राजस्थान में सत्ता गंवाने के कुछ महीने बाद ही BJP कैसे जीत पाई सारी सीटें? जानिए
नई दिल्ली- इसबार की मोदी सुनामी में राजस्थान (Rajasthan) में बीजेपी (BJP) को जैसी जीत मिली, वह बड़े-बड़े पॉलिटिकल एनालिस्ट के लिए चौंकाने वाला है। 2014 की तरह भाजपा (BJP) ने न केवल यहां की सभी 25 सीटें फिर से जीत ली, बल्कि उसके उम्मीदवारों का औसत वोट शेयर भी पिछलीबार के 54.08 फीसदी से बढ़कर 60.5 फीसदी तक पहुंच गया। निश्चित तौर पर इसमें नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) की लोकप्रियता, राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का बड़ा रोल रहा है। लेकिन, राजस्थान (Rajasthan) में यह मोदी और बीजेपी के लिए जितनी बड़ी जीत है, उतनी ही बड़ी कांग्रेस (Congress) पार्टी और उसकी राज्य सरकार की हार भी है। यानी मोदी लहर ने राजस्थान में भाजपा को बड़ी जीत का हौसला तो दिया ही, रही-सही कसर कांग्रेस ने अपनी ओर से पूरी कर दी।

2018 में वसुंधरा से नाराज थे वोटर
17वीं लोकसभा के चुनाव में (Lok Sabha Elections 2019) भाजपा (BJP) ने राजस्थान (Rajasthan) में इतनी बड़ी कामयाबी कैसे हासिल की इसे समझने से पहले, यह समझ लेना जरूरी है कि 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सत्ता में आई कैसे? दरअसल, उस समय बीजेपी के समर्थकों में भी राजस्थान (Rajasthan) की वसुंधरा राजे (Vasundhara Raje) सरकार के खिलाफ काफी नाराजगी थी। उस दौरान बीजेपी समर्थकों के बीच एक नारा खूब चला था- 'मोदी तुम से बैर नहीं, वसुंधरा तेरी खैर नहीं'। तब कई वजहों से लोग मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे (Vasundhara Raje) को सबक सिखाना चाहते थे। इसमें कृषि समस्या, राजपूतों की नाराजगी, राज्य सरकार के कथित घोटाले, आरएसएस (RSS) के साथ वसुंधरा का पटरी नहीं बैठना, उनकी महारानी वाली छवि और एक स्वाभाविक एंटी-इंकम्बेंसी, जिसके तहत राजस्थान में हर विधानसभा चुनावों में सरकार बदलने की परंपरा सी बनी हुई है। यानी बीजेपी के वोटरों में मोदी से नाराजगी तब भी नहीं थी। महारानी वसुंधरा के खिलाफ बीजेपी समर्थकों की इसी नाराजगी को कांग्रेस (Congress) ने अपने हक में भुनाया था। इसके अलावा उसने मॉब लिंचिंग (mob lynching) की वारदातों के चलते मुस्लिम (Muslim) और दलित (Dalit) वोटरों को अपने पाले में लाने में सफलता पा ली थी।

इसबार कांग्रेस पर किसानों का मुद्दा उल्टा पड़ा
कांग्रेस ने राजस्थान (Rajasthan) में सरकार बनाने के बाद किसानों के लोन माफ करने का जो ऐलान किया, वही उसपर इस लोकसभा चुनाव में भारी पड़ गया। वहां सिर्फ को-ऑपरेटिव और लैंड डेवलेपमेंट बैंक से लिए गए लोन माफ किए गए, कॉमर्सियल या ग्रामीण बैंकों का लोन नहीं। इससे किसानों में ये मैसेज गया कि उन्हें झांसा दिया गया है। किसान मिनिमम सपोर्ट प्राइस और पानी की समस्या का भी समाधान चाहते थे, लेकिन कांग्रेस इसपर उन्हें कोई ठोस भरोसा देने में नाकाम रही।

आम कार्यकर्ताओं का पार्टी से मोहभंग
राजस्थान (Rajasthan) कांग्रेस (Congress) के एक सूत्र ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि पार्टी के आम कार्यकर्ता नेताओं के बीच की गुटबाजी से बहुत खफा थे। 2018 की जीत के बाद सिर्फ उन लोगों को ही मौका दिया गया, जो अशोक गहलोत (Ashok Gehlot), सचिन पायलट (Sachin Pilot) या सीपी जोशी (C P Joshi ) के करीबी हैं। यही नहीं, 2019 में टिकट बांटते समय भी कार्यकर्ताओं को पूछा नहीं गया। पुराने समर्पित कार्यकर्ताओं को साइडलाइन करके कम से कम 10 सीटों पर नए चेहरे उतार दिए गए। इसके बाद पार्टी ने 2018 के विधानसभा चुनावों में जीतने वाले या हारने वाले उम्मीदवारों को उनके क्षेत्र में कैंपेन की जिम्मेदारी सौंप दी। इस स्थिति में उन कांग्रेसियों ने सहयोग नहीं किया, जिनका 2018 में टिकट कट गया था, बल्कि उन्होंने विरोध ही किया। इस तरह से हर स्तर पर गुटबाजी ने पार्टी का बेड़ा-गर्क किया।

