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जानिए मध्‍यप्रदेश में मचे राजनीतिक घमासान में क्या बच पाएगी कमलनाथ सरकार, कौन से बन रहे समीकरण

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बेंगलुरु। ज्योरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़ भाजपा ज्‍वाइन करने के बाद अचानक 22 विधायकों के इस्‍तीफे से कमलनाथ सरकार पर संकट छाया गया। एक ओर कांग्रेस के बागी विधायक ज्योतिरादित्य सिंधिया के प्रति वफादार होने की कसमें खा रहे हैं वहीं दूसरी ओर कमनाथ सरकार दावा कर रही हैं कि वो किसी भी हालत में अपनी सरकार गिरने देगे। इस्‍तीफा देने वाले विधायकों में से 13 विधायक वापस लौटने को तैयार हैं। ऐसे में जानिए मध्‍यप्रदेश में राजनीतिक घमासान में आगे अब क्या होगा और कौन से राजनीतिक समीकरण बन रहे?

राज्यपाल और विधानसभा अध्‍यक्ष पर टिका है सारा दारोमदार

राज्यपाल और विधानसभा अध्‍यक्ष पर टिका है सारा दारोमदार

गौरतलब हैं कि मध्‍य प्रदेश की राजनीतिक उथल-पुथल के बीच सबसे अहम भूमिका प्रदेश के राज्यपाल लालजी टंडन और विधानसभा अध्‍यक्ष एनपी प्र‍जापति की भूमिका सबसे अहम हो गई हैं। राज्यपाल के पास ही राजनीतिक ताले की चाभी है। बता दें होली के अवकाश के बाद आज यानी शुक्रवार को ही लालजी टंडन भोपाल लौटने के बाद सीएम कमलनाथ ने राज्यपाल टंडन से फ्लोट टेस्‍ट करवाने की मांग की है। हालांकि अभी तक राज्यपाल इस पूरे मुद्दे पर चुप्‍पी साधी हुई हैं। सिंधिया के कांग्रेस से इस्‍तीफा देने वाले दिन ही विधानसभा सचिवालय को सभी 22 बागी कांग्रेस विधायकों के इस्तीफे मिल चुके हैं, लेकिन विधानसभा अध्यक्ष ने इन्हें स्वीकार करने से मना कर दिया है। उन्होंने कहा है कि सभी बागी विधायकों से व्यक्तिगत रूप से मिलने और उनकी वीडियोग्राफी के बाद ही इस्तीफों पर निर्णय लेंगे।

भाजपा मध्यावधि चुनाव से और कांग्रेस उपचुनाव से बचेगी

भाजपा मध्यावधि चुनाव से और कांग्रेस उपचुनाव से बचेगी

राजनीतिक व‍िशेषज्ञों का मानना हैं कि अगर फ्लोर टेस्‍ट होता है और मध्‍यप्रदेश की कमलनाथ सरकार सरकार बनाने के लिए बहुमत सिद्ध करने में असफल रहती तो कांग्रेस सरकार गिर जाएगी और इस स्थिति में कांग्रेस की कोशिश होगी कि विधानसभा भंग हो जाए और प्रदेश में मध्यावधि चुनाव हो। वहीं भाजपा की कोशिश होगी कि वह बागी विधायकों के सीटों पर उपचुनाव करवाए जैसा कि कर्नाटक सरकार में पूर्व दिनों हो चुका हैं। भाजपा कभी भी मध्यावधि चुनाव कराने के पक्ष नहीं लेगी। हालांकि इस मामले में आखिरी फैसला राज्यपाल लालजी टंडन करेंगे। माना जा रहा हैं कि मध्‍यप्रदेश में वैसा ही होगा जैसा कि कर्नाटक में हुआ। बता दें पिछले वर्ष कर्नाटक में मध्‍यप्रदेश जैसे ही घटनाक्रम हुए और वहां कांग्रेस की सरकार गिर गई और भाजपा ने कर्नाटक की सत्ता पर कब्जा जमा लिया और बाद में वहां उपचुनाव करवाए गए थे।

