जानिए, वैक्सीन निर्माण की पूरी प्रक्रिया और क्यों टीके की जल्द उपलब्धता पर लग सकता है ग्रहण?
बेंगलुरू। नोवल कोरोनावायरस महामारी के स्ट्रेन के बारे में शोधरत वैज्ञानिकों की अनिभज्ञता को एंटी कोरोना वैक्सीन के निर्माण की सबसे बड़ी बाधा कही जा रही है। यही कारण है कि लगातार दावों और इरादे के बीच कोविड-19 के लिए युद्धस्तर पर जारी वैक्सीन विकास की प्रक्रिया में समय लगने की बात कही जा रही है। सामान्यतः किसी भी वैक्सीन के निर्माण की प्रक्रिया में एक नहीं दर्जनों असफलताएं सामने आती हैं, लेकिन अनवरत रूप से चलता रहता है।

शायद यही कारण है कि एक परफेक्ट वैक्सीन के विकसित होने में न केवल लम्बा समय लगता है, बल्कि अथाह पैसा भी खर्च होता है। सामान्यतः वैक्सीन डेवलपमेंट की प्रक्रिया में एक स्टैंडर्ड प्रोसेस फॉलो किया जाता है। इसमें सबसे पहले अनुसंधान प्रक्रिया होती है, जिसके बाद नियमन और निगरानी आती है।

दरअसल, अनुसंधान चरण में लेबोरेटरी में वैक्सीन डेवलपमेंट पर रिसर्च किया जाता है, जिसमें सामान्य रूप से 2 से 4 साल तक लग जाते हैं। इस दौरान शोधरत वैज्ञानिक नेचुरल और आर्टिफिशियल एंटीजन की पहचान करते हैं, जो किसी भी बीमारी की रोकथाम में मदद कर सकता है।

गौरतलब है कोरोनावायरस के खिलाफ वैक्सीन निर्माण को लेकर पूरी दुनिया भर के वैज्ञानिक युद्धस्तर पर बिना थके लगातार शोध में जुटे हुए हैं ताकि सवा करोड़ से अधिक लोगों को संक्रमित और साढ़े 5 लाख से अधिक लोगों की जिंदगी छीन चुके खतरनाक वैश्विक महामारी की जल्द रोकथाम में मदद मिल सके, क्योंकि जिस तीव्र गति से कोरोना के नए मामले पूरी दुनिया में रोजाना आ रहें है, वो निकट भविष्य में बहुत नुकसान पहुंचा सकते हैं।

मौजूदा समय में भारत में भी कोरोना के नए मामले तेजी से बढ़े हैं, जहां रोजाना 20,000 से 25000 नए मामलों की पुष्टि की जा रही है। यह स्थिति बेहद भयावह है। भारतीय कंपनी भारत बायोटेक और कैडिला हेल्थकेयर संभावित वैक्सीन विकसित करने की दिशा में पूरी दुनिया की तुलना में दो कदम आगे चल रही हैं।

लेकिन तारीखों के ऐलान के बावजूद वैक्सीन की उपलब्धता को लेकर अभी संशय बना हुआ है। यह संशय तब और बढ़ गया जब शुक्रवार को संसदीय पैनल की बैठक में एक सरकारी अधिकारी यह कह कर हैरत में डाल दिया कि अगले वर्ष से पहले वैक्सीन की कोई संभावना नहीं है।

वैक्सीन ही क्यों?
वैक्सीन या टीका एक प्रकार की दवा है जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली यानी इम्यून सिस्टम को बढ़ाती है और बीमारी से लड़ने में मदद करती है। वैक्सीन शरीर में इम्यूनिटी बनाने का दूसरा तरीका है। यह किसी भी बीमारी से बचने का यह एक सुरक्षित विकल्प है। टीका एक रोगज़नक़ के लिए एंटीबॉडी का उत्पादन करने के लिए प्रतिरक्षा प्रणाली को उत्तेजित करता है। अधिकांश टीके या वैक्सीन इंजेक्शन के माध्यम से दिए जाते हैं, लेकिन कुछ मौखिक या नाक के माध्यम से भी दिए जाते हैं।

टीकाकरण बीमारियों को रोकने के सबसे प्रभावी तरीका है
वर्तमान समय में टीकाकरण बीमारियों को रोकने के सबसे प्रभावी तरीकों में से एक है। यह शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को बैक्टीरिया या वायरस सहित रोगजनकों को पहचानने और उनसे लड़ने में मदद करता है और हमें उन बीमारियों से सुरक्षित रखता है जो वे पैदा कर सकते हैं। खसरा, पोलियो, टेटनस, डिप्थीरिया, मेनिनजाइटिस, इन्फ्लूएंजा, टाइफाइड जैसे 25 से अधिक जानलेवा बीमारियों से वैक्सीन बचाव करती है।

