लालू यादव यूं ही नहीं बने सियासत का सितारा, आज भी वही हैं राजद की सबसे बड़ी ताकत

पटना। लालू यादव के आलोचकों की कमी नहीं है। उनके खिलाफ अनगिनत बातें कहीं जाती हैं। लेकिन इन सब बावजूद वे बिहार में एक राजनीतिक ताकत हैं। सजायाफ्ता होने के बाद उनकी ताकत कम तो हुई है, लेकिन इतनी भी कम नहीं कि कोई उनकी अनदेखी कर दे। लालू यादव में कई ऐसी खूबियां हैं जो गरीब-गुरबों को दिलोजान से पसंद है। लालू यादव वंशवादी हैं लेकिन उन्होंने राजनीति में ऐसे लोगों को भी आगे बढ़ाया है जो गुरबत की जिंदगी जी रहे थे। लालू यादव जेल में हैं फिर भी राजद के वही तारणहार हैं।

पत्थर तोड़ने वाली महिला को बनाया सांसद

पत्थर तोड़ने वाली महिला को बनाया सांसद

लालू यादव गुदड़ी के लाल को पहचानने में माहिर हैं। 1995 में बिहार विधानसभा चुनाव के समय उनका काफिला गया जिले के ग्रामीण इलाके से गुजर रहा था। उन्होंने पहाड़ों की तलहटी में एक उम्रदराज महिला को पत्थर तोड़ते देखा। उनको किसी ने बताया कि ये जो महिला पत्थर तोड़ रही है, वह पूर्व विधायक है। मुसहर समाज से आती हैं इस लिए आगे नहीं बढ़ पायी। लालू यादव ने गाड़ी रोक कर उस महिला से बात की। हालचाल पूछा। फिर चल दिये। अगले दिन उस महिला को लालू यादव ने पटना बुलवाया। इस महिला का नाम है भगवती देवी जिन्हें बोलचाल में भगवतिया देवी कहा जाता है। वे तब 59 साल की ही थी लेकिन गरीबी और हाड़तोड़ मजदूरी ने उन्हें कमजोर बना दिया था। लालू ने उनको 1995 के विधानसभा चुनाव में गया के बाराचट्टी से टिकट दे दिया। वे फिर विधायक चुनी गयीं। 1996 में लालू ने उन्हें गया रिजर्व सीट से लोकसभा का चुनाव लड़वा दिया। इस चुनाव को जीत कर वे सांसद बन गयी थीं। एक महादलित, अनपढ़ और गरीब महिला कहां से कहां पहुंच गयी। लालू के इस कारनामे की आज भी मिसाल दी जाती है।

कुछ यूं पलटी थी किस्मत

कुछ यूं पलटी थी किस्मत

भगवतिया देवी बिहार के सबसे दलित माने जाने वाले मुसहर समुदाय से ताल्लुक रखती हैं। 1969 में उनके जीवन में अचनाक एक सुखद मोड़ आया। बाराचट्टी की रहने वाली भगवतिया देवी उन दिनों गया से सटे एक गांव में पत्थर तोड़ने का काम करती थीं। मजदूर और गरीब होने के बाद भी उनकी विचार शक्ति बहुत तेज थी। 1969 में बिहार विधानसभा के मध्यावधि चुनाव की तैयारी चल रही थी। एक दिन समाजवादी नेता उपेन्द्र प्रसाद वर्मा की गाड़ी वहां से गुजर रही थी जहां भगवतिया देवी काम कर रही थीं। उन्होंने भगवतिया देवी को फिर हो रहे चुनाव पर टिपण्णी करते हुए सुना। वे मगही में चुनाव को जनता पर बोझ बता रही थीं। उपेन्द्र प्रसाद वर्मा एक अनपढ़ महिला मजदूर के मुंह से ऐसी बात सुन कर हैरान हो गये। उन्होंने गाड़ी रुकवायी। भगवतिया देवी के पास पहुंचे और राजनीति में आने की सलाह दी। वर्मा जी ने तत्काल ये बात रामनोहर लोहिया को बतायी।