कर्नाटक की तरह बागी विधायक पूरे कार्यकाल के लिए नहीं होंगे अयोग्य

कर्नाटक की तरह बागी विधायक पूरे कार्यकाल के लिए नहीं होंगे अयोग्य

विधानसभा अध्यक्ष एनपी प्रजापति कांग्रेस के बागी विधायकों को उनके पूरे कार्यकाल के लिए अयोग्य घोषित नहीं कर सकते हैं। क्योंकि बात अगर कर्नाटक की करें तो वहां के तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष द्वारा विधायकों को पूरे कार्यकाल के लिए अयोग्य घोषित करने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था। इन विधायकों ने उपचुनाव लड़ा था। ऐसे में मध्यप्रदेश में भी यह संभावना बनती दिखाई दे रही है कि बागी कांग्रेस विधायक अयोग्य घोषित होने के बाद उपचुनाव लड़ें। ऐसे में तय हैं सरकार गिरने पर सत्ता पर भाजपा काबिज होगी और बाद में उपचुनाव करवाए जाएंगे।

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विश्वास या अविश्वास प्रस्ताव पर वोटिंग से होगा बहुमत का फैसला

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गौरतलब हैं कि मध्यप्रदेश में 16 मार्च से बजट सत्र शुरू हो ही रहा है। विशेषज्ञों का मनाना है कि इसी दौरान भाजपा अविश्वास प्रस्ताव या कांग्रेस विश्वास प्रस्ताव पेश करेगी और जिसके आधार पर कमलनाथ सरकार के भविष्‍य का फैसला होगा। माना जा रहा है कि राज्यपाल लालजी टंडन अभी तटस्‍थ दिखाई दे रहे हैं लेकिन हालांकि बाद में उनकी भूमिका अहम होगी। मध्‍यप्रदेश में राजनीतिक ताले की चाभी असल में राज्यपाल टंडन जी के पास हैं।

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मध्‍यप्रदेश में ये है सियासी गणित

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मध्य प्रदेश में विधानसभा की कुल 230 सीटें हैं और इसमें से दो सीट खाली है, जिसके बाद कुल संख्या 228 है। सिंधिया की बगावत के साथ अब तक 22 कांग्रेस विधायकों ने इस्तीफा भेजा है। ऐसे में अगर इन कांग्रेसी विधायकों का इस्तीफा स्वीकार हो जाता है तो इसकी कुल संख्या 206 हो जाती है, जिसके बाद बहुमत के लिए 104 विधायकों की जरूरत होगी। कांग्रेस के पास पहले 114 विधायकों के अलावा 7 अन्‍य का समर्थन हासिल था। कांग्रेस के पास कुल मिलाकर 121 विधायकों का समर्थन हासिल था। वहीं जिन कांग्रेस विधायकों ने इस्तीफा दिया जिसके कारण उनका संख्‍या बल कम हो गया हैं। सरकार को बचाने के लिए कांग्रेस को कुल 104 विधायकों की जरुरत हैं। भाजपा के पास कुल 107 विधायक हैं।

राजनीति के मझे हुए खिलाड़ी हैं राज्यपाल

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गौरतलब हैं कि लालजी टंडन उत्तर प्रदेश भाजपा के दिग्गज नेता हैं। लालजी टंडन को दो बार यूपी विधान परिषद के सदस्‍य रहे हैं। उनका पहला कार्यकाल वर्ष 1078 से वर्ष 1984 और दूसरा कार्यकाल वर्ष 1090 से वर्ष1996 तक रहा। वहीं 1991-1992 तक लालजी टंडल यूपी सरकार में मंत्री रहें। फिर 1996 -2009 तक लगातार चुनाव जीतकर वो विधानसभा पहुंचते रहे। वर्ष 1997 में वह यूपी में नगर विकास मंत्री भी रहे। साथ ही यूपी विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष भी रहे। लखनऊ लोकसभा क्षेत्र से वह पहली बार 2009 में चुनाव लड़े और जीतकर संसद पहुंचे। वर्ष 2014 में लालजी टंडन की जगह लखनऊ से राजनाथ सिंह चुनव लड़े।

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English summary
Madhya Pradesh Political Crisis Know What Will Happen Next, What Political Equations are Being Created
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