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लाल कृष्ण आडवाणी: 14 साल में घर छोड़ बने संघी, रथ यात्रा से भारत रत्न, ऐसा रहा PM in Waiting का सियासी सफर

Lal Krishna Advani Profile: भारतीय जनता पार्टी (BJP) वरिष्‍ठ नेता और भारत के पूर्व उप मुख्‍यमंत्री लाल कृष्‍ण आडवाणी की शुक्रवार की रात अचानक तबीयत बिगड़ गई। जिसके बाद उन्‍हें दिल्‍ली अपोलो अस्‍पताल में भर्ती करवाया गया है। दो दिन पहले भी उन्‍हें अस्‍पताल में चेकअप के लिए लाया गया था। उम्र संबंधी बीमारियों के कारण उन्‍हें अस्‍पताल में भर्ती करवाया गया है।

आडवाणी के अस्‍पताल में भर्ती होने के बाद देश की जानी-मानी हस्तियां उनके जल्‍द स्‍वस्‍थ होने की कामना कर रहे हैं। लालकृष्‍ण आडवाणी भाजपा के मजबूत स्‍तंभ हैं। भाजपा के संस्‍थापक सदस्‍यों में एक आडवाणी की भाजपा की नींव रखने में अहम भूमिका रही। आइए जानते हैं भारत के "लाल" आडवाणी के राजनीतिक सफर के बारे में....

Lal Krishna Advani

लाल कृष्‍ण आडवाणी का जन्‍म
लाल कृष्‍ण आडवाणी का जन्‍म 8 नवंबर 1927 में कराची में हुआ, तब कराची भारत का हिस्‍सा था क्‍योंकि भारत-पाकिस्‍तान का बंटवारा नहीं हुआ था।

लाल कृष्‍ण आडवाणी का परिवार
आडवााणी के पिता के डी आडवाणी और मां ज्ञानी आडवाणी थीं। लाल कृष्‍ण आडवाणी की पत्‍नी का नाम कमला आडवाणी है। आडवाणी का एक बेटा जयंत और बेटी प्रतिभा हैं।

लाल कृष्‍ण आडवाणी की पढ़ाई
लाल कृष्‍ण आडवाणी ने स्‍कूली पढ़ाई कराची में की। भारत-पाकिस्‍तान के बंटवारे के बाद उनका परिवार मुंबई आ गया और आडवाणी ने गर्वनमेंट लॉ कॉलेज से एलएलबी की डिग्री हासिल की।

14 साल की उम्र में घर छोड़कर संघी बन गए आडवाणी

14 साल की उम्र में ही लाल कृष्‍ण आडवाणी ने देशभक्ति की भावना मन में लिए अपना जीवन देश के नाम कर दिया। 1947 में जब देश को आजादी मिली तब भारत-पाकिस्‍तान विभाजन के कारण माहौल बदला हुआ था तभी 12 सिंतबर 1047 को आडवाणी कराची में अपना घर छोड़कर अपने साथी स्‍वयंसेवकों के संग भारत की राजधानी दिल्‍ली आ गए और यहां पर वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रचारक बन गए।

बंटवारे में आए लोगों के मददगार आडवाणी

दिल्‍ली आने के बाद सिंध से आए नेताओं और स्‍वयंसेवकों को योजना बनाने के लिए जोधपुर बुलाया गया और बंटवारे में आए लोगों की सहायता का निर्देश दिया गया। स्‍वयंसेवक, प्रचारक और भारतीय जनसंघ के कार्यकर्ता के तौर पर राजस्‍थान आडवाणी की कर्मभू‍मि रही।

अटल बिहारी वाजपेयी के सखा और मददगार आडवाणी

1957 में राजस्‍थान छोड़ आडवाणी दिल्‍ली अटल बिहारी और निर्वाचित सांसदों की मदद के लिए आए और जनसंघ के लिए सवाल-जवाब और नीतियां तय करने के साथ संसद का काम सीखा। दिल्‍ली में सबसे पहले आडवाणी अटल बिहारी वाजपेयी के घर में रहे और इसी दौरान उनकी गहरे मित्र बन गए।

पत्रकार लाल कृष्‍ण आडवाणी

1960 में आडवाणी ने आर्गनाइजर में सहायक संपादक का पदभार ग्रहण किया। ये आरएसए की विचारधारा वाला समाजचार पत्र था। इस पेपर के संपादक केवल रतन मलकानी थे ये भी सिंध से आए थे। आडवानी की उनसे अच्‍छी बनती थी और कुछ ही समय में अखबार के पाठक बहुत बढ़ गए। लगभग 7 वर्षो तक पत्रकार आडवाणी ने अपनी कलम के जरिए आरएसएस की विचारधारा को जन-जन तक पहुंचाया।

