अपने ही गाने नहीं सुनती थीं लता मंगेशकर, स्वर साम्राज्ञी के बारे में कुछ खास रोचक तथ्य जानिए
नई दिल्ली, 6 फरवरी: धरती की महान गायिका और भारत रत्न लता मंगेशकर का जाना सिर्फ हम भारतीयों के लिए अपूर्णीय क्षति नहीं है। यह सुरों के जरिए पूरी मानवता को एकसूत्र में पिरोए रखने की उम्मीद पालने वाले लाखों-करोड़ों इंसान का नुकसान है। 'भारत की स्वर कोकिला' के नाम से मशहूर ये महान पार्श्व गायिका ने गायिकी के लिए अपने जीवन के बहुमूल्य 70 वर्षों से भी ज्यादा दिए। लता नहीं हैं, लेकिन उनकी जादुई मधूर आवाज हमेशा अमर रहेगी। आइए उनसे जुड़े कुछ ऐसे रोचक तथ्यों के बारे में जानते हैं।

लता मंगेशकर का जन्म कलाकारों के परिवार में हुआ
लता मंगेशकर का जिन्म ही कलाकारों के परिवार में हुआ था। उनके पिता खुद एक थियेटर कंपनी चलाते थे। ईश्वर का आशीर्वाद था कि लता का बचपन से ही संगीत के प्रति अप्रतिम लगाव रहा। पिता की विरासत को आगे बढ़ाना ही जीवन का मकसद था, इसलिए दोनों बहनों (लता मंगेशकर और आशा भोसने) ने गायिकी को बचपन से ही आत्मसात कर लिया। स्टारडस्ट को दिए एक पुराने इंटरव्यू में लता ने इस कारण के बारे में कहा था, 'ऐसे हुआ कि एक बार मेरे पिता ने अपने शागिर्द से कहा कि एक राग का अभ्यास करे, तब तक वह अपना कुछ काम निपटा लेते हैं। मैं बगल में ही खेल रही थी और अचानक राग में एक जगह शागिर्द अटक रहा था। अगले ही मिनट मैं उसे ठीक कर रही थी। जब मेरे पिता लौटकर आए तो उन्हें अपनी बेटी में ही एक शागिर्द मिल गया।'

मदन मोहन लता मंगेशकर के पसंदीदा संगीत निर्देशक थे
खुद लता मंगेशकर के शब्दों में उन्होंने जितने भी संगीत निर्देशकों के साथ काम किया, उनमें मदन मोहन के साथ उनकी विशेष बॉन्डिंग थी। 2011 में 'तेरे सुर और मेरे गीत' कार्यक्रम में उन्होंने बताया था, 'मदन मोहन के साथ मेरा विशेष रिश्ता था, जो कि एक गायिका और म्यूजिक कंपोजर से कहीं ज्यादा था। यह रिश्ता एक भाई और एक बहन का था।' उन्होंने जहां आरा के 'वो चुप रहे' को उनके साथ पसंसदीदा काम बताया।
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लता मंगेशकर राज्यसभा की सांसद भी रह चुकी थीं
लता मंगेशकर एक कार्यकाल के लिए यानी 1999 से 2005 तक राज्यसभा की सांसद भी रह चुकी थीं। उन्हें 1999 में राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया था। हालांकि, उन्होंने इस कार्यकाल पर नाखुशी जताई और दावा किया था कि उन्होंने अनिच्छा से संसद की सदस्यता स्वीकारी थी।

लता मंगेशकर का पहला ही गाना फिल्म से हटा दिया गया था
लता मंगेशकर ने फिल्मों के लिए पहला गाना गया था, 'नाचू या गड़े, खेलू सारी मणि हौस भारी'। यह गाना 1942 की एक मराठी फिल्म किटी हसाल का था। लेकिन, फिल्म के आखिरी कट में इसे दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से हटा दिया गया था।

लता मंगेशकर की शोहरत देशों की भौगोलिक सीमाओं की मोहताज नहीं थी
लता मंगेशकर सिर्फ भारत की सुरों की मल्लिका नहीं थीं। उनकी मधुर आवाज के चाहने वाले दुनिया भर में मौजूद रहे हैं और आगे भी रहेंगे। उन्हें लंदन के प्रतिष्ठित रॉयल अल्बर्ट हॉल में प्रदर्शन करने वाली पहली भारतीय होने का गौरव प्राप्त है। 2007 में फ्रांस ने उन्हें अपने देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'ऑफिसर ऑफ लीजन ऑफ ऑनर' से सम्मानित किया था।

लता मंगेशकर ने कभी भी ओपी नैय्यर के साथ काम नहीं किया था
सात दशक से भी ज्यादा के अपने शानदार करियर में लता को एक से बढ़कर एक भारतीय संगीतकार और संगीत निर्देशकों के साथ काम करने का मौका मिला था, लेकिन उन्होंने ओपी नैय्यर साहब के साथ कभी काम नहीं किया था।

2015 में लता मंगेशकर ने रिकॉर्ड किया था अपना आखिरी गाना
पिछले कई वर्षों से अपनी अधिक उम्र और खराब स्वास्थ्य की वजह से लता मंगेशकर गायिकी से दूर हो गई थीं। उन्होंने अपना पिछला और आखिरी गाना सात साल पहले 2015 में रिकॉर्ड किया था।

लता मंगेशकर खुद अपना गाना कभी नहीं सुनती थीं
बॉलीवुड हंगामा से बातचीत के दौरान एक बार लता मंगेशकर ने कहा था कि वह खुद अपना गाना नहीं सुनती हैं। इसका कारण बताते हुए वे बोली थीं कि अगर वह ऐसा करेंगी तो वो अपनी गायिकी में सैकड़ों गलतियां पकड़ लेंगी।












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