गुर्जरों की नाराजगी का नतीजा
इसबार के चुनाव में कांग्रेस ने यहां के दो ताकतवर समुदायों जाटों (Jats) और गुर्जरों (Gujjars) का समर्थन गंवा दिया। गुर्जर इस बात से नाराज रहे कि सचिन पायलट (Sachin Pilot) को मुख्यमंत्री क्यों नहीं बनाया। कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक इसके चलते पार्टी का उम्मीदवार टोंक विधानसभा क्षेत्र में भी बढ़त नहीं बना पाया, जो पायलट की जीती हुई सीट है। इसके ठीक उलट बीजेपी को गुर्जर नेता कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला (Kirori Singh Bainsla) का पार्टी में आने का फायदा मिला जो गुर्जर आंदोलन के अगुवा रहे हैं। वे अपने बेटे विजय बैंसला (Vijay Bainsla) के साथ चुनाव से कुछ दिन पहले ही भाजपा में शामिल हो गए थे।

जाटों ने ऐसे लिया बदला
कांग्रेस के खिलाफ जाटों की नाराजगी की एक बड़ी वजह राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) के नेता हनुमान बेनिवाल (Hanuman Beniwal) रहे, जिन्हें अपने साथ रखने में पार्टी नाकाम रही। जाटों में बेनिवाल की मजबूत पकड़ है और उनके चलते ही 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 3 सीटें जीती थी और कम से कम 2 पर दूसरे स्थान पर रही थी। कांग्रेस ने उनके गढ़ नागौर में उन्हें टिकट न देकर पुराने दिग्गज कांग्रेसी रामनिवास मिर्धा की पोती डॉक्टर ज्योति मिर्धा को दे दिया। जबकि, बीजेपी ने वसुंधरा की चिंता किए बिना भी तत्काल बेनिवाल को लपक लिया। इसके चलते राजस्थान में भाजपा को जाटों का भरपूर समर्थन मिला और उसने जोधपुर सीट पर भी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) के बेटे वैभव गहलोत (Vaibhav Gehlot) को हरा दिया। यहां कांग्रेस विधायक दिव्या मदेरणा (Divya Maderna) ने भी वैभव गहलोत (Vaibhav Gehlot) की हार सुनिश्चित कराकर अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) से अपना एक पुराना हिसाब चुकता किया। 2011 में दिव्या के पिता महिपाल मदेरणा (Mahipal Maderna) को गहलोत ने भंवरी देवी (Bhanwari Devi) हत्याकांड में नाम आने पर कैबिनेट से बाहर किया था। यही नहीं, पूर्व बीजेपी नेता और केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह (Jaswant Singh) के बेटे और कांग्रेस उम्मीदवार मानवेंद्र सिंह (Manvendra Singh) की हार में ही जाट फैक्टर ने अहम भूमिका निभाई। उनके खिलाफ भाजपा ने कैलाश चौधरी (जाट) को टिकट दिया था। मानवेंद्र मुस्लिम और राजपुत वोट एकजुट करने में तो सफल रहे, लेकिन बाकी वोट बीजेपी के प्रत्याशी को मिल गए। इन्हें बेनिवाल की पार्टी के ही एक नेता उम्मेदा राम की भी मदद मिली, जिनके प्रभाव में कुछ दलित वोट भी भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में गए।

कांग्रेस की बड़ी गलतियां
राजस्थान की चार रिजर्व सीटों में से दो पर भाजपा ने जाटवों के खिलाफ बाकी दलितों को एकजुट कर लिया। भरतपुर में इसने रंजीता कोली (कोली) को उम्मीदवार बनाया और करौली-धौलपुर में मनोज राजौरिया (खटिक) को टिकट दिया। बीकानेर और गंगानगर में कांग्रेस की तरह ही भाजपा ने प्रभावी मेघवाल जाति के उम्मीदवार पर ही दांव लगाया। यही नहीं दो जेनरल सीटों से दलित प्रत्याशियों को टिकट देने का कांग्रेस का फैसला भी उसे बहुत भारी पड़ गया। कांग्रेस ने कोटा एवं टोंक-सवाई माधोपुर में मीणा उम्मीदवारों पर दांव लगाया, जिससे बाकी जातियां उसके खिलाफ चली गईं।
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