कोलकाता केस पर लिखी चिट्ठी पर केंद्र ने लगा दी ममता बनर्जी की फटकार, कहा- देरी छिपाने के लिए उठाया ये कदम

Kolkata Rape Murder Case: कोलकाता ट्रेनी डॉक्‍टर रेप-मर्डर मामले में पश्चिम बंगाल की मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार को एक के बाद एक दो पत्र लिखे थे। गुरुवार को भेजे गए दूसरे पत्र में ममता बनर्जी ने कोलकाता डॉक्टर के बलात्कार-हत्या मामले के मद्देनजर बलात्कार और हत्या जैसे जघन्य अपराधों पर कठोर केंद्रीय कानून और सख्‍त सजा के लिए अपना अनुरोध दोहराया था।

सीएम ममता के इस पत्र का जवाब केंद्र सरकार की ओर से केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री अन्नपूर्णा देवी ने दिया और बंगाल की तृणमूल कांग्रेस प्रमुख की आलोचना करते हुए फटकार लगाई है।

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केंद्रीय मंत्री अन्नपूर्णा देवी ने अपने पत्र में ममता बनर्जी को लिखा पश्चिम बंगाल में 11 फास्ट ट्रैक विशेष अदालतें चालू नहीं हैं। ये अदालतें बलात्कार और पॉक्सो के गंभीर मामलों में न्याय देने के लिए महत्वपूर्ण हैं।

केंद्रीय मंत्री ने कहा ममता बनर्जी के पत्र में दी गई जानकारी गलत है और ऐसा लगता है कि राज्य ने FTSC को चालू करने में देरी को छिपाने के लिए यह कदम उठाया है।

ममता बनर्जी की जानकारी गलत है

अन्नपूर्णा देवी ने कहा कि पश्चिम बंगाल में फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (FTSC) और स्पेशल POCSO कोर्ट के बारे में ममता बनर्जी द्वारा दी गई जानकारी गलत है। कलकत्ता उच्च न्यायालय के आंकड़ों के अनुसार, पश्चिम बंगाल ने 88 फास्ट ट्रैक कोर्ट (FTC) स्थापित किए हैं। हालांकि, ये केंद्र सरकार की योजना के तहत FTSC के बराबर नहीं हैं।

पश्चिम बंगाल में बलात्‍कार और पास्‍को के लंबित मामले

केंद्रीय मंत्री ने बताया 30 जून, 2024 तक पश्चिम बंगाल की फास्ट ट्रैक अदालतों में 81,141 मामले लंबित थे। इस बैकलॉग और 48,600 लंबित बलात्कार और POCSO मामलों के बावजूद, राज्य ने अतिरिक्त 11 FTSC को चालू नहीं किया है। जबकि विशेष POCSO न्यायालय या संयुक्त FTSC हो सकते हैं जो राज्य की ज़रूरत के अनुसार बलात्कार और POCSO दोनों मामलों को संभालते हैं।

केंद्रीय मंत्री ने इस मुद्दे पर ममता बनर्जी के पत्र में कुछ गलतियां बताईं। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार अपनी देरी को छिपाने के लिए इन FTSC को शुरू करने में देरी कर रही है।

केंद्र ने बताया क्‍यों जरूरी है फास्‍ट ट्रैक कोर्ट की स्‍थापना

केंद्रीय मंत्री ने जानकारी दी कि फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना और वित्तपोषण राज्य सरकारों द्वारा उच्च न्यायालयों के परामर्श से किया जाता है। वे वरिष्ठ नागरिकों, महिलाओं, बच्चों, विकलांग व्यक्तियों, एचआईवी-एड्स पीड़ितों, भूमि अधिग्रहण के मुद्दों, पांच साल से अधिक समय से लंबित संपत्ति/किराए के विवादों और जघन्य अपराधों से जुड़े दीवानी विवादों सहित विभिन्न मामलों को संभालते हैं।

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