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कौन है वो जिसकी एक शिकायत पर बर्बाद हो गया DLF?

नई दिल्ली (विवेक शुक्ला)। देश की उस बड़ी रियल एस्टेट कंपनी डीएलएफ के राजधानी में जंतर मंतर स्थित दफ्तर में सन्नाटा पसरा है। यह वही डीएलएफ है, जो कभी आईपीएल स्पॉन्सर किया करता था, लेकिन आज कंपनी खस्ताहाल है। कंपनी का यह हाल उसकी खुद के द्वारा की गई गड़बड़‍ियों की वजह से हुआ, लेकिन उन गड़बड़‍ियों को उजागर करने वाले कौन थे? क्या आप उन्हें जानना नहीं चाहेंगे? उनका नाम है केके सिन्हा।

Why K.K.Sinha proved too much for realty giant DLF ? He complanied against the working of DLF to SEBI

जी हां केके सिन्हा वो नाम है, जिसे डीएलएफ का कोई कर्मचारी लेना नहीं चाहता। उन्हीं ने ही सेबी में श‍िकायत दर्ज की थी, जिसके बाद डीएलएफ के सामने संकट खड़े किए। डीएलएफ में किसी किसी को समझ नहीं आ रहा है कि कंपनी का भविष्य क्या होगा। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) रियल्टी कंपनी की गड़बडिय़ों के बारे में पत्र लिख सूचित करने की योजना बना रहा है।

डीएलएफ के छूटे पसीने

डीएलएफ के संकट में फंसने के लिए जिम्मेदार हैं सिन्हा। सिन्हा की शिकायत ने डीएलएफ के पसीने छुड़वा दिए। सेबी ने डीएलएफ के चेयरमैन के पी सिंह सहित छह कार्यकारी अधिकारियों को अगले तीन साल तक पूंजी बाजार में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया।

सिन्हा ने डीएलएफ के कामकाज में होने वाली गड़बड़ियों की जानकारी सेबी को दी। सेबी ने उन पर संज्ञान लिया तो डीएलएफ की कलई खुल गई। सिन्हा गोबिंदा टी ट्रेडिंग और कीर्ति इन्फ्रास्ट्रक्चर्स के निदेशक हैं। इससे पहले सेबी की सख्ती ने सहारा समूह को धूल में मिला दिया। अपने फैसले में सेबी ने नियमों के उल्लंघन के आरोप में डीएलएफ पर शेयर बाजार में कारोबार को लेकर तीन साल का प्रतिबंध लगाया था।

सेबी का मानना है कि डीएलएफ ने जिन नियमों का मखौल उड़ाया है, उनका ताल्लुक केवल घोषणा संबंधी मामलों से नहीं है। कॉरपोरेट मामलों के जानकार सुरेन्द्र गंभीर मानते हैं कि अब शेयर धारकों और दूसरे जिम्मेदार नागरिकों को उन कंपनियों की सेबी में ठोस साक्ष्यों के साथ शिकायत करनी चाहिए जो ठीक तरीके से काम नहीं कर रही। जो अपने शेयरधारकों और दूसरे लोगों के हितों के साथ खिलवाड़ करती हैं। उन्होंने कहा कि देश को के.के. सिन्हा जैसे बहुत से नागरिकों की जरूरत है।

रियल एस्टेट मामलों के जानकारों का कहना है कि डीएलएफ पर सेबी के एक्शन के इस सारे क्षेत्र के लिए बहुत नेगटिव असर होगा। अब लोगों को लगेगा कि जब डीएलएफ में पारदर्शिता नहीं है तो बाकी कंपनियों पर यकीन करने का कोई मतलब नहीं है।

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