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माया का मुलायम और शत्रु का पूनम के मंच पर जानाः ये रिश्ता क्या कहलाता है?

By आर एस शुक्ल
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नई दिल्ली। कुदरत के खेल निराले की तरह राजनीति के खेल भी निराले होते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि राजनीति में कभी भी कोई किसी का स्थायी दोस्त अथवा दुश्मन नहीं होता। वक्त और हालात तय करते हैं कि कब कौन किसका हो जाएगा। अब जब लोकसभा चुनाव के दो चरणों का मतदान हो चुका है, तब कुछ ऐसे-ऐसे राजनीतिक दृश्य सामने आने लगे हैं जिनके बारे में भले ही किसी को आश्चर्य न हो, लेकिन यह हमारी राजनीति की असलियत तो बयान जरूर करते हैं। कभी एक-दूसरे के जानी दुश्मन माने जाने वाले मुलायम सिंह यादव और मायावती मैनपुरी में न केवल एक मंच नजर आए बल्कि एक-दूसरे का सम्मान किए जाने की बातें कीं। अब से कुछ महीने पहले तक कोई यह आसानी से नहीं सोच सकता था कि कभी ऐसे दिन भी आ सकते हैं। कम से कम वे लोग जिन्हें 1995 का गेस्ट हाउस कांड याद होगा और जो मायावती की राजनीति को थोड़ा-बहुत भी जानते होंगे, वे आसानी से इस नई राजनीति को शायद ही समझ पाएं। इससे एक दिन पहले एक दूसरा राजनीतिक नजारा लखनऊ में दिखा था जब सपा की प्रत्याशी पूनम सिन्हा ने अपना नामांकन दाखिल किया, सभा की और रोड शो किया। पूनम सिन्हा के साथ उनके पति शत्रुघ्न सिन्हा लगातार बने रहे, मंच भी साझा किया और रोड शो में भी शामिल हुए। अब से कुछ दिन पहले ही शत्रुघ्न सिन्हा कांग्रेस में शामिल हुए थे और पूनम सिन्हा सपा में गई थीं। इससे पहले तक शत्रुघ्न सिन्हा भाजपा सांसद थे और पूर्व की एनडीए सरकार में मंत्री भी थे। अब वह कांग्रेस की ओर से पटना साहिब से प्रत्याशी हैं।

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मुलायम सिंह यादव और मायावती मैनपुरी में साझा किया मंच

मुलायम सिंह यादव और मायावती मैनपुरी में साझा किया मंच

इन तरह की राजनीतिक उलटवासियों को लेकर सियासी हलकों में खास तरह की चर्चाएं हैं। ये दोनों ही घटनाएं नई तरह की राजनीति की ओर संकेत करने वाली हैं। असल में यह सब कुछ उत्तर प्रदेश में हालिया अस्तित्व में आए महागठबंधन और भाजपा को सत्ता से बाहर करने की विपक्ष की राजनीति का परिणाम माना जा रहा है। उत्तर प्रदेश में सपा और बसपा दोनों ही प्रमुख पार्टियां मानी जाती हैं। इसमें एक भाजपा भी है जो कांग्रेस के अस्तित्वहीन जैसे होने के बाद राज्य की मुख्य सत्ताधारी पार्टी बन चुकी है। कांग्रेस के बारे में यह कहा जाता है कि यह उत्तर प्रदेश में अपना जनाधार खो चुकने के कारण कोई बड़ी ताकत नहीं रह गई है। इसके विपरीत भाजपा ने खुद को बहुत मजबूत पार्टी के रूप में उत्तर प्रदेश में स्थापित कर रखा है। पिछले 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 80 में से 73 सीटें जीतकर सपा, बसपा और कांग्रेस को एक तरह से हाशिये पर धकेल दिया था। इसमें भी सर्वाधिक नुकसान बसपा को हुआ था जिसे तब एक भी सीट भी नहीं मिल सकी थी। कांग्रेस को दो और सपा को पांच सीटों पर संतोष करना पड़ा था। इसके बाद से सपा और बसपा को करीब आने की जमीन तैयार होने लगी थी जिसे राज्य के विधानसभा चुनाव परिणामों ने और उर्वरा बना दिया था। रही-सही कसर फूलपुर, गोरखपुर और कैराना के उपचुनावों ने पूरी कर दी थी जिसमें बतौर प्रयोग किए गए अनौपचारिक गठबंधन ने सपा और बसपा को साथ ला दिया। कांग्रेस को हालांकि इस गठबंधन में जगह नहीं मिल सकी, लेकिन माना जा रहा है कि परोक्ष रूप से उसके साथ भी विपक्ष की कोई न कोई अंदरूनी समझ जरूर है।

