जब मोदी को ना बुलाए जाने की शर्त ना मानने से नीतीश ने रद्द कर दिया था भोज

नई दिल्ली। अगर जून 2010 में नितिन गड़करी ने नरेन्द्र मोदी की बात मान ली होती तो आज नीतीश और भाजपा नदी के दो किनारों की तरह अलग -अलग रहते। अदावत की जंग चल रही होती। लेकिन गडकरी और लाल कृष्ण आडवाणी के धैर्य और समझबूझ ने ऐसी नौबत नहीं आने दी। तब नरेन्द्र मोदी गडकरी पर खफा भी हुए थे, लेकिन बाद में ये फैसला उनके लिए फायदेमंद साबित हुआ।

 जून 2010, पटना

जून 2010, पटना

2009 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा सत्ता से दूर रह गयी थी। अन्य दलों के समर्थन से मनमोहन सिंह ने फिर सरकार बनायी। लेकिन ये चुनाव बिहार में भाजपा के लिए मुफिद साबित हुआ। भाजपा और जदयू ने मिल कर 32 सीटें जीतीं थीं। बिहार में भाजपा और जदयू की संयु्क्त सरकार थी। इस बीच भाजपा ने फैसला लिया कि पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक पटना में आयोजित होगी। 16 साल बाद पटना में भाजपा की यह अहम बैठक होने वाली थी। 12 -13 जून को यह बैठक निर्धारित थी। इसके लिए पटना के होटल मौर्य में एक कृत्रिम नगर बसाया गया था जिसको चाणक्य नगर का नाम दिया गया था।

नीतीश बनाम मोदी

नीतीश बनाम मोदी

लालकृष्ण आडवाणी समेत भाजपा के शीर्ष नेता पटना आ चुके थे। इसमें गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी भी शामिल थे। सब कुछ अच्छा चल रहा था। कार्यसमिति की बैठक के पहले नीतीश ने भाजपा नेताओं के लिए भोज का आयोजन किया था। भोज से एक दिन पहले नीतीश पटना से बाहर गये हुए थे। शाम को पटना आये तो भोज की तैयारियों का जायजा लिया। स्वादिष्ट व्यंजन बनने शुरू हो गये। लेकिन सुबह होते ही सब कुछ अचानक बदल गया। पटना के सभी अखबारों में एक विज्ञापन छपा था। इस विज्ञापन में नरेन्द्र मोदी और नीतीश कुमार एक साथ हाथ जोड़ कर ऊपर उठाये हुए थे। ये तस्वीर पुरानी थी जो कि लुधियाना में एनडीए की रैली के दौरान ली गयी थी। इस विज्ञापन में गुजरात द्वारा बिहार को दी गयी पांच करोड़ रुपये की सहायता का भी जिक्र था। 2008 में कुसहा त्रासदी के बाद बिहार में भयंकर बाढ़ आयी थी। बाढ़ राहत और पुनर्वास के लिए अन्य राज्यों की तरह गुजरात ने भी सहायता राशि दी थी। इस विज्ञान को देख कर नीतीश आगबबूला हो गये। नरेन्द्र मोदी से उनको सख्त परहेज था। नीतीश को लगा कि इस तस्वीर से उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि को आंच आ सकती है। दान देकर ढिंढोरा पीटना भी अनुचित था। गुस्से में नीतीश ने भाजपा को दिया जाने वाला भोज रद्द कर दिया। नीतीश ने बाद में गुजरात को सहायता राशि भी लौटा दी। नफऱत की राजनीति हावी थी।

 नीतीश की शर्त

नीतीश की शर्त

यह कोई सामान्य भोज नहीं था। भाजपा के शीर्ष नेता इसमें शामिल होने वाले थे। सुशील कुमार मोदी के मुताबिक, नीतीश ने भोज रद्द करने से पहले एक शर्त रखी थी। नीतीश ने कहा था कि अगर भोज में नरेन्द्र मोदी नहीं आएं तो ये मुमकिन है। नीतीश की इस शर्त को मानने से आडवाणी ने इंकार कर दिया था। तब जा कर नीतीश ने भोज रद्द करने का एलान किया था। भोज रद्द होने से आडवाणी, गडकरी, अरुण जेटली, राजनाथ सिंह जैसे कई बड़े नेताओं का घोर अपमान हुआ। नरेन्द्र मोदी नीतीश पर बिफर गये। उन्होंने भाजपा के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन गडकरी से मांग कर दी कि पार्टी नीतीश सरकार से समर्थन वापस ले ले। मोदी ने गड़करी से कहा कि नीतीश भी सीएम ही हैं। फिर उनके अपमान को सहने के लिए मुझे क्यों बाध्य किया जा रहा है।

मोदी की मांग को गडकरी ने किया था खारिज

मोदी की मांग को गडकरी ने किया था खारिज

भोज रद्द होने से भाजपा के नेताओं के बहुत आघात लगा। वरिष्ठ नेताओं की आपात बैठक हुई। नरेन्द्र मोदी समर्थन वापसी की मांग पर अड़े रहे। इस समय नीतीश सरकार भाजपा के समर्थन से चल रही थी। जदयू के 88 सदस्य थे तो भाजपा के 54 सदस्य थे। अगर भाजपा समर्थन वापस ले लेती तो नीतीश सरकार गिर जाती। आडवाणी ने नरेन्द्र मोदी को धैर्य रखने की सलाह दी। चार महीने बाद ही बिहार विधानसभा के चुनाव होने थे। भाजपा नहीं चाहती थी कि उसके हाथ से एक और सत्ता चली जाए। भावी राजनीति को ध्यान में रख भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने अपमान का घूंट पीना मंजूर कर लिया। उस समय नरेन्द्र मोदी पार्टी के लोकप्रिय नेता थे लेकिन सबसे ताकतवर नहीं हुए थे। अध्यक्ष होने के नाते गडकरी ने मोदी की मांग को खारिज कर दिया। अगर उस समय नीतीश की सरकार गिरती तो भाजपा के साथ न खत्म होने वाली अदावत शुरू हो जाती। उस समय जो फैसला गलत लग रहा था आज वो राजनीति में नये गुल खिला रहा है। नीतीश और नरेन्द्र मोदी आज एक दूसरे के कद्रदान बन चुके हैं। एक दूसरे की तारीफों के पुल बांधने में दोनों पीछे नहीं हटते।

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