लिव इन रिलेशन ना अपराध है ना पाप, बने समुचित कानून: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। देश की सबसे बड़ी अदालत ने देश की संसद से कहा है कि लिव इन रिलेशन और इससे पैदा हुए बच्चों के लिए समुचित कानून व्यवस्था होनी चाहिए। क्योंकि यह एक बेहद गंभीर मुद्दा है। कोर्ट ने कहा कि लिव इन रिलेशन में रहना ना तो कोई क्राइम है और ना ही कोई पाप। लेकिन लिवइन रिलेशन की परिभाषा को ठीक ढंग से समझना होगा। बिना शादी के किसी के साथ रहना..यह किसी का निजी फैसला हो सकता है, इसमें हस्तकक्षेप करने का किसी को हक नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस के एस राधाकृष्णन और पिनाकी चंद्र घोष ने लिव इन रिलेशन के एक अहम केस पर फैसला सुना रहे थे। इस केस में एक युवक-युवती लिव इन रिलेशन में लंबे वक्त से थे। युवक शादीशुदा और दो बच्चों का पिता था बावजूद इसके अपनी मर्जी से युवती उसके साथ लिवइन रिलेशन में थी। लेकिन थोड़े ही दिन बाद उसे एहसास हुआ कि वह युवक उसके साथ केवल पैसों के लिए रह रहा है तो उसने युवक के ऊपर गुजारा भत्ता का दावा ठोंक दिया।

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस के एस राधाकृष्णन और पिनाकी चंद्र घोष ने अपने फैसले में कहा कि किसी शादीशुदा और बाल बच्चों वाले युवक के साथ लिव इन रिलेशनशिप में रहना और फिर गुजारा भत्ता की मांग करना गलत है क्योंकि ऐसे में वैध पत्नी और उसके बच्चों में गलत असर पड़ता है और यह उनलोगों के साथ अन्याय की श्रेणी में भी आता है। किसी भी लिव इन महिला पार्टनर को पत्नी का दर्जा नहीं मिल सकता है।

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