मैनपुरी रैली में दोनों नेताओं ने एक-दूसरे का सम्मान किए जाने की बातें कीं

मैनपुरी रैली में दोनों नेताओं ने एक-दूसरे का सम्मान किए जाने की बातें कीं

भले ही इसे मजबूरी का गठबंधन कहा जा रहा हो, लेकिन वर्तमान राजनीतिक हालात ने वह कर दिया, जो आसान नहीं कहा जा सकता था। बसपा प्रमुख मायावती ने सपा के साथ गठबंधन तो किया ही, उन मुलायम के साथ मंच भी साझा किया जिन्हें वह अपने स्वभाव के अनुरूप शायद ही कभी माफ कर सकती थीं। इसके पीछे उस गेस्ट हाउस कांड को बड़ा कारण माना जाता था जिसमें सपा कार्यकर्ताओं ने मायावती को बहुत बेइज्जत करने की कोशिश की थी। लेकिन अब 24 साल बाद लगता है, वह सब भुला देने में ही मायावती को भलाई नजर आने लगी है क्योंकि अगर राजनीतिक अस्तित्व बचा रहेगा, तो अन्य बातों पर बाद में भी ध्यान दिया जा सकेगा। यही सवाल उन मुलायम सिंह जैसे कुशल राजनीतिज्ञ के साथ भी हो सकती है। यह जगजाहिर है कि वह सपा के बसपा के साथ गठबंधन को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। उसके विरोध में भी बातें करते रहे हैं। संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दोबारा प्रधानमंत्री बनने की कामना भी करते हैं। गठबंधन की रैलियों में भी नहीं जाते हैं और बेटे अखिलेश की बजाय भाई शिवपाल के पक्ष में वकालत भी करते रहते हैं। इस सबके बावजूद सपा के टिकट पर चुनाव भी लड़ते हैं और मायावती का स्वागत व सम्मान करने के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं से अपील भी करते हैं। मतलब इतना बड़ा दिल दिखाकर मायावती और मुलायम ने संभवतः यह बताने की कोशिश की है कि यही हालिया राजनीति की प्रमुख जरूरत है।

लखनऊ में नामांकन के दौरान पूनम सिन्हा के साथ लगातार बने रहे उनके पति शत्रुघ्न सिन्हा

लखनऊ में नामांकन के दौरान पूनम सिन्हा के साथ लगातार बने रहे उनके पति शत्रुघ्न सिन्हा

शत्रुघ्न सिन्हा के सपा के मंच पर जाने और रोड में हिस्सा लेने को भी इसी तरह की राजनीतिक मजबूरी के रूप में देखा जा सकता है। सामान्य तौर पर देखा जाए, तो आसानी से संभव नहीं हो सकता था कि जब उस सीट पर कांग्रेस का भी प्रत्याशी हो, कोई कांग्रेस नेता उस पार्टी के पक्ष में कैसे खड़ा हो सकता है जिसके साथ कोई गठबंधन भी नहीं हुआ है। इस पर तो शत्रुघ्न से जवाब तलब भी हो सकता था। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। जैसे सब कुछ बहुत सोची-समझी रणनीति के तहत हुआ हो। अगर ऐसा न होता तो यह भी नहीं होता कि वह खुद कांग्रेस में और उनकी पत्नी सपा में जातीं और फिर दोनों प्रत्याशी बनते। इससे इस संभावना को बल मिलता है जिसमें यह कहा जा रहा है कि भाजपा के खिलाफ कांग्रेस और सपा के बीच जरूर कोई गुप्त समझौता हुआ है। तभी तो न सपा को कोई आपत्ति है और न कांग्रेस को। दरअसल यह माना जा रहा है कि भाजपा को करारी शिकस्त देने के लिए किए गए गुप्त समझौते के तहत एक दूसरे की जीतने की संभावना वाली सीटों पर इन दोनों ही पार्टियों ने कमजोर प्रत्याशी उतारे हैं और ध्यान में रखा गया है कि कैसे भाजपा का वोट काटा जा सकता है। लखनऊ के बारे में भी संभवतः यही रणनीति काम कर रही है जहां से कांग्रेस ने प्रमोद कृष्णम को उम्मीदवार बनाया गया है। कहा जा रहा है कि वह कांग्रेस का ब्राह्मण वोट काटेंगे और इस तरह सपा प्रत्याशी पूनम सिन्हा की जीत की राह आसान हो सकेगी। भाजपा की परंपरागत और मजबूत सीट मानी जाने वाली लखनऊ सीट पर भाजपा से इस बार केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह प्रत्याशी हैं। ऐसे में यह देखना भी दिलचस्प होगा कि विपक्ष की रणनीति कितना सफल हो सकेगी।

राजनीति में कभी भी कुछ भी हो सकता है

राजनीति में कभी भी कुछ भी हो सकता है

लेकिन इन दोनों विशिष्ट घटनाओं ने एक बार फिर यह तो साबित ही कर दिया है कि राजनीति में कभी भी कुछ भी हो सकता है। एक दूसरे के धुर विरोधी भी साथ आ सकते हैं और पार्टी के साथ आपसी पारिवारिक रिश्तों को भी निभाया जा सकता है। वैसे राजनीति में ऐसे उदाहरण भी कम नहीं हैं जब पारिवारिक रिश्ते भी राजनीति के आड़े आ जाते हैं। लेकिन अब नए राजनीतिक रिश्ते भी उभरकर सामने आने लगे हैं। इसे राजनीतिक मजबूरी और वक्त की जरूरत के रूप में ही ज्यादा देखा जा सकता है। इस तरह के रिश्तों को स्थायी भाव के रूप में देखना अभी जल्दबाजी ही कहा जाएगा। फिर भी यह हो रहा है, तो आशा की जा सकती है कि शायद इसके कुछ आशाजनक परिणाम भी सामने आएं। अगर ऐसा होता है तो इनके आगे भी बढ़ने की संभावनाएं हो सकती हैं। लेकिन इसमें असफलता मिली, तो भविष्य में कुछ नए राजनीतिक रिश्तें भी सामने आने की संभावना बरकरार रह सकती है।

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English summary
Lok Sabha Elections 2019: Mayawati Mulayam Singh Yadav Stage Share and Shatrughan Sinha Poonam Sinha
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