किसान आंदोलनः सुप्रीम कोर्ट का आदेश क्या सरकार के काम में दख़ल है

किसान आंदोलनः सुप्रीम कोर्ट का आदेश क्या सरकार के काम में दख़ल है

''समिति का उद्देश्य कृषि क़ानून को लेकर किसानों की बातें और सरकार की बातें सुनना होगा और इसके आधार पर ये समिति अपने सुझावों वाली रिपोर्ट बनाएगी. ये सुझाव दो महीने में कोर्ट के सामने पेश किए जाएंगे''

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस एसए बोबड़े की अध्यक्षता वाली बेंच ने ये बात अंतरिम आदेश में कही. 11 पन्नों के इस ऑर्डर में चार सदस्यीय समिति का काम क्या होगा इसका यही ब्यौरा दिया गया है.

सोमवार और मंगलवार की सुनवाई के बाद अदालत ने आख़िरकार केंद्र सरकार के तीन कृषि क़ानूनों पर अगले आदेश तक रोक लगा दी.

लेकिन इस फ़ैसले के बाद सबसे बड़ा सवाल जो कानून-संविधान की समझ रखने वालों के बीच छाया रहा वो ये कि क्या सुप्रीम कोर्ट ने विधायिका और न्यापालिका के बीच की सीमा को लांघा है?

अंतरिम आदेश के बाद उठ रहे सवालों पर हमने क़ानून और संविधान के जानकारों से बात की.

पूर्व सॉलिसिटर जनरल ऑफ़ इंडिया मोहन परासरन कहते हैं, ''सुप्रीम कोर्ट संसद के बनाए गए क़ानून को चुनौती देना चाह रहा है, ऐसे मामलों में कोर्ट संवैधानिक वैधता को देखता है कि एक क़ानून क्या नियमों के मुताबिक़ बना है या नहीं, सुप्रीम कोर्ट क़ानूनों को रद्द कर सकता है अगर वह कोर्ट की संविधान के व्याख्या के मुताबिक़ सही नहीं है तो."

वो आगे कहते हैं, ''दूसरी बात ये कि जब संवैधानिक चैलेंज होता है, तो वो पब्लिक लॉ यानी जन-क़ानून के अंतर्गत आता है. लेकिन ऐसे में मध्यस्थता नहीं हो सकती, यहां लोगों के अधिकारों की बात होती है, इसमें मध्यस्थता कैसे हो सकती है? इस मामले में मान लेते हैं कि मध्यस्थता होती भी है तो इसमें सभी पार्टियों की सहमति होनी चाहिए जो कि कोर्ट के पास नहीं है.''

किसान आंदोलन
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कोर्ट ने चार सदस्यों वाली एक कमेटी बनाई है जिसमें भूपिंदर सिंह मान, प्रमोद कुमार जोशी, अशोक गुलाटी और अनिल घनवत शामिल हैं. इन चारों सदस्यों ने लेख और बयानों के ज़रिए सरकार के नए कृषि क़ानूनों को खुलकर समर्थन दिया है. ऐसे में जैसे ही कोर्ट ने इस नामों का ऐलान किया तो लोगों ने इन सदस्यों के चुनाव पर सवाल उठाएं .

परासरन इस कमेटी के एकतरफ़ा मत रखने को लेकर सवाल उठाते हुए कहते हैं, ''एक कमेटी बनाई गई, जिसमें ऐसे लोग हैं जिन्होंने इस क़ानून का खुल कर समर्थन किया है. क्या वो लोग निष्पक्ष आकलन कर पाएंगे? ये बड़ा सवाल है.''

वो आगे कहते हैं, ''इस क़ानून को सरकार ने संसद ने पास किया है. कोर्ट के पास ये अधिकार है कि वह तय करे कि क़ानून संवैधानिक है या नहीं. इसके लिए कमेटी बनाना एक पैरेलल (समानांतर) कमेटी बनाने जैसा है. जैसे कि संसदीय समिति, जो ये देखती है कि क़ानून लोगों के लिए सही है या नहीं. लेकिन ये काम सुप्रीम कोर्ट का नहीं हो सकता. सुप्रीम कोर्ट का ये आदेश बेहद असामान्य है मेरी समझ के अनुसार आमतौर पर कोर्ट ऐसा नहीं करता. क़ानून से प्रभावित होने वाली पार्टिंयां भी इससे ख़ुश नहीं हैं. मुझे लगता है ये आग में घी डालने जैसा फ़ैसला है.''