उपेन्द्र प्रसाद वर्मा और लोहिया ने दिलाया टिकट

लोहिया जी ने भगवतिया देवी को चुनाव में उतारने की मंजूरी दे दी। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर उनको बाराचट्टी से खड़ा किया गया। वे चुनाव जीत कर विधायक बन गयीं। इसके बाद समाजवादियों ने उन्हें भुला दिया। 1977 में जनता पार्टी का दौर आया तो उनको फिर याद किया गया। वे फिर विधायक बनी। लेकिन इसके बाद वे 15 साल तक गुमनामी के अंधेरे में खोयी रहीं। लोग विधायक बन जाने के बाद धन दौलत खड़ा कर लेते हैं। लेकिन पूर्व विधायक भगवतिया देवी को रोजी-रोटी के लिए फिर मजदूरी करनी पड़ी। अगर लालू यादव की नजर उन पर नहीं पड़ती तो शायद वे पत्थर तोड़ती ही रह जातीं।

जनता के दिल को छू लेते हैं लालू

जनता के दिल को छू लेते हैं लालू

शिवानंद तिवारी छात्र जीवन से ही लालू के करीबी रहे हैं। वे लालू-नीतीश से सीनियर हैं, इस लिए दोनों पर हक जमाते रहे हैं। शिवानंद तिवारी की कई बार लालू से लड़ाई हुई। इसके बाद भी लालू उनके लिए यारो के यार हैं। उनके पास लालू से जुड़े अनगिनत संस्मरण हैं। एक बार उन्होंने बताया था कि लालू क्यों जननेता बने। बात उस समय की जब लालू को सीएम बने कुछ ही दिन हुए थे। एक दिन वे लालू यादव के साथ एक सभा में शामिल होने के लिए पटना जिले के एक गांव में गये थे। लालू और शिवानंद समय पर सभास्थल पर पहुंच गये थे, लेकिन आयोजकों को अतापता नहीं था।

जानने वालों को भूलते नहीं लालू

गांव के मुहाने पर ही दलित बस्ती थी। जब उन लोगों ने देखा कि लालू यादव आ गये हैं तो वहां जुट गये। भीड़ में से एक गरीब महिला बहुत देर से लालू की तरफ देख रही थी। शायद वह प्रतीक्षा कर रही थी कब लालू यादव की आंखें उसकी तरफ घूमती हैं। लालू ने जैसे ही उस महिला को देखा दूर से ही पूछ , सुखमनी तुम यहां क्या कर रही हो ? तुम्हारी शादी इसी गांव में हुई है क्या ? महिला ने सिर हिला कर हामी भरी। लालू ने फिर उसकी बड़ी बहन का नाम लेकर पूछा कि वह कहां है। उसने बताया कि उसकी शादी भी बगल के गांव में हुई है। महिला के गोद में एक छोटा बच्चा था। लालू ने अपनी जेब से पांच सौ रुपये का एक नोट निकाला और महिला को देते हुए कहा कि बच्चे को मिठाई खिला देना। सभास्थल पर मौजूद लोग लालू के इस निराले अंदाज को देख कर अभिभूत हो गये। सभा के बाद जब शिवानंद तिवारी ने उस महिला के बारे में पूछा तो लालू ने बताया। वे उस महिला को तब से जानते थे जब वह वेटनरी कॉलेज के चपरासी क्वार्टर में रहते थे। छात्र राजनीति में सक्रिय थे। वह महिला तब छोटी लड़की थी और उनके क्वार्टर के पास ही एक मुसहर झोपड़पट्टी में रहती थी। काम के सिलसिले में वह वेटनरी कॉलेज के क्वार्टरों में आती थी। सीएम बन जाने के बाद भी लालू उस गरीब लड़की का नाम भूले नहीं थे। इन्ही कई बातों ने लालू यादव को जनता का नेता बनाया।

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