1967 में कलम छोड़ आडवाणी फिर बने जनसंघ नेता

1967 के बाद लगातार हुए तीन चुनावों में अपनी जनसंघ पार्टी के लिए आडवानी ने जमकर प्रचार किया और लोकसभा में 7 में से 6 और काउंसिल में 56 सीटों में से 33 और नगरपालिका में 100 में से 52 सीटों पर जनसंघ ने जीत हासिल की। 1962 में जनसंघ ने 14 और 1967 में 35 सीटों पर जीती। जनसंघ का राजनीतिक हनक बढ़ी। आडवाणी ने नगरपालिका से अपने राजनी‍तिक करियर की शुरूआत की थी।

काउसिंल से सीधे संसद पहुंचे लाल कृष्‍ण आडवाणी

1970 में इन्द्र कुमार गुजराल का कार्यकाल पूरा होने पर पद खाली हुआ और काउंसिल में जनसंघ का बहुमत होने के कारण आडवाणी चुनाव जीत गए और राज्‍य सभा सांसद बन गए और राज्‍यसभा में देश हित के मुद्दों को जोर-शोर से उठाया ।

रथ यात्रा के संयोजक लाल कृष्‍ण आडवाणी

लालकृष्‍ण कभी भाजपा के कर्णधार बन कर सामने आए तो कभी लौह पुरुष, लेकिन बचपन से लेकर आज तक कट्टर संघी बनकर हिंदुत्‍व की रक्षा करते नजर आए। आडवाणी के द्वारा 1990 में देश भर में निकाली गई रथ यात्रा एक मील का पत्‍थर साबित हुई। इसके अलावा राम मंदिर आंदोलन के अगुवा के रूप में आडवाणी की भूमिका भाजपा ही नहीं देश के इतिहास में दर्ज हो चुकी है। राम मंदिर आंदोलन में जेल भी गए और उन पर कई वर्षो तक केस भी चला।

भाजपा के कर्णधार लाल कृष्‍ण आडवाणी

1980 में भाजपा के गठन के समय भाजपा के मजबूत स्‍तंभ बने। आडवाणी का नेतृत्व भाजपा को आकार देने में महत्वपूर्ण रहा है, वे इसके सबसे लंबे समय तक अध्यक्ष रहे। पार्टी के एजेंडे को बढ़ावा देने में उनके प्रयासों, खासकर राम मंदिर आंदोलन के महत्वपूर्ण दौर के दौरान, ने भारतीय राजनीति में भाजपा की उपस्थिति को काफी मजबूत किया। उन्होंने पार्टी के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, देश में एक प्रमुख राजनीतिक ताकत के रूप में इसके उदय में योगदान दिया।

गृह मंत्री, उपमुख्‍यमंत्री लाल कृष्‍ण आडवाणी

राजनीति में उनका कार्यकाल कई महत्वपूर्ण पदों पर रहा है, जिसमें 1998 में भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में गृह मंत्री और 2002 से 2005 तक अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में उप प्रधानमंत्री का पद शामिल है। आडवानी सबसे लंबे समय तक सांसद के तौर पर काम करने वाले नेता रहे हैं।

लाल कृष्‍ण आडवाणी को भारत रत्‍न सम्‍मान

भाजपा में आडवाणी के योगदान और विभिन्न पदों पर उनके नेतृत्व के लिए उन्हें इस वर्ष 30 मार्च को भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया। इससे पहले, 2015 में, उन्हें भारतीय राजनीति पर उनके महत्वपूर्ण प्रभाव को देखते हुए देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था।

PM in Waiting लाल कृष्‍ण आडवाणी

भारत रत्‍न से सम्‍मानित लाला कृष्‍ण आडवाणी को पीएम इन वेटिंग भी कहा जाता है। इसकी वजह है कि आडवानी की आस थी कि जब भी भाजपा सरकार में आएगी, वो पीएम की कुर्सी संभालेंगे, तब नरेंद्र मोदी गुजरात के सीएम थे तो कोई बड़ा नेता नहीं था लेकिन मोदी शाह की जोड़ी ने इन्हें प्रधानमंत्री बनाने के बजाय परिचय मंडल एम डाल दिया। ऐसे में इतना शानदार राजनीतिक सफर वाले भारत के "लाल" लाल कृष्‍ण आडवानी का देश का प्रधानमंत्री बनने का सपना अधूरा ही रह गया है।

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