टीका या वैक्सीन कैसे काम करती है?
शरीर में वैक्सीन प्रतिरक्षा प्रणाली या इम्यून सिस्टम को विकसित करने में मदद करते हैं जो कि संक्रमण से लड़ते हैं। इस प्रकार के संक्रमण के कारण कभी भी फिर से बीमारी नहीं होती है, लेकिन यह प्रतिरक्षा प्रणाली को टी-लिम्फोसाइट्स और एंटीबॉडी का उत्पादन करने का कारण बनता है। यह भी देखा जाता है कि कभी-कभी, टीका लगने के बाद बुखार जैसे मामूली लक्षण हो सकते हैं। इस तरह के मामूली लक्षण सामान्य हैं और उम्मीद की जाती है कि ऐसा हो सकता है क्योंकि शरीर प्रतिरक्षा प्रणाली या इम्यूनिटी बनाता है।

वैज्ञानिक सबसे पहले नेचुरल और आर्टिफिशियल एंटीजन की पहचान करते हैं
वैक्सीन निर्माण में शोधरत वैज्ञानिक नेचुरल और आर्टिफिशियल एंटीजन की पहचान करते हैं, जो किसी भी बीमारी की रोकथाम में मदद कर सकता है। इसके बाद क्लीनिकल पूर्व चरण आता है। इसमें कोशिका संवर्धन प्रणाली का उपयोग किया जाता है और जंतु परीक्षण किया जाता है, जिससे वैक्सीन की सिक्योरिटी सुनिश्चित होती है। विकास के क्रम में चूहे और बंदरों इत्यादि पर टीके का प्रयोग किया जाता है। इसके अतिरिक्त भी कई प्रक्रिया अपनाई जाती है, जिसकी जटिलता उतनी ही होती है, जितना इसमें समय लगता है।

वैक्सीन निर्माण का पहला चरण होता है एंटीजन बनाना
किसी भी वैक्सीन के निर्माण का पहला चरण एंटीजन का निर्माण करना होता है, जिसका इस्तेमाल किसी प्रतिरक्षी प्रतिक्रिया को प्रेरित करने के लिए किया जाता है। इस चरण में शामिल है रोगाणुओं की वृद्धि और उनका संग्रह या उस रोगाणु से किसी रिकंम्बिनेंट प्रोटीन (ऐसा प्रोटीन जिसे डीएनए तकनीक से बनाया जाता है) का निर्माण करना। कई विषाणु जनित टीकों के लिए इस प्रक्रिया की शुरुआत एक विशिष्ट प्रकार के विषाणु की अल्प मात्रा के साथ की जाती है, जिसकी कोशिकाओं में वृद्धि करवाई जा सकती है।

वैक्सीन निर्माण का दूसरा चरण है कोशिकाओं से एंटीजन को छोड़ना
दूसरा चरण है कोशिकाओं से एंटीजन को छोड़ना और इसे इसकी वृद्धि के लिए प्रयुक्त पदार्थ से पृथक करना। वृद्धि माध्यम के प्रोटीन और अन्य हिस्से अभी भी मौजूद रह सकते हैं और उन्हें अगले चरण में अवश्य हटा लिया जाना चाहिए। इस चरण का लक्ष्य है जितना अधिक संभव हो उतने विषाणुओं या जीवाणुओं को मुक्त करना।

वैक्सीन निर्माण का तीसरा चरण है एंटीजन का शोधन
तीसरे चरण एंटीजन का शोधन होता है। ऐसे टीकों के लिए जिन्हें रिकम्बिनेंट प्रोटीन से बनाया जाता है, शोधन में क्रोमैटोग्राफी (पदार्थों को अलग लगने की एक विधि) का इस्तेमाल किया जाता है। चूंकि जीवित टीके तीसरे चरण से पूर्व निष्क्रिय होते हैं।

वैक्सीन निर्माण का चौथा चरण है एक सहायक पदार्थ का संयोजन
चौथा चरण एक सहायक पदार्थ (ऐडजुवेंट) का संयोजन हो सकता है, जो एक ऐसा पदार्थ होता है जो गैरविशिष्ट रूप से प्रतिरक्षी प्रतिक्रियाओं को बढ़ाता है। टीकों में स्टैबिलाइजर्स भी शामिल हो सकते हैं, जो शेल्फ-आयु को बढ़ाते हैं या परिरक्षक पदार्थ मौजूद रह सकते हैं, जो कई-खुराक वाले वायल्स का सुरक्षित रूप से इस्तेमाल करने में मदद देते हैं।

