Lok Sabha Chunav: मोदी को धमकाने वाले इमरान मसूद के ढीले क्यों पड़ गए तेवर, अब तो राम नाम जपने लगे!

Lok Sabha Election 2024 UP: एक दशक पहले नरेंद्र मोदी के खिलाफ बहुत ही आपत्तिजनक और भड़काऊ बयान देने की वजह से कुख्यात हो चुके इमरान मसूद लगातार तीसरी बार भी कांग्रेस के टिकट पर सहारनपुर से चुनाव लड़ रहे हैं। लेकिन, अबकी बार न तो उनकी बातों में वह कट्टरता दिख रही है और न ही उनका वह तेवर ही बचा है।

एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में इमरान मसूद ने कहा है कि वह तो 'पहले से ही ऐसे' हैं। उनके मुताबिक 'सांप्रदायिकता तो उन्हें छूकर भी नहीं गुजर सकती'। यही नहीं, अयोघ्या के भव्य राम मंदिर में भगवान राम लला की प्राण प्रतिष्ठा क्या हुई वह तो पूरी तरह से 'राममय' हो चुके हैं।

saharanpur imran masood

राम नाम जपने लगे इमरान मसूद!
सहानपुर से कांग्रेस प्रत्याशी इमरान मसूद कह रहे हैं, 'ये देश राम का है। राम से कौन दूरी रख सकता है? दिखा कर आप थोड़े ही न नजदीकी दिखाओगे। आस्था मन से होती है। आस्था दिल से होती है। देश के अंदर बहुसंख्यक राम हैं, तो अल्पसंख्यक हम भरत हैं। भरत की पीड़ा को बिना कहे महसूस कर लें, वही तो राम हैं।'

सहारनपुर से लगातार तीसरी बार किस्मत आजमा रहे हैं इमरान मसूद
दरअसल, उनसे पूछा गया था कि कांग्रेस तो राम से दूरी बनाकर चल रही है, इसी पर उन्होंने कहा है कि ऐसा कौन कह सकता है। उनका अब मानना है कि राम की मर्यादा पर तो सबको चलना चाहिए। इमरान मसूद का यह हृदय परिवर्तन यूं ही नहीं हुआ है। सहारनपुर ने उन्हें लगातार दो बार रिजेक्ट किया है।

अबकी बार ध्रुवीकरण से लगता है डर!
हकीकत ये है कि उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में सपा-कांग्रेस गठबंधन और बीजेपी दोनों ही ध्रुवीकरण से बचना चाहते हैं। यही वजह है कि इमरान मसूद के तेवर नरम हैं और वह इस समय मुख्य रूप से हिंदू बहुल गांवों में चुनाव प्रचार पर फोकस कर रहे हैं। वह 9 बार के सांसद रशीद मसूद के भतीजे हैं, जिनका लंबा सियासी करियर हिंदुओं के समर्थन पर ही टिका था।

इस वजह से बड़ी रैलियों से बना ली है दूरी
मसूद को यह बात समझ में आ चुकी है कि अगर उन्हें सहारनपुर से चुनाव जीतना है तो अपने चाचा के गैर-मुस्लिम समर्थकों का भी आशीर्वाद लेना पड़ेगा। ईटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक इसके चलते उनका खेमा बड़ी रैलियों और चुनाव सभाओं से भी परहेज कर रहा है।

बसपा के मुस्लिम प्रत्याशी ने भी बढ़ा दी है चिंता
उनके एक समर्थक के मुताबिक, 'बड़ी रैलियों या आम सभाओं में ज्यादा संख्या में मुसलमानों के जुटने से दूसरे समुदाय में ध्रुवीकरण की स्थिति पैदा हो सकती है।' इस बार बीएसपी ने यहां से माजिद अली को टिकट दिया है, जिससे मुसलमान वोट के एकतरफा इंडिया ब्लॉक के समर्थन में ध्रुवीकरण की संभावना नहीं है।

भाजपा ने अपने जनाधार को किया है मजबूत
2019 में सपा-बसपा गठबंधन के प्रत्याशी फजलुर रहमान (बीएसपी) ने बीजेपी के उम्मीदवार राघव लखनपाल शर्मा को करीब 23,000 वोटों के अंतर से हराया था। बीजेपी को लगता है कि तब उसके सैनी, कश्यप और गुर्जर वोट बैंक में सेंध लग गई थी। लेकिन, उसके बाद पार्टी ने इनपर खास ध्यान दिया और 2022 में वह सहारनपुर लोकसभा की 3 और कैराना की 2 विधानसभा सीट जीतने में सफल रही।

भाजपा ने फिर से राघव लखनपाल को ही प्रत्याशी बनाया है और उसे लग रहा है कि बसपा प्रत्याशी की वजह से मुस्लिम वोट का पूरी तरह से मसूद के पक्ष में ध्रुवीकरण की बहुत कम संभावना है। एक बीजेपी समर्थक का कहना कि बसपा और सपा उम्मीदवारों में से किसी को भी 2,50,000 लाख से ज्यादा वोट आ गए, तो शर्मा आसानी से जीत जाएंगे।

2014 के समीकरण में भी कमजोर पड़ सकते हैं मसूद
भाजपा की उम्मीदों की बहुत बड़ी वजह 2014 का चुनावी समीकरण भी है। तब सपा, बसपा और कांग्रेस तीनों अलग-अलग चुनाव लड़े थे। तब भी कांग्रेस से इमरान मसूद थे और सपा ने भी मुसलमान उम्मीदवार शाजन मसूद को उतारा था। बीएसपी ने तब जगदीश सिंह राणा को टिकट दिया था, जिन्हें 2,35,033 वोट मिले थे।

सपा के मुस्लिम उम्मीदवार को 52,765 वोट आए थे और इमरान मसूद 4,07,909 वोट लाकर भी बीजेपी से 65 हजार से ज्यादा वोटों से हार गए थे। बीजेपी इस बार ओबीसी वोटरों के बीच खास कोशिश तो कर रही रही है, उसके प्रत्याशी रोजाना 6 से 7 दलित बहुल गांवों में भी चुनाव प्रचार के लिए पहुंच रहे हैं।

इसलिए नरम पड़ गए हैं इमरान मसूद के तेवर!
पार्टी नेता मनिपाल वाल्मीकि ने कहा है, 'हमारे लिए अनुसूचित जाति के मतदाता मायने रखते हैं। चुनावों में वे निर्णयकारी फैक्टर हैं। हमें उम्मीद है कि उन्हें हम अपने पक्ष में जोड़ लेंगे।'

बदले हालातों की वजह से ही 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की 'बोटी-बोटी काटने' की धमकी देने वाले मसूद के सुर बदले-बदले नजर आ रहे हैं।

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