ISRO Spy Case: पाकिस्तान के लिए देश से गद्दारी नहीं की थी इस इसरो के वैज्ञानिक ने, पढ़िए किसने और क्यों फंसाया जाल में
तिरुवंतपुरम। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (इसरो) के पूर्व वैज्ञानिक एस नांबी नारायणन को बड़ी राहत दी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि नारायणन को 'जबरन गिरफ्तार किया गया, उनका शोषण किया गया और उन्हें मानसिक क्रूरता का शिकार बनाया गया।' साल 1994 के इसरो के जासूसी कांड में अपने आदेश के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने नारायणन को 50 लाख रुपए मुआवजे के तौर पर देने का भी आदेश दिया। इसके अलावा केरल के पुलिस अधिकारियों के रोल की जांच करने को भी कहा। इस पूरे केस के बाद नारायणन ने कहा, 'कोर्ट उस पीड़ा और अपमान को समझ सका, जिससे मैं गुजरा हूं।' इन सबमें जो बात सबसे ज्यादा हैरान करने वाली थी कि जिस तकनीक की वजह से उन पर जासूसी का आरोप लगाया गया उस तकनीक को भारत ने पहली बार साल 2017 में टेस्ट किया था। इस पूरे जासूसी कांड की शुरुआत अक्टूबर 1994 से हुई थी। एक नजर डालिए कि क्या था यह पूरा एपिसोड और कैसे वैज्ञानिक नांबी नारायणन ने इसके लिए लड़ाई लड़ी।
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तिरुवंतपुरम से गिरफ्तार मालदीव की नाशिदा
अक्टूबर 1994 में इस केस की शुरुआत उस समय हुई जब मालदीव की मरियम नाशिदा को तिरुवंतपुरम से गिरफ्तार किया गया। मरियम पर आरोप लगे कि उनके पास इसरो के रॉकेट इंजन के कुछ चित्र है जिसे वह पाकिस्तान को बेचने जा रही थी। इस पूरे के स में जब इसरो के क्रायोजेनिक इंजन प्रोजेक्ट पर काम कर रहे वैज्ञानिक नांबी नारायणन को नवंबर में गिरफ्तार किया गया तो खलबली मच गई। नारायणन के साथ इसरो के डिप्टी डायरेक्टर डी शशिकुमारन को भी गिरफ्तार किया गया था। इन दोनों के अलावा रूस की स्पेस एजेंसी में भारतीय प्रतिनिधि के चंद्रशेखर, लेबर कॉन्ट्रैक्टर एसके शर्मा और नाशिदा की दोस्त फौसिया हसन को भी गिरफ्तार किया गया था। जनवरी 1995 में इसरो वैज्ञानिकों और सभी बिजनेसमेन को जमानत मिल गई। लेकिन मालदीव की दोनों नागरिकों को जेल में ही रखा गया। साल 1996 में सीबीआई ने केरल की कोर्ट में रिपोर्ट फाइल करके इस जासूसी केस का झूठा करार दिया और फिर सभी आरोपी रिहा हो गए। लेकिन इसी वर्ष जून में केरल की सरकार ने फैसला किया कि वह केस की जांच दोबारा करेगी।

300 करोड़ के प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे नारायणन
इंटेलीजेंस ब्यूरो के तत्कालीन डायरेक्टर और बाकी अधिकारी जब-जब नारायणन से पूछताछ करते, वह हर बार इस बात से इनकार कर देते कि उन्होंने कोई जानकारी पाकिस्तान को उपलब्ध कराई है। नारायणन जिस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे वह काफी अहम था। साल 1994 में भारत सरकार की ओर से क्राइयोजेनिक अपर स्टेज (सीयूएस) प्रोजेक्ट को लॉन्च किया था। इस प्रोजेक्ट का बजट 300 करोड़ था। नारायणन पर आरोप लगा कि वह नाशिदा से मिले थे और उसके जरिए उन्होंने रॉकेट के लिए काफी अहम इस तकनीक को पाकिस्तान को बेचा था। नारायणन बार-बार इस बात से इनकार करते रहे। उन्होंने पूछताछ करने वाले अधिकारियों को बताया भी कि जिस तकनीक को बेचने के आरोप वह उन पर लगा रहे हैं, वह तो अभी भारत में ही डेवलप नहीं हुई है। अगर पाकिस्तान या दूसरे देशों को यह टेक्निक हासिल हो भी गई तो भी बिना भारत की मदद के इसे ऑपरेट नहीं किया जा सकेगा। लेकिन किसी ने उनकी एक नहीं सुनी।

आईबी और केरल पुलिस का संदिग्ध रोल
नारायणन के मेमोयर के मुताबिक एक अधिकारी ने उन्हें यह भी बताया कि शशिकुमारन ने अपने गुनाह कुबूल कर लिए हैं। इसके अलावा अधिकारियों ने यह भी कहा कि अगर नांबी अपने ऊपर लगे तमाम आरोपों को स्वीकार नहीं करते हैं तो फिर फौसिया को वहां लेकर आएंगे और वह उन्हें चप्पल से मारेंगी। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन दिल्ली में बतौर फेलो काम कर रहे मनोज जोशी ने द वॉयर में लिखा है कि भारत ने साल 1990 में रूस की एजेंसी ग्लावकोसोम्स के साथ इंजन के लिए एक डील साइन की थी। इस इंजन का प्रयोग रॉकेट की तीसरी स्टेज में होना था। इस पूरे एपिसोड में केरल पुलिस के अलावा आईबी का रोल भी काफी संदिग्ध रहा। आईबी और पुलिस ने इसे एक जासूसी केस बताया जबकि सीबीआई ने इस केस को झूठा बता दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने ठुकराई जांच की मांग
नांबी नारायणन पूरी तरह से बेकसूर थे तभी सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 1995 में केस की दोबारा जांच की मांग को ठुकरा दिया था। मई 1998 में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार से नारायणन और बाकी आरोपियों को एक लाख रुपए मुआवजा अदा करने को कहा। इसके बाद साल 1999 में नारायणन ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) में अपील की और मानसिक कष्ट के लिए हर्जाना देने की मांग की। मार्च 2001 में एनएचआरसी ने उनकी अपील को स्वीकार किया और 10 लाख रुपए के हर्जाने का आदेश दिया। सरकार ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी और नारायणन को 10 लाख रुपए हर्जाना दिया गया।












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