लोकसभा चुनाव 2019: क्या नए सिरे से बढ़ने लगा है बूथ कब्जे का खतरा?
नई दिल्ली। अभी ईवीएम मशीनों के जरिये चुनाव में गड़बड़ी की शिकायतें चल ही रही थीं कि लगता है कि बूथ कब्जे का खतरा नए सिरे से खड़ा होने लगा है। लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण के मतदान के दौरान बुलंदशहर के एक बूथ पर भाजपा प्रत्याशी के कथित बूथ कब्जे की शिकायत और पहले चरण के मतदान के दौरान त्रिपुरा में बूथों पर कब्जे की शिकायत के बाद इसे नए सिरे से बल मिला है। बूथ कब्जे को बीते कुछ वर्षों के दौरान गुजरे जमाने की बात माना जाने लगा था। वह कोई और जमाना था जब बूथों पर कब्जा कर लिया जाता था। इसकी बढ़ती शिकायतों के बाद चुनाव आयोग की ओर से बरती गई सख्ती के बाद बूथ कब्जे पर काफी हद तक काबू पा लिया गया था। कई बार चुनाव आयोग की ओर से इस आशय की चेतावनियां तक जारी करनी पड़ी थीं कि चुनाव में बाधा उत्पन्न करने की कोशिश करने वालों के साथ सख्ती से निपटा जाएगा। इससे उन आपराधिक तत्वों पर अंकुश लगाया जा सका था जो मतदाताओं को डराने-धमकाने से लेकर बूथ कब्जे तक में लगे होते थे। इसके अलावा भी कई नियम इतने कड़े कर दिए गए थे कि किसी के लिए भी यह आसान नहीं रह गया था कि वह बूथ के करीब भी जा सके और वहां किसी तरह की ऐसी हरकत करने की हिम्मत जुटा सके। इस सबके कारण मतदाताओं में भी एक खास तरह की सुरक्षा की भावना जगी थी और वे बिना डरे मतदान के लिए जाने लगे थे जिससे मतप्रतिशत भी बढ़ने लगा था। वरना एक समय ऐसा भी आया था जब मतदाता इतने भयभीत हो चुके थे कि डर के मारे वोट डालने के लिए नहीं निकलते थे।

चुनाव आयोग के लिए बड़ी चुनौती
अब लगता है कि ये दिन भी गुजरे जमाने के होने वाले हैं। हाल के चुनावों में जिस तरह बूथों पर कब्जे और मतदाताओं को बूथों तक न पहुंचने देने अथवा उन्हें मतदान से रोकने की शिकायतें सामने आने लगी हैं उससे यह खतरा फिर बढ़ने लगा है। अभी बुलंदशहर के बारे में जिस तरह की जानकारियां सामने आ रही हैं वह इसी ओर संकेत करती हैं कि संबंधित बूथ पर कुछ तो गड़बड़ अवश्य हुई है। यह अपने आप में चौंकाने वाली बात है कि जब बूथ के भीतर और ईवीएम के पास किसी के भी जाने की इजाजत नहीं है, तो कोई प्रत्याशी वहां तक कैसे जा सकता है। हालांकि इस तरह की जानकारियां आई हैं कि संबंधित प्रत्याशी को नजरबंद करने का आदेश जिलाधिकारी की ओर से जारी किया गया है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या नियमों की अनदेखी गई। अगर वाकई ऐसा हुआ है तो यह खुद चुनाव आयोग के लिए बड़ी चुनौती है। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग की होती है। माना जा सकता है कि आयोग की ओर से इसके पुख्ता इंतजाम किए गए हैं और इस तरह की किसी अनपेक्षित गतिविधि को न होने देने के लिए भी आयोग प्रतिबद्ध है। इसके बाद भी आखिर ऐसी शिकायतें कैसे आ जा रही हैं। यद्यपि शिकायतों के बाद आयोग कार्रवाई भी कर रहा है। लेकिन क्या केवल इतने को ही पर्याप्त माना जा सकता है।

चुनावों में बूथ कब्जे की शिकायतें कोई नई बात नहीं
ऐसा नहीं है कि चुनावों में बूथ कब्जे की शिकायतें कोई नई बात है। चुनावों के दौरान इस तरह की समस्याओं को ध्यान में रखते हुए ही शायद चुनाव आयोग कई चरणों में मतदान करवाने की व्यवस्था करता है ताकि किसी तरह की कमी न रह जाए औऱ मतदान स्वतंत्र व निष्पक्ष तरीके से संपन्न कराए जा सकें। राजनीतिक दलों और कुछ अन्य लोगों की ओर से भले ही इसकी आलोचना की जाती हो कि कई चरणों में चुनाव कराने का क्या मतलब है जबकि पहले एक ही दिन में या कुछ ही चरणों में मतदान करवा लिए जाते थे। इसके बावजूद यह स्वीकार्य होता है कि चाहे जो कुछ भी करना पड़े, यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि मतदान निष्पक्ष औऱ स्वतंत्र तरीके से हो। सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि सुरक्षा के तमाम दावों के बावजूद ऐसी घठनाएं कैसे हो जाती हैं और आगे भी दोहराई जाती रहती हैं। बीते कुछ चुनावों के उदाहरणों से भी इसे समझा जा सकता है कि किस तरह बूथ कब्जे की शिकायते लगातार बढ़ती जा रही हैं। हालांकि कई मामलों में चुनाव आयोग मतदान निरस्त कर नए सिरे से मतदान कराता है लेकिन लगता है कि बूथ कब्जा करने वालों का हौसला बढ़ता जा रहा है और वे नए-नए तरीके अख्तियार करने लगे हैं। इसके पीछे एक बड़ा कारण यह हो सकता है कि ऐसे तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाइयां नहीं की जा रही हैं।

