जानिए कौन हैं जी आर गोपीनाथ, जिनकी बायोपिक ने नेशनल फिल्म अवॉर्ड में मचाया तहलका
नई दिल्ली, 22 जुलाई: 68वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के विजेताओं की आज नई दिल्ली में घोषणा की गई। इस साल फीचर फिल्म श्रेणी में 305 फिल्मों को नॉमिनेशन मिला था। ये पुरस्कार साल 2020 के लिए दिए गए हैं। इस बार भी दक्षिण भारतीय फिल्मों का इन पुरस्कारों में दबदवा रहा। 2020 के लिए बेस्ट एक्टर का अवार्ड दो कलाकारों को दिया गया है। सोरारई पोटरू (तमिल) के लिए सूर्या को और तान्हा जी के लिए अजय देवगन को। लेकिन इन पुस्कारों में सोरारई पोटरू ने बेस्ट फिल्म के अलावा कई कैटगरी में अवार्ड जीते हैं। ये फिल्म डेक्कन एयर के संस्थापक जीआर गोपीनाथ के जीवन पर बनी हुई है।

1 रुपए में हवाई सफर का सपना
जीआर गोपीनाथ का एक बैलगाड़ी हांकने वाला साधारण सा लड़के से देश की सबसे सस्ती एयरलाइंस का मालिक बनने का सफर बेहद ही रोमांचक है। 1 रुपए में हवाई सफर का सपना दिखाने वाले गोपीनाथ की कहानी पर बनी है फिल्म सोरारई पोटरू। इंडियन आर्मी के रिटायर्ड कैप्टन और बिजनेसमैन जीआर गोपीनाथ का जन्म कर्नाटक के गोरूर गांव में हुआ था। कैप्टन गोपीनाथ का पूरा नाम गोरुर रामास्वामी अयंगर गोपीनाथ है। उनके पिता शिक्षक थे और खेती का काम भी करते थे, जबकि उनकी मां गृहिणी थीं।

एनडीए स्कूल के दाखिले ने पलटी किस्मत
कैप्टन गोपीनाथ की शुरआती पढ़ाई घर पर ही हुई और उनका स्कूल में दाखिला सीधे कक्षा 5 में हुआ। उनके घर की हालात अच्छी नहीं थी, गोपीनाथ अपनी पिता की मदद के लिए बैलगाड़ी चलाते थे। इसके बाद उनकी आगे की पढ़ाई बीजापुर के सैनिक स्कूल में हुई। स्कूल ने गोपीनाथ को एनडीए में जाने के लिए प्रेरित किया। यहीं पढ़ाई करते हुए गोपीनाथ ने एनडीए की परीक्षा पास कर ली। पुणे में 3 साल की ट्रेनिंग के बाद उनकी एनडीए पढ़ाई पूरी हुई। उसके बाद उन्होंने इंडियन मिलिट्री एकेडमी, देहरादून से ग्रेजुएशन किया।

8 साल नौकरी कर सेना से ले लिया रिटायरमेंट
कैप्टन गोपीनाथ ने आर्मी जॉइन की और साल 1971-72 में हुई बांग्लादेश की लड़ाई तक आर्मी में रहे। आर्मी में 8 साल बिताने के बाद 28 साल की उम्र में ही उन्होंने आर्मी से रिटायरमेंट ले लिया। रिटायरमेंट के बाद गोपीनाथ की लाइफ का असली संघर्ष शुरू हुआ। अपने दोस्तों से मदद लेकर उन्होंने सिल्क की खेती, डेयरी फार्मिंग, पोल्ट्री फार्मिंग, मोटरसाइकिल डीलरशिप और हॉस्पिटैलिटी जैसे कई बिजनेस में हाथ आजमाया। लेकिन उन्हें खास सफलता हासिल नहीं हुई।

ऐसे आया दिमाग में एयरलाइंस खोलने का आइडिया
साल 2000 में कैप्टन गोपीनाथ अमेरिका में छुट्टियां मनाने गए थे। उसी दौरान उन्हें भारत में सस्ती विमान सेवा शुरू करने का ख्याल आया। उनके मन में आम लोगों को सस्ते में हवाई सफर कराने की ख्याल आया। गोपीनाथ को आइडिया आया कि अगर बसों और ट्रेनों में चलने वाले तीन करोड़ लोगों में से सिर्फ 5 फीसदी लोग हवाई जहाज़ों से सफर करने लगें तो विमानन बिज़नेस को साल में 53 करोड़ उपभोक्ता मिलेंगे। जिसके बाद उन्होंने अपनी एविएशन कंपनी खोलने की सोची।

पत्नी ने दे दी अपनी सारी सेविंग्स
लेकिन विमानन कंपनी खोलने में सबसे बड़ी दिक्कत पैसा थी। उन्हें कोई बैंक लोन देने के लिए तैयार नहीं थी। इसके बाद उनकी पत्नी ने अपने बैंकिंग बिज़नेस से कमाई अपनी सारी जमापूंजी उन्हें दी, उनके दोस्तों ने उन्हें काफी पैसा दिया। उनके परिवार से भी उन्हें कुछ पैसों की मदद मिली। अगस्त 2003 में कैप्टन गोपीनाथ ने 48 सीटों और दो इंजन वाले छह फिक्स्ड-विंग टर्बोप्रॉप हवाई जहाज़ों के बेड़े के साथ एयर डेक्कन की स्थापना की। पहली उड़ान दक्षिण भारतीय शहर हुबली से बेंगलुरु रही।

सस्ती फ्लाइट देने के लिए अपनाया ये फॉर्मूला
गोपीनाथ की एयरलाइन कंपनी ने 'डाइनैमिक प्रांइसिंग' व्यवस्था शुरू की जिसके तहत पहले टिकट खरीदने वाले कुछ उपभोक्ता मात्र एक रुपये में यात्रा कर सकते थे। इस व्यवस्था के तहत जो लोग देर से टिकट खरीदते थे उन्हें टिकट की अधिक क़ीमत देनी होती थी। जिसके चलते उनके पास बड़ी संख्या में ग्राहक पहुंचे। यात्रा को सस्ता करने के लिए इन-फ्लाइट इंटरटेनमेंट, फ्लाइट के दौरान खाना और बिज़नेस क्लास सीटिंग जैसी गैर-ज़रूरी सुविधाओं पर खर्च नहीं किया जाता।

सस्ती फ्लाइट्स बनीं गेमचेंजर
जब कंपनी शुरू हुई थी उस वक्त केवल दो हज़ार लोग कंपनी के विमानों में हवाई सफर कर रहे थे लेकिन 4 साल के भीतर ही हर रोज़ 25,000 लोग सस्ती क़ीमतों पर हवाई सफर करने लगे। एक रुपये के टिकट पर करीब तीस लाख लोगों ने हवाई सफर किया। साल 2007 में देश के 67 हवाईअड्डों से एक दिन में इस कंपनी की 380 उड़ानें चलाई जा रही थीं। और कंपनी के पास 45 विमान हो चुके थे।












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