'एक्सेस ज्यूडिशिल ऐक्टिविज़म'

सुप्रीम कोर्ट
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परासरन इस आदेश को एक्सेस ज्यूडिशिल ऐक्टिविज़्म बताते हैं.

वह कहते हैं, ''यह संसदीय फ़ैसलों में घुसने की कोशिश है और यही कारण है कि कई लोग कह रहे हैं कि कोर्ट अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़ा है. सुप्रीम कोर्ट पहले दिन से प्रदर्शन ख़त्म करना चाहता है. वो सरकार के क़दम से भी नाराज़ है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि वो संसद के कार्यक्षेत्र में दख़ल दे.''

लेकिन क़ानून के जाने-माने जानकार प्रोफ़ेसर फ़ैज़ान मुस्तफ़ा की राय इस मामले में मोहन परासरन से अलग है.

फ़ैज़ान मुस्तफ़ा मानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने हालात को देखते हुए इस मामले को सुलझाने की कोशिश की है और तकनीकियों का हवाला देकर इसे तूल नहीं दिया जाना चाहिए.

फ़ैजान मुस्तफ़ा ने कहा, ''सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऑर्डर में साफ़ कहा था कि हम इस वक़्त संवैधानिकता की बात नहीं कर रहे हैं बल्कि हम चाहते हैं कि इस मुद्दे का हल निकल सके. तो कोर्ट ने उस दिशा में काम किया, हां तकनीकी तौर पर देखें तो ये साफ़ है कि क़ानून अच्छा है या नहीं? ये एक राजनीतिक मुद्दा है और कोर्ट के लिए ये मुद्दा नहीं होता.''

विधायिका के काम में दख़ल का आरोप

क्या कोर्ट का आदेश प्रथम दृष्टया में विधायिका और न्यापालिका के बीच शक्ति के बंटवारे और उसके तालमेल में दख़ल नहीं माना जाना चाहिए?

इस सवाल के जवाब में प्रोफ़ेसर मुस्तफ़ा बताते हैं कि ''इससे जुड़ा एक सिद्धांत है जिसे पॉलिटिकल थिकेट सिद्धांत कहा जाता है. इस में कहा गया है कि कोर्ट नीतियों से जुड़े मामलों में दख़ल नहीं करता.''

लेकिन इसके साथ ही वह इस अंतरिम फ़ैसले के पक्ष में अपनी बात रखते हुए कहते हैं, ''चूंकि सुप्रीम कोर्ट देश की सबसे बड़ी अदालत है ऐसे में वो पूर्ण न्याय देने के लिए कोई भी फ़ैसला दे सकती है. कोर्ट को इस मामले में ये लगा होगा कि पहले ये आंदोलन ख़त्म हो जाए फिर इसकी संवैधानिकता के मामले को देखेंगे.''

क्या सुप्रीम कोर्ट ने वो कर दिया जो कहीं ना कहीं सरकार चाह रही थी?

इस सवाल के जवाब में वह कहते हैं कि ''सरकार ने बातचीत से हल ना निकलने की सूरत में मीडिया के ज़रिए ये बात कह दी कि सुप्रीम कोर्ट मामला हल करेगी''

मुस्तफ़ा कहते हैं,''देखिए कोर्ट की चिंता इस बात को लेकर थी कि आंदोलन को कैसे ख़त्म किया जाए. हालांकि ये भी सच है कि कोर्ट के लिए ये सवाल नहीं होना चाहिए लेकिन जैसा कि कोर्ट ने अपनी सुनवाई में कहा था कि हम अपने हाथों में किसी के ख़ून के छींटे नहीं चाहते. ये दर्शाता है कि सुप्रीम कोर्ट को ये डर था कि कहीं क़ानून-व्यवस्था की समस्या ना खड़ी हो जाए. इसलिए पहले आंदोलन ख़त्म करें फिर संवैधानिकता की कसौटी पर इसे कसा जाएगा. अक्सर कोर्ट ऐसा करती है.''