वैक्सीन निर्माण का पांचवां चरण है वितरण करना
अंतिम चरण में ऐसे सभी घटक शामिल होते हैं, जिनसे अंतिम रूप से टीके का निर्माण होता है और उन्हें एकल बरतन में एकस मान रूप से मिश्रित किया जाता है। तब टीके को वायल या सिरिंग पैकेज में भरा जाता है, उसे रोगाणुमुक्त स्टॉपर या प्लंजर्स के साथ सील बंद किया जाता है और व्यापक वितरण के लिए लेबल लगाया जाता है। कुछ टीकों को जमाकर-सुखाया जाता है और इस्तेमाल के समय उसे फिर से गीला कर लिया जाता है।

नोवल कोरोना वायरस दुनिया में नया वायरस है
ऐसे टीके का विकास आसान होता है। क्योंकि उसके स्ट्रेन के बारे में पहले से मालूम है। नोवेल कोरोना वायरस दुनिया में नया वायरस है। दिसंबर से पहले इस वायरस के बारे में किसी को बिल्कुल मालूम हीं नहीं था। इसलिए नए टीके का विकास इतना आसान काम नहीं है। शोध में कई चीजों का ध्यान रखना होता है। सबसे अहम बात यह है कि टीका वायरस को बढ़ने न दे। वह स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित हो। टीका तैयार होने के बाद पहले जानवरों पर परीक्षण करना पड़ता है कि वह प्रभावी है भी या नहीं। फिर इंसानों पर क्लीनिकल परीक्षण कर यह देखना होता है कि उसका इस्तेमाल कितना सुरक्षित है।

25 से 35 अरब आती है वैक्सीन परीक्षण और उत्पादन की लागत
एक अनुमान के अनुसार एक महामारी संक्रामक रोग की वैक्सीन बनाने के लिए प्री-क्लिनिकल स्टेज से बड़े पैमाने पर वैक्सीन के परीक्षण और फिर उत्पादन की लागत करीब 25 अरब से 35 अरब के बीच आती है। यह लागत और जोखिम कोरोना वायरस में और बढ़ गए हैं, क्योंकि सामान्य लंबी और सतर्क प्रक्रिया के लिए अभी वैज्ञानिकों के पास समय नहीं है। इसके लिए WHO जैसी वैश्विक संस्थाओं को इस दिशा में एक आवश्यक कदम वैक्सीन की खरीद की गारंटी की पेशकश करना बेहतर होगा।

ट्रायल से लेकर लोगों तक पहुंचने में आएगा 1500 करोड़ रुपए का खर्च
एक अनुमान के मुताबिक ट्रायल से लेकर दुनिया में पहुंचाने के लिए ही 1500 करोड़ रुपए की जरूरत होगी। नोवल कोरोना वायरस की जटिलताओं को देखते हुए माना जा रहा है कि एंटी कोरोना वैक्सीन के ट्रायल से लेकर निर्माण और फिर दुनिया भर के बाजार में वैक्सीन की उपलब्धता में समय ही नहीं, बल्कि खर्च भी अधिक बढ़ने वाले हैं।

दुनिया में वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों में आई गिरावट
अमरीका में 1967 में वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों की संख्या 26 थी जो कि 2004 में घटकर केवल पांच रह गई हैं। हालांकि अब बिल और मेलिंडा गेट्स और दूसरे लोगों के सामने से अब इस तस्वीर में बदलाव आ रहा है। इन लोगों ने अरबों डॉलर की फंडिंग इस काम के लिए दिए हैं। इस वजह से इन उत्पादों की मांग में भी इजाफा हुआ है। प्रीवेनार जैसी वैक्सीन के इनोवेशन से इस इंडस्ट्री को काफी फायदा हुआ है।

कोरोना की वैक्सीन बनाने में कोई वित्तीय समस्या नहींः बिल गेट्स
दुनिया के दूसरे सबसे अमीर उद्योगपति बिल गेट्स के मुताबिक कोरोना की वैक्सीन बनाने में कोई वित्तीय समस्या नहीं है। सरकार और कई संस्थाओं ने साफ कर दिया है कि वो वैक्सीन खोजने में पूरी मदद करेंगे। उन्होंने कहा कि हम तेजी से वैक्सीन बनाने की हर संभव कोशिश कर रहे हैं, लेकिन लोगों को इस मुश्किल घड़ी में प्रशासन के निर्देशों का पालन करना चाहिए।

सबसे प्रभावकारी वैक्सीन की पहचान बहुत जरूरी है: WHO
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का मानना है कि सबसे प्रभावकारी वैक्सीन की पहचान बहुत जरूरी है, ताकि पूरे विश्व को फायदा हो सके। इसके लिए तीसरे चरण तक के ह्यूमन ट्रायल का डाटा शेयर किया जाए, ताकि पता चल सके कि सबसे असरदार वैक्सीन कौन सी है या कौन-कौन सी हैं। साथ ही इन्हें दुनियाभर में पहुंचाने का मॉडल क्या होगा, क्योंकि तमाम सरकारी शोध केंद्रों के साथ प्राइवेट लैब और निवेशकों का भी काफी पैसा वैक्सीन विकसित करने में लगा है।
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