Lok Sabha Chunav: सहयोगी दल ही न लगा दें 'मिशन 400' पर ब्रेक! NDA में कहां फंस गई BJP?

Lok Sabha Election: बीजेपी के इस बार अलग-अलग राज्यों में अपनी कुछ सहयोगियों पार्टियों की वजह से मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। कई राज्यों में तो स्थिति ये है कि सहयोगी दल भाजपा नेताओं पर ही पूरी तरह से निर्भर नजर आ रहे हैं। लेकिन, कुछ जगहों पर स्थिति पूरी तरह से अलग है।

ऐसे राज्यों में पार्टनरों के चलते भाजपा के साथ आगे कुआं, पीछे खाई वाली परिस्थिति पैदा होने का संकट भी मंडरा रहा है। 2019 में बीजेपी ने 300 का आंकड़ा पार किया था तो उसमें कर्नाटक की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण थी। लेकिन, इस बार जेडीएस नेताओं पर हुए खुलासों की वजह से पार्टी को पूरे देश में रक्षात्मक होना पड़ रहा है।

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टीडीपी ने मुस्लिम आरक्षण का वादा कर बीजेपी की बढ़ाई मुश्किल
इस बीच करीब पांच साल बाद एनडीए के पूर्व सहयोगी चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी वापस एनडीए में लौटी तो भारतीय जनता पार्टी को उम्मीद थी कि आंध्र प्रदेश की 25 लोकसभा सीटों में उसके गठबंधन को फायदा मिल सकता है, जो कि '400 पार' के लक्ष्य में बड़ा रोल निभा सकता है।

लेकिन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी बीजेपी जिस मुस्लिम आरक्षण की आशंका को लेकर पूरे देश में कांग्रेस को घेरने की कोशिश में हैं, उस मुद्दे पर चंद्रबाबू नायडू ही पलीता लगाने में जुटे हैं। आंध्र प्रदेश में लोकसभा के साथ-साथ विधानसभा के भी चुनाव हो रहे हैं। उन्होंने वहां सत्ता में आने पर मुसलमानों को 4% आरक्षण देने का वादा किया है।

आंध्र प्रदेश में लोकसभा की 25 और विधानसभा की 175 सीटें हैं। राज्य की 40-50 विधानसभा सीटों पर मुस्लिम वोटर प्रभावी भूमिका में हैं और टीडीपी ने यही सोचकर यह चुनावी दांव चलने की कोशिश की है। लेकिन, इसके चलते कांग्रेस के खिलाफ बीजेपी के अभियान की धार कुंद हो रही है।

मुस्लिम आरक्षण के मुद्दे पर बीजेपी के निशाने पर है कांग्रेस
बता दें कि पीएम मोदी मुस्लिम आरक्षम मुद्दे पर कांग्रेस और इंडिया ब्लॉक पर हमलावर हैं और इसे ओबीसी, दलित और आदिवासियों के हक छीनने की कोशिश से जोड़ रहे हैं। अब जब बीजेपी की सहयोगी ही खुलेआम मुस्लिम रिजर्वेशन की बात कर रही है तो इससे भाजपा की अपनी सबसे आक्रामक लड़ाई कमजोर हो सकती है।

बीजेपी के भरोसे चुनाव मैदान में हैं कमजोर सहयोगी!
वैसे आंध्र प्रदेश में बीजेपी जरूर टीडीपी के प्रदर्शन पर ज्यादा निर्भर है। लेकिन, बिहार और कर्नाटक जैसे राज्यों में सहयोगी दलों को इस बार बीजेपी की बैसाखी की ज्यादा जरूरत नजर आ रही है। वहां सहयोगी दलों को भी अपने नेताओं से ज्यादा पीएम मोदी और यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ जैसे भाजपा के स्टार प्रचारकों पर भरोसा दिख रहा है।

महाराष्ट्र में भी भाजपा के कंधों पर है ज्यादा भार!
इसी तरह से महाराष्ट्र में पिछली बार बीजेपी और शिवसेना का प्रदर्शन बहुत शानदार रहा था। लेकिन, इस बार शिवसेना बंटी हुई ताकत के साथ चुनाव मैदान में है। बीजेपी को एनसीपी के रूप में एक नई साथी जरूर मिली है। लेकिन, अजित पवार की अगुवाई वाली पार्टी भी राज्य में महायुति की जीत से ज्यादा अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है।

इन दोनों ही दलों को अपनी कमजोर ताकत को मजबूत करने के लिए भाजपा की शक्ति पर ज्यादा भरोसा नजर आ रहा है। इस तरह से दो चरणों के चुनाव के बाद यही लग रहा है कि भाजपा इस बार न सिर्फ एनडीए की अगुवाई कर रही है, बल्कि उसे 400 पार का लक्ष्य तय करने के लिए भी अपने ही कंधों पर ज्यादा बोझ उठाना है।

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