेकिन महफिल तो लूट ले गये शरद पवार। 79 साल के पवार ने अकेले दम पर ना केवल अपनी पार्टी को बड़ी जीत दिलायी बल्कि मैदान छोड़ने वाली कांग्रेस में भी नयी जान फूंक दी। शरद पवार ने यह करिश्मा तब किया जब राजनीति पंडित उन्हें चुका हुआ चौहान मान रहे थे। बड़े नेताओं का साथ छोड़ने के बाद भी उन्होंने हौसला बनाये रखा। इसी हौसले के दम पर वे पश्चिमी महाराष्ट्र के अपने मजबूत किले को बचाने में कामयाब रहे। उन्होंने भाजपा को बता दिया कि वह जाहे जितना जोर लगा ले, मराठा राजनीति पर उनकी पकड़ को ढीली नहीं कर सकती। चुनाव के ठीक पहले को-ऑपरेटिव बैंक घोटाला मामले में शरद पवार को आरोपी बनाया गया था। उन्होंने परेशान होने की बजाय इस मामले को अपने हक में भुना लिया। उनकी पार्टी के प्रमुख नेता प्रफुल्ल पटेल का संबंध जब अंडरवर्ल्ड डॉन इकबाल मिर्ची से उजागर हुआ तो राकांपा फिर घिरती नजर आयी। लेकिन पवार ने सभी मुश्किलों को पार करते हुए एक शानदार जीत हासिल की।

79 में भी असरदार

79 में भी असरदार

भाजपा ने शरद पवार को निबटाने के लिए पूरा जोर लगाया था। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के करीब 30 नेता-भाजपा शिवसेना में शामिल हो गये थे। वहां मची भगदड़ को देख यह कहा जाने लगा था कि शरद पवार अब कमजोर पड़ रहे हैं। बढ़ती उम्र को भी कमजोर होने का कारण बताया जा रहा था। कई विश्वस्त सहयोगियों ने उनका साथ छोड़ दिया था। फिर भी पवार अंगद के पांव की तरह जमे रहे। उन्होंने विरोधियों की बातों पर कोई ध्यान नहीं दिया। अकेले ही चुनाव परिक्रमा पर निकल पड़े। उन्होंने 60 से अधिक सभाएं कीं। बुढ़ापे को झुठलाते हुए उन्होंने दिनरात मेहनत की। जिन सीटों पर 2014 में जीते थे उनमें से अधिकांश पर वे जीतने में कामयाब रहे। कुछ नयी सीटों पर भी कब्जा जमा लिया। 2014 में 41 सीटों पर जीते थे तो 2019 में 54 पर पहुंच गये। अपनी जीत का दायरा बढ़ा कर उन्होंने जता दिया कि कामयाबी उम्र से नहीं बल्कि राजनीतिक अनुभव से मिलती है।

बचा लिया किला

बचा लिया किला

शरद पवार बारामती के रहने वाले हैं। बारामती पश्चिमी महाराष्ट्र में है। इस लिए इस क्षेत्र पर शुरू से उनकी पकड़ है। पश्चिमी महाराष्ट्र में पुणे, सोलापुर, सतारा, कोल्हापुर और सांगली जिले आते हैं। ये इलाका उनका गढ़ है। पश्चिमी महाराष्ट्र की 70 विधानसभा सीटों में राकांपा ने सबसे अधिक 28 पर कब्जा जमाया। कांग्रेस को भी 12 सीटें मिलीं। भाजपा को यहां 20 तो शिवसेना को पांच सीटें मिलीं। पिछले लोकसभा चुनाव में पवार ने चार सीटें इसी क्षेत्र से जीती थीं। वे पहले कांग्रेस में थे। 1978 में वे मुख्यमंत्री बने थे। 1999 में उन्होंने सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने का विरोध किया था। कांग्रेस से अलग होकर उन्होंने राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी बनायी थी। तब से राकांपा आज तक इस इलाके की ताकत बनी हुई है। 1999 में उन्होंने विधानसभा का चुनाव लड़ा और 58 सीटों पर जीत हासिल की थी। सरकार बनाने के लिए कांग्रेस को शरद पवार की मदद लेनी पड़ी थी। 20 साल बाद स्थिति ये है कि अब राकांपा ने कांग्रेस को पीछे छोड़ दिया है। पवार ने खुद को सोनिया और राहुल गांधी से बेहतर साबित किया।

कांग्रेस का किया बेड़ा पार

कांग्रेस का किया बेड़ा पार

चुनाव के पहले की कांग्रेस ने हार मान ली थी। कांग्रेस के बड़े नेता सुशील कुमार शिंदे ने अपनी पार्टी और राकांपा, दोनों को थकी हुई पार्टी करार दिया था। लेकिन पवार ने कहा था कि वे 80 साल के जरूर हैं लेकिन 30 साल के किसी नौजवान की तरह एनर्जेटिक हैं। चुनाव के दौरान उन्होंने ये बात साबित भी की। वे रोजाना औसतन पांच बैठकों में शामिल होते थे। कांग्रेस की नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने इस चुनाव को गंभीरता से नहीं लिया था। प्रियंका गांधी स्टार प्रचारकों की सूची में थीं लेकिन वे एकदिन भी महाराष्ट्र नहीं आयीं। राहुल गांधी ने यहां सिर्फ चार रैलियां कीं। संजय निरुपम भी नाराज रहे। तब कांग्रेस की उदासीनता देख कर शरद पवार ने कहा था कि कांग्रेस पार्टी का हर गांव में जनाधार है। कांग्रेस अध्यक्ष का पद कोई भी संभाले लोग कांग्रेस को आदतन फॉलो करते रहेंगे। शरद पवार के इतना कहने से कांग्रेस समर्थकों में भी जोश आ गया। इसकी वजह से बेजान पड़ी कांग्रेस ने भी 44 सीटें जीत लीं। अगर पवार ने जोर नहीं लगाया होता तो कांग्रेस की और दुर्गति हो सकती थी।

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