भारत छोड़ों आंदोलन के 75 साल: जानें आखिर गाय के बारे में क्या थे गांधीजी के विचार
नयी दिल्ली। भारत छोड़ो आंदोलन को आज 75 साल पूरे हो चुके हैं। 75 साल पूरे होने आज हम इस बात को आप तक एक बार फिर से पहुंचा रहे हैं, क्योंकि इस वक्त देश एक कठिन दौर से गुजर रहा है। देश में गौरक्षा का मुद्दा राजनीतिक रंग ले चुका है। ऐसे में आज का दिन इस मुद्दे को बताने के लिए बेहद अहम हैं।

देश में गोरक्षा के नाम पर मुसलमानों और दलितों को निशाना बनाया जा रहा है। लोग उनपर निशाना साध रहे हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी गौरक्षा के बारे में क्या सोचते थे। जिन्होंने अपनी लाठी के बदल पर देश को आजादी दिलाई लो गायों की रक्षा को लेकर क्या विचार रखते थे। 8 अगस्त 1942 को अपने भाषण में गांधीजी ने इस बारे में अप ने विचार रखे थे। बंबई में हुए अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी में दिए भाषण में उन्होंने 'करेंगे या मरेंगे' का नारा दिया था। अपने भाषण की शुरुआत में गांधीजी ने गोरक्षा की मिसाल दी थी।
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गांधी जी ने कहा था कि मैं गो पूजक हूं। फिर आज ऐसा क्या हो गया कि आज मैं मुसलमानों के लिए शैतान और अरुचिकर हो गया। क्या खिलाफत आंदोलन की हिंदू-मुस्लिम एकता मैंने किसी फरसे के जोर पर हासिल की थी। सच्चाई यह है कि मेरा अंतरयामी कहता था कि ऐसा करने से मैं गोरक्षा भी कर सकूंगा।गांधी जी ने क हा था कि मैं यह मानता हूं कि मैं और गाय एक ही ईश्वर की संतान हैं।
गायों के प्राणों की रक्षा के लिए मैं अपने प्राण न्योछावार करने को तैयार हूं। उन्होंने कहा कि आज अली बंधु जीवित होते तो वे मेरी बात की सच्चाई के सबूत देते और बहुत से लोग यह भी बताते की मैंने यह काम गाय का जीवन बचाने के लिए मोलभाव के तौर पर नहीं किया था। गाय और खिलाफत दोनों का महत्व उनके अपने गुणों के आधार पर है। बापू ने अपने भाषण में जहां खुद को सच्चा गौरक्षक बताया तो वहीं मोहम्मद अली जिन्ना के लिए कड़े शब्दों का प्रयोग किया था। उन्होंने खुद को दलित रक्षक बताते हुए दलित हितों के लिए काम करने की प्रतिबद्धता दोहराई थी।












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