अब शेर तो घास नहीं खाएगा न सर!
एक ज़ू में जानवरों के लिए मांस का प्रबंध करने में ज़ू प्रशासन के पसीने छूट रहे हैं.
"प्लीज डू नॉट फ़ीड द ऐनिमल्स. इट मेक्स देम सिक. ज़ू डायट्स आर ग्रेट." (कृपया जानवरों को ना खिलाएं. इससे वे बीमार हो सकते हैं. चिड़ियाघर का भोजन सबसे अच्छा है.)
रांची के भगवान बिरसा जैविक उद्यान में घूमते वक्त कई जगहों पर यह संदेश टंगा मिलेगा. खासकर जानवरों के पिंजरों के पास.
लेकिन अब इन जानवरों के खाने पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं. झारखंड में अवैध बूचड़खानों की बंदी के बाद चिड़ियाघर के लिए मांस जुटाने में कठिनाइयां आ रही हैं क्योंकि राजधानी रांची में एक भी वैध बूचड़खाना नहीं है.
मांस बेचने वाली दुकानों के लाइसेंस भी रद्द कर दिए गए हैं. ऐसे में इनके लिए मांस का प्रबंध कर पाने में जू प्रशासन के पसीने छूट रहे हैं.
'यूपी के शेर क्या चिकन के बाद घास खाएंगे?'
हर रोज़ दस किलो मांस
रांची ज़ू के एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, "यहां 1000 से भी अधिक जानवरों का बसेरा है. इनमें क़रीब तीन दर्जन मांसाहारी हैं. इनमें शेरनी प्रियंका समेत कुल चार शेर, तीन बाघ, 6 लेपर्ड और 1 लोमड़ी के अलावा 20 दूसरे मांसाहारी जानवर हैं. इनमें हाइना, जंगल कैट, सियार आदि शामिल हैं. ''
इनके भोजन के लिए रोज़ करीब 90 किलो मांस की जरूरत है.
रांची ज़ू में शेर की मांद की देखरेख करने वाले सुजीत उरांव ने बीबीसी को बताया कि स्वस्थ शेर रोज़ करीब 10 किलो भैंस का मांस खाता है. उसके बच्चे को दो किलो मीट चाहिए. साथ में मां का दूध भी.
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तेंदुए को चिकेन भी चाहिए
तेंदुआ केज के केयरटेकर ने बताया, "तेंदुए को रोज़ साढ़े तीन किलो मीट चाहिए. लेकिन वह चिकेन भी खा लेता है. लिहाज़ा, उसे तीन किलो भैंस का मीट और आधा किलो मुर्गे का मांस दिया जाता है. चिड़ियाघर के जानवरों को 24 घंटे में एक बार खाना दिया जाता है.''
हर शाम पांच बजे के क़रीब आगंतुकों के निकलने के बाद इनके केज में खाना रख दिया जाता है ताकि वे खाने के बहाने केज के अंदर आ जाएं और आराम करें.
सोमवार उनके उपवास का दिन होता है. इस दिन जानवरों को खाना नहीं दिया जाता. इससे उनकी पाचन प्रक्रिया ठीक रहती है.
खाना बिना ज़िंदगी
रांची ज़ू में पदस्थापित डॉक्टर अजय कुमार से जब मैंने यह पूछा कि कोई जानवर बगैर खाना खाए कितने दिनों तक जिंदा रह सकता है?
तो उन्होंने कहा कि यह बता पाना मुश्किल है.
उन्होंने बीबीसी को बताया कि जानवरों के लिए सब्स्टिच्यूट डायट भी उपलब्ध हैं. चीन जैसे देशों में तो रेडी-टू-इट फ़ूड भी चिड़ियाघर के जानवरों को दिए जाते हैं.
दरअसल, बूचड़खानों की बंदी के बाद सबसे ज़ू प्रशासन सकते में है. निदेशक समेत कोई भी अधिकारी मांस की आपूर्ति के मुद्दे पर कुछ भी बोलने से कतरा रहे हैं.
अलबत्ता रांची जू के निदेशक के हवाले से मीडिया में यह खबर आई थी कि वे जानवरों के लिए मांस की आपूर्ति को लेकर चिंतित हैं.
' ज़ू चाहे तो खुद कटवा सकता है मांस '
रांची नगर निगम के आयुक्त प्रशांत कुमार से जब मैंने यह पूछा कि क्या चिड़ियाघर प्रशासन ने आपको इस बाबत कोई पत्र लिखा है.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "हमें कोई पत्र नहीं मिला. लेकिन ज़ू प्रशासन चाहे तो अपने यहां मांस कटवा सकता है क्योंकि बूचड़खानों के संचालन के लिए लाइसेंस उन्हें लेना है, जो इसका व्यावसायिक उपयोग करना चाहते हैं."
उन्होंने बताया कि रांची में एक भी वैध बूचड़खाना नहीं है.
बहरहाल, यह सवाल कायम है कि बूचड़खानों की बंदी के बाद रांची ज़ू में मांस की आपूर्ति कहां से हो रही है और वह कितनी हाइजेनिक है.
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