बिहार में महागठबंधन: फिर जिन्दा होगी कांग्रेस, लौटेगा आरजेडी का जनाधार?

पटना। बिहार में महागठबंधन के महाझंझट का अंत करते हुए आरजेडी नेता तेजस्वी यादव ने इसे 'देर आए दुरुस्त आए' का नाम दिया। महागठबंधन के टूटने की जो लोग आशंका जता रहे थे वे इस बात को समझने की भूल कर रहे थे कि एक-एक सीट और हर सीट पर पर उम्मीदवारी के लिए जो संघर्ष दिख रहा है वो इस वजह से है कि महागठबंधन बनने के कारण जीत की सम्भावनाएं बढ़ गयी हैं। कोई इस लाभ की स्थिति को खोना नहीं चाहता था। लिहाजा सब कुर्बानी के लिए तैयार दिखे।

बिहार: फिर जिन्दा होगी कांग्रेस, लौटेगा आरजेडी का जनाधार?

तेजस्वी महागठबंधन को एक रखने में सफल रहे
महागठबंधन में देखने को जरूर लगता है कि कांग्रेस को नुकसान हुआ या आरजेडी की दादागिरी चली या फिर हम, आरएलएसपी और वीआईपी को ज़रूरत से ज्यादा तवज्जो दी गयी, लेकिन जमीनी सच इससे अलग है। ऐसा होने के पीछे महागठबंधन के स्वरूप को बिगड़ने से रोकने की कोशिश रही। तेजस्वी यादव आखिरकार महागठबंधन को जोड़े रखने में कामयाब रहे।

पप्पू यादव का पेंच बरकरार

पप्पू यादव का पेंच बरकरार

ऐसा नहीं है कि चुनौती विहीन रास्ता तैयार हो गया है। सुपौल पर कांग्रेस की उम्मीदवार रंजीता रंजन चुनाव लड़ेंगी, मगर मधेपुरा से शरद यादव ही महागठबंधन के उम्मीदवार घोषित हुए। रंजीता के पति पप्पू यादव के लिए कोई रास्ता नहीं बन पाया। वे अकेले चुनाव लड़ने पर अगर अड़े रहे, तो इसका मतलब होगा शरद यादव की राह में रोड़े बनना। आरजेडी ने कांग्रेस को इसे रोकने की जिम्मेदारी दी है जिस पर अमल कर पाना कांग्रेस के लिए काफी मुश्किल है। अगर यह काम कांग्रेस कर लेती है, तो महागठबंधन का यह छिद्र भी भर जाएगा। ऐसी स्थिति में सुपौल में आरजेडी के कार्यकर्ता रंजीता रंजन को सहयोग नहीं कर सकेंगे, यह जमीनी स्थिति है। तब महागठबंधन के भीतर दरार और बढ़ने की आशंका रहेगी।

दरभंगा में कीर्ति नहीं, आरजेडी भारी
दरभंगा की सीट को लेकर बीजेपी छोड़कर कांग्रेस में आए कीर्ति आज़ाद दावा कर रहे थे। मगर, आरजेडी ने यह सीट छोड़ने से साफ मना कर दिया। कीर्ति आज़ाद को वाल्मीकिनगर से चुनाव लड़ना होगा। व्यक्तिगत तौर पर कीर्ति के लिए यह मुश्किल है, मगर महागठबंधन की ताकत के साथ उनके लिए यहां से जीतने के आसार दरभंगा के मुकाबले कम नहीं रहेगा। आरजेडी लगातार दरभंगा पर नम्बर वन या टू पर रही थी। इसलिए उसका दावा कीर्ति आज़ाद से भी मजबूत था क्योंकि कीर्ति बीजेपी छोड़ चुके हैं। कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर उनकी ताकत को आंकने की ज़रूरत पर आरजेडी का जोर था। वहीं कीर्ति का दावा अपने दम पर जीता का था जो अतिशयोक्ति या अतिआत्मविशावस है।