इसके उदाहरण में फ़ैज़ान मुस्तफ़ा मराठा आंदोलन का ज़िक्र करते हैं.

दरअसल मराठा आरक्षण के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के उस अध्यादेश पर रोक लगा दी थी जिसके तहत मराठा लोगों को 16% आरक्षण देने की बात कही गई थी.

हालांकि इस अध्यादेश पर रोक लगाने के पीछे इसकी संवैधानिक वैद्यता और आरक्षण से जुड़ा तकनीकी पक्ष था. ऐसे में ये उदाहरण वर्तमान परिस्थिति को समझने के लिए पेश किए जा रहे उदाहरण के तौर पर ज़्यादा फ़िट नहीं बैठता.

लेकिन फ़ैज़ान मुस्तफ़ा मानते हैं कि ये एक अंतरिम ऑर्डर है जिसे कोर्ट ने फ़िलहाल के लिए रोक दिया है.

'कृषि क़ानून को तो राज्यसभा से पारित ही नहीं किया गया'

14वीं और 15वीं लोकसभा के महासचिव और क़ानून के जानकार पीडी थंकप्पन आचार्य इस क़ानून की संवैधानिकता पर सवालिया निशान लगाते हुए कहते हैं, ''इन क़ानूनों को तो राज्यसभा से पारित तक नहीं किया गया. संविधान का अनुच्छेद 100 कहता है कि कोई भी फ़ैसला सदन में वोटो के बहुमत के आधार पर किया जाएगा. बहुमत क्या है? बहुमत का अर्थ है नंबर और गिनती के बिना नंबर कैसे पता चलेगा. राज्यसभा में ध्वनि मत से बिल पास किया गया. आख़िर ध्वनि मत से नंबर कैसे तय किया गया. ये क़ानून तो इसी आधार पर ग़लत है. लेकिन कोर्ट ने इस पर कोई बहस की ही नहीं."

वो आगे कहते हैं, "सरकार और किसान बातचीत कर ही रहे हैं और कोर्ट ने नई बॉडी को भी ला दिया, इससे कुछ होगा तो वो है कंफ्यूजन. इससे कुछ हल निकलेगा, कम से कम मुझे तो नज़र नहीं आ रहा है."

किसान आंदोलन
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आचार्य मानते हैं कि कोर्ट ने कई बातें अपने फ़ैसले में साफ़ नहीं की हैं.

वो कहते हैं, ''ऑर्डर में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कमेटी किसानों और सरकार से बातचीत करेगी लेकिन इसका आधार क्या होगा इसकी कोई जानकारी ही नहीं है. जो लोग किसानों के प्रदर्शन के ख़िलाफ़ बोल चुके हैं वो किसानों से क्या बात करेंगे. सुप्रीम कोर्ट ने ये भी नहीं बताया कि किस आधार पर ये चार लोग चुने गए. ऐसा लगता है कि सरकार ने इन नामों की लिस्ट कोर्ट को पकड़ा दी थी.''

''माना ये कमेटी किसानों से और सरकार से बात करके एक रिपोर्ट बनाए और अपने सुझावों वाली रिपोर्ट कोर्ट के सामने पेश करे तो क्या इस रिपोर्ट के आधार पर सुप्रीम कोर्ट इस क़ानून की संवैधानिक वैधता पर फ़ैसला लेगा? क्योंकि कुछ भी करने से पहले मामले की सुनवाई होनी चाहिए वो तो हुई नहीं. कुछ भी कोर्ट ने साफ़ नहीं किया है कि आख़िर एक ओर झुकी इस कमेटी के सुझाव का क्या होगा? ''

वो मानते हैं कि विधायिका के दायरे में दाख़िल होकर सुप्रीम कोर्ट वो करने जा रही है जो अब तक सरकारें करती थीं और वो है बातचीत का काम.

उन्होंने कहा,"आमतौर पर कोर्ट ऐसे किसी भी फ़ैसले से पहले मामले की सुनवाई करती है. सभी पक्षों की बात सुनने के बाद अगर कोर्ट को ये लगता है कि रोक लगनी चाहिए तो वह ऐसा करती है, ये बेहद असाधारण है कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई भी नहीं की और रोक का आदेश दे दिया."

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