पश्चिम बंगाल से भी पहले चरण में बूथ कब्जे की शिकायत की गई थी
बुलंदशहर और त्रिपुरा की हालिया घटनाओं से पहले भी इसी चुनाव के दौरान बिहार में नवादा के वारसलीगंज में दो बूथों पर कब्जे की शिकायतें सामने आई थीं। पश्चिम बंगाल से भी पहले चरण में बूथ कब्जे की शिकायतें की गई थीं। भाजपा की ओर से आरोप लगाया गया था कि तृणमूल कांग्रेस ने अलिपुरदुआर और कूचबिहार में पुलिस की मदद से करीब 90 बूथों पर कब्जा कर लिया था। जम्मू कश्मीर में भी बूथ कब्जे की शिकायतें की गईं। वहां कांग्रेस का आरोप था कि लोलाब में पीडीपी कार्यकर्ताओं ने बूथ पर कब्जा कर लिया। यह तो कुछ हालिया शिकायतें हैं। इससे पहले 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान बूथों पर कब्जे की शिकायतें की गई थीं। यह शिकायतें भाजपा की ओर से की गई थीं। इसमें छपरौली, बड़ौत, शिकोहाबाद आदि में बूथों पर कब्जे का आरोप लगाया गया था। इतना ही नहीं, 2014 के चुनाव में भाजपा के उत्तर प्रदेश प्रभारी रहे अमित शाह के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल मुख्य चुनाव आयुक्त से मिला था और उत्तर प्रदेश तथा पश्चिम बंगाल में बूथों पर कब्जे की शिकायत की थी। अब से कुछ माह पहले ही उत्तर प्रदेश में लोकसभा की दो सीटों के लिए हुए उपचुनाव के दौरान कैराना में भी कुछ इसी तरह की शिकायतें सामने आई थीं। तब कुछ दलितों ने आरोप लगाया था कि उन्हें वोट नहीं डालने दिया गया। इन दलितों का आरोप था कि कुछ दबंगों ने बूथ पर कब्जा कर लिया है और उन्होंने उनसे पर्चियां छीनकर भगा दिया। पंचायत चुनावों के दौरान पश्चिम बंगाल और हरियाणा से बूथ कब्जे की शिकायतें आई थीं। इसके अलावा इस तरह की शिकायतों के मद्देनजर आयोग की ओर से भी कई बार कुछ बूथों पर पुनर्मतदान कराए गए हैं। इससे भी यह साफ पता चलता है कि बूथों पर गड़बड़ियां की और कराई जा रही हैं जिन्हें रोक पाना संभव नहीं हो पा रहा है।

शिकायतों के बाद चुनाव आयोग की ओर से की जा रही कार्रवाई
इस सब के मद्देनजर क्या यह जरूरी नहीं हो गया है कि चुनाव आयोग और राजनीतिक पार्टियां बूथों पर कब्जा और मतदाताओं को मतदान से वंचित करने के प्रयासों पर रोक के लिए नए सिरे से गंभीरता से विचार करें और फिर से कुछ ऐसी व्यवस्थाएं बनाई जाएं जिससे इसे रोका जा सके। प्रायः यह देखने में आता है कि जहां जिसकी सरकार है, वहां वह अपनी ताकत का बेजा इस्तेमाल कर रहा है। हालांकि इसके अलावा तकरीबन हर पार्टी पर इस आशय के आरोप लगाए जाते रहे हं। यह सही है कि चुनाव आयोग की ओर से शिकायतों के बाद कार्रवाई की भी जा रही है। लेकिन क्या यह ज्यादा अच्छा नहीं होगा कि पहले से ऐसी व्यवस्था बनाई जाए कि किसी की ऐसा करने की हिम्मत न हो। निष्पक्ष और स्वतंत्र मतदान की गारंटी तभी हो सकेगी जब मतदाता बिना किसी भय व व्यवधान के अपने मताधिकार का उपयोग कर सके। जब तक ऐसा नहीं होगा, सवाल खड़े होते रहेंगे।
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