शत्रु ने लालू-राहुल दोनों से मिलकर बनाया रास्ता

शत्रु ने लालू-राहुल दोनों से मिलकर बनाया रास्ता

कीर्ति आज़ाद वाली बात ही शत्रुघ्न सिन्हा पर भी लागू होती है। मगर, शत्रुघ्न सिन्हा ने आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद और राहुल गांधी दोनों से मिलकर अपनी उम्मीदवारी को बचाया। आरजेडी व्यक्ति के नाम पर एक जगह पार्टी का दावा छोड़ने को तो तैयार हो गयी, लेकिन एक और सीट पर कुर्बानी देने के लिए वह राजी नहीं हुई।

कांग्रेस ने दी पूर्णिया के लिए औरंगाबाद की कुर्बानी
औरंगाबाद की सीट पर कांग्रेस नम्बर वन या टू पर रही है ठीक उसी तरह जैसे आरजेडी के लिए दरभंगा की सीट रही है। राजपूतों के गढ़ में आरजेडी ने गैरराजपूत उम्मीदवार की रणनीति पर जोर दिया और इस रूप में उसने सहयोगी पार्टी ‘हम' के लिए कांग्रेस से कुर्बानी मांगी। कांग्रेस के भीतर इस मामले में ज़बरदस्त विरोध है। वास्तव में बिहार में कांग्रेस का जो जनाधार बचा रहा है उसमें कुछेक घरानों का योगदान है उनमें से एक है निखिल कुमार का परिवार, जो औरंगाबाद से सांसद भी रहे हैं और राज्यपाल भी रह चुके हैं। कांग्रेस के पास मौका था कि वह पूर्णिया के बदले औरंगाबाद की सीट पर जोर देती और उसे हासिल कर लेती। मगर, पूर्णिया से बीजेपी उम्मीदवार को कांग्रेस ने टिकट के भरोसे ही पार्टी में ज्वाइन कराया था। फिर भी, ये दोनों फैसले महागठबंधन के नजरिए से देखें तो चुनावी सम्भावना को मजबूत करने वाले हैं।

मुंगेर में अनन्त की पत्नी नीलम महागठबंधन उम्मीदवार

मुंगेर में अनन्त की पत्नी नीलम महागठबंधन उम्मीदवार

मुंगेर सीट से बाहुबली अनन्त सिंह बहुत पहले खुद को कांग्रेस का उम्मीदवार बता चुके थे, लेकिन महागठबंधन उनके नाम पर सहमत नहीं था। आखिरकार कांग्रेस ने अनन्त सिंह की पत्नी नीलम देवी के लिए यह टिकट हासिल करने में कामयाब रही। यहां जेडीयू के ललन सिंह को महागठबंधन से तगड़ी चुनौती मिलने वाली है।

कांग्रेस के लिए चुनाव में अच्छे आसार
कांग्रेस ने कटिहार की सीट भी तारिक अनवर के नाम पर हासिल कर ली है। यहां आरजेडी को आपत्ति नहीं थी। किशनगंज कांग्रेस की सिटिंग सीट थी जो उसे दोबारा मिल गयी। सासाराम से मीरा कुमार एक बार फिर चुनाव मैदान में कांग्रेस को जीत दिलाने के इरादे उतर चुकी हैं। इस बार अकेले नहीं, महागठबंधन की ताकत भी उनके साथ होगी। हालांकि यहां महागठबंधन से उन्हें बहुत फायदा नहीं होने वाला है क्योंकि बीजेपी और जेडीयू के एक हो जाने से उनकी मुश्किलें बढ़ गयी हैं।

