दिल्ली की सत्ता की चाभी Congress के पास थी, है और रहेगी, कांग्रेसी ही तय करती है हार और जीत!
बेंगलुरू। दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 में कांग्रेस पार्टी ने 4.34 वोट शेयर के साथ दिल्ली में अब तक सबसे खराब प्रदर्शन किया है। कांग्रेस में कांग्रेस का जनाधार खिसक गया है यह हजम होने वाली बात नहीं है बल्कि कांग्रेस न चाहते हुए ऐसा करने को मजूबर हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि कांग्रेस बीजेपी के हाथ में सत्ता नहीं देना चाहती है और जहां भी उसे मौका मिलता है बीजेपी के हाथों से सत्ता छीनने के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहती है।

कुछ ऐसा ही गेम प्लान कांग्रेस ने दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए तैयार किया था, जिसका नतीजा था कि कांग्रेस को पूरा वोट आम आदमी पार्टी को शिफ्ट हो गया और एक बार फिर केजरीवाल एंड पार्टी दिल्ली में रिकॉर्ड दूसरी बार 70 विधानसभा सीटों में से 62 सीट जीतकर दिल्ली में सरकार बनाने जा रही है।

आकंड़ों पर गौर करेंगे तो पाएंगे कि दिल्ली में कांग्रेस का अच्छा खासा जनाधार है और अगर वह मजबूती से चुनाव मैदान में उतरती तो दिल्ली विधानसभा चुनाव में 10-15 सीटों पर कब्जा करने में सफल रहती, लेकिन कांग्रेस ने खुद को फाइट वाली स्थिति से दूर रखा। वजह साफ है कि कांग्रेस जानती है कि वह अपने बूते पर दिल्ली में सरकार बनाने लायक सीट हासिल करने में सफल नहीं होगी।

यही कारण था कि उसने न ही उसके चुनावी कैंपेन में आक्रामकता दिखी और न ही उसने सीएम कैंडीडेट की ही घोषणा की। कांग्रेस केवल बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने के लिए योजनाबद्ध तरीके से दिल्ली के अपने लगभग 22-24 फीसदी वोटों को आम आदमी पार्टी की ओर शिफ्ट करवा दिया।

गौरतलब है 2015 दिल्ली विधानसभा में भी कांग्रेस ने यही एप्रोच इस्तेमाल किया था और कांग्रेस को महज 8 फीसदी वोट शेयर हासिल हुआ और पार्टी जीरो पर आउट हो गई थी, लेकिन कांग्रेस बीजेपी को सत्ता से बाहर करने में कामयाब रही, जो वर्ष 2013 दिल्ली विधानसभा चुनाव में 32 फीसदी वोटों के साथ 31 सीटें जीतकर नंबर वन पार्टी बनकर उभरी थी।

वर्ष 2015 में केजरीवाल एंड पार्टी को कांग्रेस के सुस्त रवैये से फायदा हुआ था और पार्टी को 53.57 फीसदी वोट हासिल हुए थे और पार्टी ऐतिहासिक 67 सीट जीतने में कामयाब हुई थी जबकि बीजेपी 31 फीसदी वोट शेयर के बाद भी 3 सीटों पर सिमट कर रह गई थी।

कांग्रेस के गेम प्लान एक बार फिर दिल्ली की सत्ता से बाहर हुई भाजपा
कांग्रेस ने एक बार यही गेम प्लान दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 में चला और एक बार फिर बीजेपी को सत्ता से बाहर होना पड़ा जबकि बीजेपी कॉन्फिडेंट थी कि वह 48 सीट जीतकर 20 साल बाद दिल्ली की राजनीति वापस करेगी। इसका दावा दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी ही नहीं, बल्कि पूर्व बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने भी किया था, जिन्हें बीजेपी का चाणक्य भी पुकारा जाता है। लेकिन कांग्रेसी दांव के आगे सब दावे फेल हो गए। कांग्रेस दिल्ली विधानसभा चुनाव में बिल्कुल न के बराबर कैंपेन किया, जिससे कांग्रेस का वोट शेयर इस बार गिरकर 8 फीसदी से 4.34 फीसदी पहुंच गया। कांग्रेस से छिटके सारे वोट केजरीवाल के खाते में गए, जिससे पार्टी भले ही पिछला प्रदर्शन नहीं दोहरा सकी, लेकिन 70 में से 62 सीटें जीतने में कामयाब हुई।

