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डीएसपी बनने जा रहे थे रामविलास पासवान, बन गए विधायक, अपना ही रिकॉर्ड तोड़ते रहे

पटना। जिंदगी इत्तेफाक है। कल भी इत्तेफाक थी, आज भी है। ये इत्तेफाक ही है कि रामविलास पासवान आज दलितों के बड़े नेताओं में एक हैं। 1977 के पहले तक वे एक साधारण नेता थे। लेकिन 1977 की भारी भरकम जीत ने उन्हें देश का चर्चित नेता बना दिया। उनका राजनीति में आना भी एक इत्तेफाक ही है। अगर समाजवादी नेता रामजीवन सिंह उनको राजनीति में नहीं लाये होते तो वे बिहार में पुलिस अधिकारी बन कब का रिटायर हो गये होते। लेकिन उनकी किस्मत में लिखा था कि वे चुनावी राजनीति में सर्वाधिक मतों से जीतने का दो बार रिकॉर्ड बनाएंगे और देश के दिग्गज नेता बनेंगे। रामविलास पासवान के सर्वाधिक मतों से जीतने के रिकॉर्ड को बाद में पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने तोड़ा। राव के रिकॉर्ड को अनिल बसु ने और अनिल बसु के रिकॉर्ड को प्रीतम मुंडे ने तोड़ा।

रामविलास पासवान इत्तेफाक से आये राजनीति में

रामविलास पासवान इत्तेफाक से आये राजनीति में

रामविलास पासवान का जन्म खगड़िया जिले के एक दलित परिवार में हुआ । उन्होंने एमए और एलएलबी की उपाधि हासिल की है। एक आम नौजवान की तरह उन्होंने पहले सरकारी नौकरी के लिए कशिश शुरू की। पीसीएस की परीक्षा पास की और डीएसपी पद के लिए चयनित हुए। उस समय बिहार में राजनीति में उथल-पुथल मची हुई थी। 1967 के चुनाव के बाद मिलीजुली सरकारें बनती थीं और कुछ समय बाद ही गिर जाती थीं। 1969 में मध्यावधि चुनाव की नौबत आ गयी। उस समय पासवान राजनीति से दूर पुलिस अधिकारी बनने की तैयारी में थे। तभी उनकी मुलाकात बेगूसराय के समाजवादी नेता रामजीवन सिंह से हुई। रामजीवन सिंह पासवान की प्रतिभा से बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने उनको राजनीति में आने की सलाह दी। रामजीवन सिंह संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी में थे। उनके सहयोग से पासवान राजनीति में आ गये और संसोपा के टिकट पर अलौली सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ा। वे चुनाव जीत गये। पुलिस अधिकारी बनते बनते विधायक बन गये।

पासवान की जीत का पहला रिकॉर्ड

पासवान की जीत का पहला रिकॉर्ड

1969 की जीत के बाद पासवान की राजनीति में ठहराव आ गया। संसोपा के विघटन के बाद वे लोकदल से जुड़े। 1974 में जयप्रकाश नारायण के आंदोलन में शामिल हुए। इमरजेंसी का विरोध किया तो जेल में ठूंस दिया गया। 1977 में जब भारतीय राजनीति ने नयी करवट ली तो रामविलास पासवान अचानक बुलंदियों पर पहुंच गये। जनता पार्टी ने उन्हें 1977 में हाजीपुर सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ने के लिए टिकट दिया। उस समय रामविलास बिहार के साधारण नेता थे। बहुत लोग उन्हें जानते तक नहीं थे। उन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवार बालेश्वर राम को 4 लाख 25 हजार 545 मतों के विशाल अंतर से हराया। इस तरह पासवान ने सर्वाधिक मतों से जीतने का नया भारतीय रिकॉर्ड बनाया। इस उपलब्धि के लिए उनका नाम गिनिज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में शामिल किया गया। इसके बाद रामविलास पासवान की देश और विदेश में चर्चा होने लगी। इस रिकॉर्ड जीत ने उन्हें स्टार पोलिटिशियन बना दिया।

रामविलास ने अपने ही रिकॉर्ड को तोड़ा

रामविलास ने अपने ही रिकॉर्ड को तोड़ा

1989 में एक बार फिर कांग्रेस के खिलाफ हवा बनी। वी पी सिंह ने मिस्टर क्लीन कहे जाने वाले राजीव गांधी के खिलाफ बोफोर्स का मुद्दा उठा कर राजनीति को एक बार फिर नया मोड़ दिया। कांग्रेस के खिलाफ जनमोर्चा तैयार हुआ। 1989 के लोकसभा चुनाव में रामविलास पासवान फिर हाजीपुर लोकसभा सीट पर खड़ा हुए। इस बार पासवान ने सर्वाधिक मतों से जीत के के अपने ही पुराने रिकॉर्ड को तोड़ दिया। उन्होंने कांग्रेस के महावीर पासवान को 5 लाख 4 हजार 448 मतों के विशाल अंतर से हराया। देश में इसके पहले कभी कोई इतने मतों के अंतर से नहीं जीता था। इस तरह रामविलास पासवान देश के एक मात्र नेता हैं जिन्होंने सर्वाधिक मतों से जीतने का दो बार रिकॉर्ड बनाया।

इस तरह टूटा पासवान का रिकॉर्ड

इस तरह टूटा पासवान का रिकॉर्ड

1991 के लोकसभा चुनाव में पीबी नरसिम्हा राव ने आंध्र प्रदेश की नांद्याल सीट पर भाजपा के बंगारू लक्ष्मण को 5 लाख 80 हजार मतों से हराया। इस तरह दो साल बाद ही पासवान का रिकॉर्ड टूट गया। इसके बाद 2004 के लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल के नेता अनिल बसु ने राव का रिकॉर्ड तोड़ दिया। अनिल बसु ने पश्चिम बंगाल के आरामबाग सीट पर सीपीएम के टिकट पर चुनाव लड़ा था। वे सात बार लोकसभा का सदस्य रह चुके थे। 2004 में उन्होंने भाजपा के उम्मीदवार स्वप्न नंदी को 5 लाख 92 हजार 502 मतों के विशाल अंतर से हराया था। लेकिन बसु के नाम भी यह रिकॉर्ड अधिक दिनों तक नहीं रहा। 2014 में महाराष्ट्र की युवा लड़की ने अनिल बसु का रिकॉर्ड तोड़ दिया। 2014 के लोकसभा चुनाव में महाराष्ट्र के बीड सीट से जीते भाजपा के दिग्गज नेता गोपीनाथ मुंडे का सड़क हादसे में निधन हो गया था। इसके बाद बीड सीट पर उपचुनाव में भाजपा ने गोपीनाथ मुंडे की की पुत्री प्रीतम मुंडे को टिकट दिया। सहानुभूति की ऐसी सहर चली कि प्रीतम मुंडे ने सर्वाधिक मतों से जीतने का नया रिकॉर्ड बना दिया। प्रीतम ने इस सीट पर 6 लाख 96 हजार 321 मतों के अंतर से जीत हासिल की। प्रीतम ने सारे पुराने कीर्तिमानों को ध्वस्त करते हुए नया इतिहास रच दिया। वैसे 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी बडोदरा सीट पर 5 लाख 70 हजार 128 मतों से जीते थे । लेकिन बाद मोदी ने यह सीट छोड़ दी और बनारस से सांसद बने रहे।

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