Lok Sabha Election: यूपी और हरियाणा में बीजेपी ने जाट वोट के लिए क्यों अपनाई अलग-अलग रणनीति?
Lok Sabha Election 2024 News: 2014 और 2019 दोनों ही लोकसभा चुनावों में भाजपा को हरियाणा और उत्तर प्रदेश में जाट मतदाताओं का भरपूर समर्थन मिला था। लेकिन, इस बार बीजेपी को जाट वोट बैंक को अपने साथ बनाए रखने के लिए विशेष रणनीति पर काम करना पड़ रहा है।
दरअसल, दो-दो बार के किसान आंदोलन और कुछ महिला पहलवानों की नाराजगी की वजह से जाटों के एक वर्ग में खासकर हरियाणा में बीजेपी के लिए नाराजगी सामने आई है।

जाट वोट के लिए हरियाणा और यूपी में बीजेपी की अलग रणनीति
इसी वजह से पार्टी ने इस बार के लोकसभा चुनाव के लिए यूपी और हरियाणा में अलग-अलग तैयारी की है। यूपी में इस बार समाजवादी पार्टी की अगुवाई वाले इंडिया ब्लॉक का मनोबल तोड़ने के लिए पार्टी ने आरएलडी के जयंत चौधरी को अपने साथ कर लिया है।
यूपी में जयंत चौधरी को लिया साथ
यूं तो पूरे यूपी की बात करें तो 2011 की जनगणना के मुताबिक प्रदेश में जाटों की आबादी लगभग 2% ही है। लेकिन, पश्चिमी यूपी में भाजपा को अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए जाटों के पूर्ण समर्थन की आवश्यकता है।
आरएलडी के लिए जीती हुई सीट भी छोड़ी
इस इलाके में करीब 25 विधानसभा क्षेत्रों में जाटों की जनसंख्या 30 से 35% तक है। अगर सपा जयंत चौधरी की वजह से जाट वोट बैंक में सेंध लगाने में सफल होती तो पश्चिमी यूपी में भाजपा का समीकरण बिगड़ने का डर था।
इसी वजह से बीजेपी ने 2019 में अपनी जीती हुई बागपत सीट भी आरएलडी को देने को तैयार हो गई है। इसके अलावा उसे बिजनौर की सीट भी दी गई है।
हरियाणा में जेजेपी से टूटने दिया गठबंधन
लेकिन, हरियाणा में पार्टी दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी की दो लोकसभा सीटों की मांग मानने को राजी नहीं हुई और वह गठबंधन से बाहर हो गई। जबकि, चार वर्षों से ज्यादा समय से जेजेपी ने भाजपा की भरोसेमंद सहयोगी का काम किया।
यूपी और हरियाणा के लिए क्यों अपनानी पड़ी अलग रणनीति?
भाजपा सूत्रों की मानें तो जाट वोट बैंक के लिए दोनों राज्यों में अलग रणनीति अपनाने की जरूरत थी। पश्चिमी यूपी में कई सीटों पर मुसलमानों की बड़ी आबादी है, जो आमतौर पर भाजपा को वोट नहीं करते। ऐसे में अगर आरएलडी भाजपा के साथ आ गई है, तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सीटें हारने का खतरा टल गया है।
हरियाणा में बीजेपी-विरोधी वोट डायवर्ट करने की रणनीति
लेकिन, हरियाणा में पार्टी की ओर से कुछ हालिया सर्वेक्षणों से पता चलता है कि जाट वोटरों का एक वर्ग किसान आदोलन और पहलवानों के मुद्दों की वजह से कांग्रेस की ओर शिफ्ट कर सकता है।
वैसे भी राज्य में जाटों के सबसे नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा की अभी भी पार्टी पर पकड़ है। दूसरी तरफ बीजेपी के पास राज्य में उनकी तरह का कोई कद्दावर जाट चेहरा नहीं है।
हरियाणा भाजपा के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक जाट वोटों के एकजुट होने की स्थिति में गैर-जाट वोटों की गोलबंदी की संभावना रहती है, जिसका पार्टी को फायदा मिल सकता है।
इस वजह से बीजेपी को उम्मीद है कि जेजेपी अगर अलग चुनाव लड़ेगी तो वह कांग्रेस के जाट वोटों में भी सेंध लगा पाएगी, जिससे पार्टी को लोकसभा के साथ-साथ इसी साल होने वाले विधानसभा चुनावों में भी मदद मिलेगी।
हरियाणा में जाट बहुत बड़ा वोट बैंक हैं
राज्य में हुए नेतृत्व परिवर्तन और जेजेपी के सरकार से बाहर होने पर कांग्रेस इसी वजह से परेशान भी हुई है। क्योंकि,उसे लगता है कि यह बीजेपी-विरोधी वोट को बांटने के लिए किया गया है। हरियाणा में जाटों की जनसंख्या करीब 25% अनुमानित है।
देश की करीब 40 लोकसभा सीटों पर जाट वोटरों का प्रभाव
जाट मतदाता सिर्फ यूपी और हरियाणा में ही नहीं, देश के करीब 40 लोकसभा सीटों और लगभग 160 विधानसभा सीटों पर चुनावों को प्रभावित करने का दम रखते हैं। इनमें राजस्थान और दिल्ली भी शामिल हैं।
यूपी, राजस्थान, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश में जाट ओबीसी में आते हैं, लेकिन ये केंद्रीय लिस्ट में इसमें शामिल नहीं हैं। लेकिन, राजस्थान के भरतपुर और धौलपुर जिलों में जाट केंद्रीय सूची में भी ओबीसी में शामिल किए गए हैं।












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