सिर्फ राजनेता ही नहीं जनता भी ले राहुल गांधी से पांच सबक
नई दिल्ली। बड़ी बेसब्री से देश की जनता और राजनीतिक पार्टियों को 16वीं लोकसभा के लिए चुनावों का इंतजार था और 12 मई को आखिरी दौर की वोटिंग के साथ वह इंतजार भी पूरा हो गया। अब सबको 16 मई का इंतजार है जब इन चुनावों के नतीजे पूरे देश के सामने होंगे।
लेकिन नतीजों से पहले 12 मई को ही आए एग्जिट पोल ने सबके दिल की धड़कनों को बढ़ा दिया है और कुछ हद तक कहीं न कहीं राजनीतिक दलों की स्थिति को भी साफ कर दिया है।
जहां बीजेपी सबसे बड़े दल के रूप में सामने आ रही है तो वहीं कांग्रेस सबसे बड़ी हार की ओर बढ़ती नजर आ रही है। बडे़ अरमानों के साथ जनवरी 2013 में जयपुर में हुए एक अधिवेशन में राहुल गांधी को कांग्रेस पार्टी के उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
इसके साथ ही पार्टी वर्ष 2014 में होने वाले लोकसभा चुनावों की तैयारियों में जुट गई। राहुल गांधी ने जब वर्ष 2004 में अमेठी में चुनाव लड़ने के साथ ही सक्रिय राजनीति के क्षेत्र में कदम रखा था उस समय यह उम्मीद मजबूत होती जा रही थी कि शायद अब देश अब एक युवा नेतृत्व के साथ आगे बढ़ सकेगा।
ऐसा नहीं हुआ बल्कि राहुल गांधी जहां भी कांग्रेस पार्टी के प्रचार के लिए वहां पर पार्टी को असफलता ही हाथ लगी।
यह बात कहीं न कहीं कांग्रेस को माननी पड़ेगी कि राहुल गांधी न तो करिश्माई नेता साबित हो सकें हैं और न ही उनके चुनाव प्रचार से पार्टी को कभी कोई मदद मिली। राहुल की रैलियों में जनता तो उमड़ती है लेकिन जनता की वह भीड़ अब कांग्रेस के लिए वोट बैंक में तब्दील नहीं हो पा रही है।
आखिर ऐसा क्या हो गया जो राहुल गांधी जनता को अपनी पार्टी के पक्ष में वोट करने के लिए प्रेरित नहीं कर पाते हैं। एक नजर डालिए उन कुछ प्वाइंट्स जो जनता को राहुल गांधी से सीखने की जरूरत है।

'अगर भारत कंप्यूटर तो कांग्रेस डिफाल्ट प्रोग्राम'
राजनीति के विशेषज्ञ अक्सर यह कहते हैं कि राहुल गांधी अति आत्मविश्वासी हैं लेकिन शायद कोई इस बात पर यकीन नहीं करना चाहता। लेकिन जब राहुल गांधी ने अगस्त 2013 में कांग्रेस के एक सम्मेलन के दौरान कहा कि अगर भारत एक कंप्यूटर है तो कांग्रेस उसका डिफॉल्ट प्रोग्राम है, तो उनका अति आत्मविश्वास सामने आ गया।

भविष्य के लिए खतरा
न सिर्फ लोकसभा चुनाव बल्कि राहुल गांधी जब कभी विधानसभा चुनावों के लिए भी पार्टी का प्रचार करने गए तो सिर्फ कुछ उपलब्धियों के आधार पर अपनी पार्टी ही गुणगान करते रहे। आज शायद वोटर्स को उनकी कुछ उपलब्धियों मनरेगा, आरटीआई और खाद्य सुरक्षा बिल के अलावा कुछ और याद ही नहीं हैं।

असफलताओं से भागते राहुल गांधी
राहुल गांधी ने कभी भी कांग्रेस या यूपीए की नाकामयाबियों का जिक्र ठीक नहीं समझा। राहुल गांधी ने कभी भी देश में बढ़ती महंगाई या फिर भ्रष्टाचार को सरकार की नाकामयाबियों के तौर पर नहीं गिनाया। एक संभावित नेता के तौर पर लोगों को राहुल गांधी से कुछ जवाब चाहिए थे लेकिन वह अक्सर ही बचते नजर आए।

न अखिलेश यादव को कुछ समझा और न ही नरेंद्र मोदी को
वर्ष 2012 में जब उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाले थे तो राहुल गांधी वहां पर चुनाव प्रचार के लिए गए। राहुल गांधी ने हमेशा ही उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की पहुंच को मानने से इंकार कर दिया। कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी हार का सामना करना पड़ा। इसी तरह से 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान भी राहुल गांधी, अपने दुश्मन या फिर विपक्षी की ताकत को आंक नहीं सके और नतीजा शायद एक बार फिर सामने आएगा।

घोषणा पत्र को फाड़ने के बात बिल को फाड़ने की बात
राहुल गांधी जिस तरह से आक्रामक रवैया या गुस्सा जनता के बीच पेश करते हैं, वह शायद उनके खिलाफ काम करता है। अगर आपको याद हो तो वर्ष 2012 के उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों के दौरान राहुल गांधी जब उत्तर प्रदेश में एक चुनावी रैली कर रहे थे, उस समय उन्होंने समाजवादी पार्टी का घोषणा पत्र फाड़ डाला था। इस बार भी लोकसभा चुनावों से पहले सितंबर 2013 में तो उन्होंने उस बिल को फाड़कर फेंकने की बात कर डाली जो दागी सांसदो सें जुड़ा था।












Click it and Unblock the Notifications