समस्तीपुर में कांग्रेस विगत लोकसभा चुनाव बहुत कम अंतर से हारी थी। इसलिए इस बार महागठबंधन में पार्टी की जीत की सम्भावना बढ़ गयी है। फिलहाल एलजेपी के रामचंद्र पासवान समस्तीपुर से सांसद हैं। कांग्रेस के अशोक राम यहां से चुनाव लड़ने जा रहे हैं। महागठबंधन में कांग्रेस के लिए सम्भावनाएं बढ़ गयी लगती हैं। सुपौल, किशनगंज के अलावा वह समस्तीपुर में अशोक राम, कटिहार में तारिक अनवर और पटना साहिब में शत्रुघ्न सिन्हा की जीत की उम्मीद कर सकती है। वहीं सासाराम में मीरा कुमार, वाल्मीकिनगर में कीर्ति आज़ाद, मुंगेर में नीलम देवी, पूर्णिया में बीजेपी से आए उदय सिंह उर्फ पप्पू सिंह में से दो या तीन के जीतने की आस लगा सकती है।

‘हम’ की भी रहेगी मजबूत उपस्थिति

‘हम’ की भी रहेगी मजबूत उपस्थिति

हिन्दुस्तानी अवाम मोर्चा के जीतन राम मांझी गया से जीत की जबरदस्त दावेदारी महागठबंधन उम्मीदवार के रूप में पेश करने वाले हैं, वहीं नीतीश कुमार के गढ़ नालन्दा में भी पार्टी उम्मीदवार अशोक कुमार और औरंगाबाद में उपेन्द्र प्रसाद एनडीए को कड़ी टक्कर देंगे। राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी को पश्चिम और पूर्वी चम्पारण, उजियारपुर, काराकाट और जमुई की सीटें मिली हैं। पार्टी अपने जातिगत समीकरण और महागठबंधन के वोट बैंक को मिलाकर अपने जनाधार को बचाने की कोशिश करेगी।

वीआईपी ने मुजफ्फरपुर से डॉ राजभूषण चौधरी और खगड़िया से पार्टी प्रमुख मुकेश सहनी को उम्मीदवार बनाया है। मधुबनी भी वीआईपी के खाते में है। कभी बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के नजदीकी रहे मुकेश सहनी स्वघोषित सन ऑफ मल्लाह कहे जाते हैं। एक तरह से वीआईपी के जनाधार को महागठबंधन का हिस्सा बनाने के लिए आरजेडी ने अपनी सीटों की कुर्बानी वीआईपी के लिए दी है।

आरजेडी ने शिवहर छोड़ सभी सीटों पर घोषित किए उम्मीदवार
आरजेडी ने 20 में से 19 सीटों पर अपने उम्मीदवारों के नाम का एलान कर दिया है। मधेपुरा से शरद यादव, दरभंगा से अब्दुल बारी सिद्दीकी, सीवान से हिना शहाब, सारण से चंद्रिका राय, बेगूसराय से तनवीर हसन, बक्सर से जगदानन्द सिंह, अररिया से सरफराज आलम, वैशाली से रघुवंश प्रसाद सिंह, पाटलिपुत्र से मीसा भारती, महाराजगंज में रणधीर सिंह के लिए पार्टी इस चुनाव में जीत की उम्मीद करेगी क्योंकि महागठबंधन की ताकत से पार्टी में नयी ऊर्जा आयी है। वहीं गोपालगंज, भागलपुर, बांका, जहानाबाद, नवादा, झंझारपुर और सीतामढ़ी में भी पार्टी कड़ी टक्कर में रहेगी। आरा की सीट सीपीआई एमएल के लिए छोड़ दी गयी है जहां से राजू यादव चुनाव मैदान में हैं। कहा जा रहा है कि तेज प्रताप की नाराज़गी की वजह से शिवहर सीट पर उम्मीदवार का एलान नहीं किया गया है।

सीटों के हिसाब से देखें तो महागठबंधन की ताकत निश्चित रूप से बढ़ेगी। कांग्रेस अंतिम रूप में नुकसान में नहीं होगी। यह एक तरह से पार्टी के लिए बिहार में पुनरोद्धार का मौका है। आरजेडी भी विधानसभा चुनाव में महागठबंधन बनाकर दोबारा जिन्दा हुई है। उसे लोकसभा चुनाव में यह बात साबित कर दिखानी होगी। छोटे दलों में जीतन राम मांझी की पार्टी को सफलता मिलने के ज्यादा आसार दिखते हैं।

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