जानिए, तमिलनाडु की राजनीति में कैसे दुर्लभ हो गए ब्राह्मण?
नई दिल्ली- अगर तमिलनाडु की राजनीति में ब्राह्मणों के दबदबे की बात करें, तो वह लगभग नगण्य ही रहे हैं। मौजूदा लोकसभा चुनाव में गंभीरता से चुनाव लड़ रहे 160 उम्मीदवारों की पड़ताल करें, तो तमिलनाडु और पुडुचेरी को मिलकार मात्र 3 सीरियस ब्राह्मण उम्मीदवार ही अपने मैदान में होने का अहसास करा रहे हैं। एआईएडीएम (AIADMK) सुप्रीमो जे जयललिता के बाद आने वाले कई दशकों तक किसी ब्राह्मण के राज्य की राजनीति में उनकी ऊंचाई तक पहुंचने की कहीं से कोई संभावना भी नहीं दिख रही है। ऐसी स्थिति तब है, जब 2014 में बीजेपी के कन्याकुमारी से जीतने के बाद राज्य में ब्राह्मणों की सियासी सक्रियता बढ़ने को लेकर चर्चा हो रही है। सच्चाई तो ये है कि तमिल ब्राह्मण प्रशासनिक अधिकारियों के लिए चर्चित रहा ब्रिटिश राज के बावजूद आजादी के बाद ब्राह्मण समुदाय राज्य की एसेंबली या सत्ता में कभी अपना वैसा दबदबा बन ही नहीं पाया।

राजाजी और जयललिता ब्राह्मण होकर कैसे सीएम बने?
1952 में मद्रास एसेंबली इलेक्शन में प्रशासनिक दक्षता के बावजूद विधानसभा में ब्राह्मणों का कोई प्रभुत्व नहीं बन पाया। टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी लेख के मुताबिक 1952 में कांग्रेस ने गठबंधन सरकार चलाने के लिए सी राजगोपालाचारी को राज्य की बागडोर सौंप दी। कांग्रेस का तत्कालीन मकसद सीपीआई (CPI) को सरकार बनाने से रोकना था। कांग्रेस को राजाजी जैसा कोई कद्दावर शख्स चाहिए था, जिनके प्रभाव से छोटी पार्टियां एकजुट रहे। लेकिन, राजाजी ने खुद ब्राह्मण होकर भी कभी ब्राह्मणों को आगे नहीं बढ़ाया। 1954 में राजाजी के हटने के बाद कांग्रेस पर के कामराज और सी सुब्रमण्यम जैसे गैर-ब्राह्मण नेताओं का कब्जा हो गया। 1952 के बाद 1991 में एक और तमिल ब्राह्मण को मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला। तमिल आयंगर ब्राह्मण जयललिता तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनी। लेकिन, उनके समय में भी कुछ गिने-चुने ब्राह्मण ही तमिलनाडु की राजनीति में अपनी जगह बना पाए। उन्होंने पूर्व बीजेपी नेता और तमिल ब्राह्मण वी मैत्रेयन को राज्यसभा में जरूर भेजा, लेकिन लोकसभा में भेजने की कोशिश का रिस्क वो भी नहीं उठा पाईं। वैसे जयललिता ने तमिलनाडु की राजनीति में अपना लंबा प्रभुत्व ब्राह्मणों के चलते नहीं, प्रभावशाली थेवर समुदाय के भरोसे कायम रखा था। वे आखिरी वक्त तक उनके साथ जी-जीन से जुटे भी रहे। यानी जयललिता या राजाजी खुद ब्राह्मण जरूर थे, लेकिन उनकी राजनीति ब्राह्मणों की वजह से नहीं चली।

द्रविड़ राजनीति का दबदबा
अपनी शिक्षा के दम पर तमिल ब्राह्मणों ने आजादी से पहले वहां अपनी एक प्रभावशाली भूमिका कायम कर रखी थी। लेकिन, पेरियार आंदोलन ने राज्य की राजनीति से ब्राह्मणों का मायने ही खत्म करना शुरू कर दिया। इतिहास को टटोलें तो तमिलनाडु की राजनीति में ब्राह्मणों की मौजूदगी की संभावना तब पूरी तरह से खत्म हो गई, जब गैर-ब्राह्मणवादी सियासत का झंडा लेकर डीएमके (DMK) 1967 में सत्ता में आ बैठी। अलबत्ता पहले डीएमके मुख्यमंत्री सी एन अन्नादुरई ने आक्रामक गैर-ब्राह्मणवादी राजनीति से बचने की कोशिश की थी, लेकिन उनके सियासी उत्तराधिकारी एम करुणानिधि ने राज्य सरकार और पूरे प्रशासनिक ताने-बाने से ब्राह्मणों को लगभग मिटाना ही शुरू कर दिया। इसके पीछे कारण ये रहा कि राज्य में ओबीसी (OBC) जनसंख्या 70% है, जिनके लिए ब्राह्मणों की 2.5 से 3% आबादी कोई मायने ही नहीं रखती। हालांकि, जानकार बताते हैं कि करुणानिधि की आक्रामक नीति के बावजूद लंबे समय तक ब्राह्मण प्रदेश की राजनीति में अपनी मौजूदगी साबित करते रहे।

तमिलनाडु से बाहर मिला सहारा
अंग्रेजों के जाने के बाद कई सारे तमिल ब्राह्मणों ने लीगल प्रोफेशन में अपना भविष्य तलाशना शुरू कर दिया। जो नहीं कर पाए, वे दूसरे प्रोफेशन की तलाश में तमिलनाडु से बाहर निकल गए। पिछले 25-30 सालों में इनकी तादात काफी रही है। कुछ लोगों ने वित्तीय सेवाओं में अपनी धाक जमाई है, तो कोई आईटी (IT) फिल्ड में अपना लोहा मनवा चुका है। वे पूरे भारत और विश्व के कई देशों में अपनी तीव्र बुद्धि के दम पर अपना एक खास स्थान कायम करने में सफल हुए हैं। तमिलनाडु में ब्राह्मणों के प्रभाव वाले इलाकों में भी अब बहुत बदलाव आ चुका है। पिछले कुछ दशकों में जयललिता को छोड़कर तमिलनाडु के जिन ब्राह्मणों ने भारतीय राजनीति में अपनी पहचान बनाई है, उनमें पूर्व राष्ट्रपति आर वेंकटरमण, मणिशंकर अय्यर और भाजपा सांसद सुब्रमण्यियन स्वामी हैं, लेकिन इन सबकी राजनीति दिल्ली से ही चली है या अभी भी चल रही है। स्वामी अभी भी राज्यसभा के माध्यम से संसद में अपनी मौजूदगी बनाए हुए हैं।












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