बीजेपी के वोट शेयर में तकरीबन 7.5 फीसदी की वृद्धि हुई
दिलचस्प बात यह है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 में बीजेपी के वोट शेयर में तकरीबन 7.5 फीसदी की वृद्धि हुई, जो पिछले चुनाव की तुलना में 31 फीसदी से 38.46 फीसदी दर्ज की गई। इसका फायदा भी पार्टी को हुआ और बीजेपी के सीटों की संख्या 3 से बढ़कर 8 हो गई।

कांग्रेस ने नगर निगम व लोकसभा चुनाव में AAP से बेहतर प्रदर्शन किया
वर्ष 2015 में भी कांग्रेस ने तय किया था कि दिल्ली से बीजेपी को दूर रखने के लिए नवोदित आम आदमी पार्टी को सपोर्ट करेगी और इस बार भी ढुलमुल चुनावी कैंपेन से आम आदमी पार्टी को चुनाव जीतने में सहयोग किया। वरना पिछले 5 से 7 वर्षों में दिल्ली में कांग्रेस के प्रदर्शन का आकलन करेंगे तो पाएंगे कि कांग्रेस ने दिल्ली नगर निगम चुनाव हो या लोकसभा चुनाव दोनों चुनावों में आम आदमी पार्टी से बेहतर प्रदर्शन किया है।

दिल्ली में हमेशा कांग्रेस का वोट शेयर औसतन 22-25 फीसदी रहा है
दिल्ली में कांग्रेस का औसतन 22-24% वोट शेयर हमेशा रहा है। दिल्ली नगर निगम ( एमसीडी और एनडीएमसी) चुनाव में कांग्रेस का वोट शेयर कुल 22 फीसदी था जबकि आम आदमी पार्टी का वोट शेयर 18 फीसदी था, क्योंकि दिल्ली नगर निगम चुनाव में कांग्रेस का चुनावी कैंपेन आक्रामक था, जिसके केजरीवाल एंड पार्टी तीसरे स्थान पर पहुंच गई थी।

लोकसभा चुनाव 2019 में दूसरे स्थान पर रही कांग्रेस, मिले 22 फीसदी वोट
आम आदमी पार्टी यह हाल दिल्ली उप चुनाव में भी हुआ और लोकसभा चुनाव 2019 में देखा गया। लोकसभा चुनाव 2019 में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी दोनों जीरों पर आउट हुईं, लेकिन आक्रामक चुनावी कैंपेन के साथ दिल्ली लोकसभा सीटों के लिए लड़ी 22 फीसदी वोट शेयर के साथ दूसरे स्थान पर रही थी, जबकि आम आदमी पार्टी 18 फीसदी वोट शेयर के साथ बुरी तरह हारकर रेस से बाहर हो गई थी।

कांग्रेस का दिल्ली में 22 फीसदी वोट है, वो 4 फीसदी वोट पर क्यों खुश है?
सवाल उठता है कि जिस कांग्रेस का दिल्ली में 22 फीसदी वोट है, वो 4 फीसदी वोट पर क्यों खुश है। चुनाव नतीजे से पहले लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष अधीर रंजन चौधरी ने एग्जिट पोल के आधार पर ही केजरीवाल एंड पार्टी को बधाई दे दी और जब चुनाव नतीजे घोषित हुआ तो केजरीवाल एंड पार्टी के बाद कोई दूसरी पार्टी सेलिब्रेट करती हुई नजर आई तो वह थी कांग्रेस पार्टी। पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर पी. चिदंबरम तक ने बीजेपी को निशाना साधते हुए केजरीवाल को बड़ी जीत के लिए बधाई दी। चूंकि कांग्रेस का मुख्य ध्येय था बीजेपी को दिल्ली की सत्ता से बाहर रखना और वह उसमें कामयाब हो गई थी।

कांग्रेस AAP के खिलाफ कैंपेन करती तो बीजेपी को होता सीधा फायदा
क्योंकि अगर कांग्रेस आम आदमी पार्टी के खिलाफ कैंपेन करती तो उसके वोट बैंक कांग्रेस से दूर नहीं छिटकते, जिसका सीधा फायदा बीजेपी को होता और बीजेपी ने 45-50 सीट जीतकर सत्ता में आराम से काबिज हो जाती, जो कांग्रेस बिल्कुल नहीं चाहती थी। यही पैटर्न हरियाणा में दिखा था जब मनोहर लाल खट्टर वाली सरकार 2019 में हुए विधानसभा चुनाव में बहुत से कुछ दूर रह गई थी और कांग्रेस ने बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने के लिए जेजेपी को बिना शर्त समर्थन का ऑफर कर दिया था। हालांकि वहां कांग्रेस की दाल नहीं गली और बीजेपी ने जेजेपी के साथ सरकार बनाने में कामयाब रही।

बीजेपी को महाराष्ट्र की सत्ता से बाहर करने में कामयाब रही कांग्रेस
लेकिन कांग्रेस ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में एनडीए सहयोगी शिवसेना को तोड़कर बीजेपी को महाराष्ट्र की सत्ता से बाहर करने में कामयाब हो गई। महाराष्ट्र में पिछले 30 वर्ष से सहयोगी रही शिवसेना को एनडीए से अलग करने में कांग्रेस को एनसीपी चीफ शऱद पवार का साथ मिला, जो क्रमशः दूसरे और तीसरे नंबर की पार्टी थी। मजे की बात यह है कि कांग्रेस महाराष्ट्र में चौथे नंबर की पार्टी थी और आज महाराष्ट्र में सत्ता में काबिज है जबकि बीजेपी नंबर वन पार्टी होने के बाद भी महाराष्ट्र की सत्ता से बाहर है। यह कांग्रेस का गेम प्लान है और कांग्रेस जहां भी ऐसी स्थिति में होगी, बीजेपी को सत्ता से बाहर करने के लिए सब कुछ गंवाने में चूक रही है।

पहले से ही कांग्रेस ने दिल्ली में हार जीत का फैसला फिक्स कर दिया था
चूंकि दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 की हार जीत का फैसला पहले से ही कांग्रेस ने फिक्स रखा था, इसलिए नतीजे भी उसके अनुरूप ही आए हैं। अब केजरीवाल इसमें अपनी जीत देखकर खुश हो रहे हैं तो उनका खुश हो लेना चाहिए, लेकिन अगर यह खुशी पिछले विधानसभा चुनाव 2015 की तरह पांच साल तक चलती रही तो केजरीवाल की राजनीतिक यात्रा के लिए शुभ संकेत नहीं कहा जाएगा। क्योंकि 2024 लोकसभा चुनाव में ऊंट किस करवट बैठेगा, यह किसी को नहीं मालूम है और केजरीवाल को इसका पता तब चलेगा जब कांग्रेस दिल्ली विधानसभा चुनाव में आक्रामक होकर उसे फाइट देगी। हालांकि इसका आभास केजरीवाल को दिल्ली नगर चुनाव और लोकसभा चुनाव 2019 में हो चुका है।

कांग्रेस ने दिल्ली में लिए जोखिम का अंजाम अभी तक भुगत रही है
याद रखिए, दिल्ली विधान सभा चुनाव में भाजपा को हमेशा ही 34-38% तक वोट मिलता आया है, जो आज भी बरकरार है। उसमें अगर एक भी वोट कम नहीं हुआ है। यह बात कांग्रेस अच्छी तरह से जानती है। यह बात कांग्रेस वर्ष 2013 विधानसभा चुनाव में ही समझ गई थी जब 24 फीसदी से अधिक वोट शेयर के साथ कांग्रेस के हाथ 8 सीट आई थी और उसने बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए उस आम आदमी पार्टी को बाहर से समर्थन देने का फैसला किया, जिस पार्टी का पूरा चुनावी कैंपेन कांग्रेस के खिलाफ था, लेकिन उसने यह जोखिम लिया और उसका अंजाम अभी तक भुगत रही है, लेकिन वह बीजेपी को दूर रखने में अभी तक कामयाब जरूर रही है।

दिल्ली में भाजपा की सरकार तब तक नही बनेगी जब कांग्रेस चाहेगी?
ऐसा कहा जा सकता है कि दिल्ली विधानसभा में भाजपा की सरकार तब तक नही बनेगी जब तक खुद कांग्रेस नही चाहेगी और कांग्रेस यह तब तक नहीं चाहेगी जब केंद्र की सत्ता मोदी के नेतृत्व वाली सत्ता से बाहर नहीं हो जाती है। वरना कांग्रेस चाह लेती और दिल्ली विधानसभा चुनाव में पूरी ताकत से लड़ जाती भाजपा 38% वोट शेयर के साथ 45-50 सीट निकालने में कामयाब हो जाती और आम आदमी पार्टी को 10 सीट जीतने में भी लोहे के चने चौबने की नौबत आ जाती।
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