केरल के तिरुवनंतपुरम में RSS के 10 शीर्ष नेताओं में मंथन, लोकसभा चुनावों से पहले क्यों है महत्वपूर्ण? जानिए
भारतीय जनता पार्टी लगातार दक्षिण भारत में अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिशों में जुटी हुई है। केरल में तो हाल में उसके समर्थन में चर्च के नेताओं को भी आते हुए देखा गया है। इन सबके बीच शीर्ष स्तर के 10 आरएसएस पदाधिकारियों का वहां की राजधानी तिरुवनंतपुरम में दो दिनों की बैठक खास मायने रखती है।
सबसे बड़ी बात कि दो दिवसीय संघ की बैठक में सर संघचालक (आरएसएस प्रमुख) मोहन भागवत और संघ के सरकार्यवाह (महासचिव) दत्तात्रेय होसबले भी शामिल हुए हैं। न्यूज एजेंसी पीटीआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक संघ के सूत्र ने इसे 'एक छोटी टीम की बैठक' बताया है।

संघ की शीर्ष बैठक को 'रुटीन मामला' कहा गया है
संघ में इस तरह की बैठकों की जानकारी रखने वाले व्यक्ति ने एजेंसी को बताया कि सोमवार से शुरू हुई आरएसएस नेताओं की यह बैठक 'रुटीन मामला' है, जो संगठन की कार्यकारिणी की दो बैठकों के बीच में होती है।
केरल दौरे पर हैं संघ प्रमुख मोहन भागवत
सूत्र का कहना है कि 'आमतौर पर ऐसी बैठक में दो राष्ट्रीय कार्यकारियों के बीच होने वाले घटनाक्रमों के बारे में चर्चा होती है। अगर ऐसी कोई घटनाक्रम नहीं भी होती है, तो भी ऐसी बैठकें होती हैं। तिरुवनंतपुरम की बैठक में सिर्फ 10 शीर्ष पदाधिकारी शामिल हो रहे हें।' यह भी कहा गया है कि केरल में यह बैठक इसलिए की गई है, क्योंकि आरएसएस प्रमुख अभी इस राज्य के प्रवास पर निकले हुए हैं।
जानकारी के मुताबिक केरल यात्रा के दौरान भागवत 7 अक्टूबर से विभिन्न तरह के कार्यक्रमों में हिस्सा ले रहे हैं, जिसमें कोझिकोड में केसरी साप्ताहिक की ओर आयोजित अमृतस्थानम लेक्चर सीरीज और कोल्लम में प्रदेश संघचालकों के साथ हुई बैठक भी शामिल है।
सभी धर्मों और भाषाओं की एकजुटता का दे चुके है संदेश
इस दौरान पिछले शनिवार को कोझिकोड में 'राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का संगठनात्मक विज्ञान' विषय पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि हिंदू समाज को संगठित होना चाहिए, क्योंकि संगठित समाज से ही समृद्ध देश का निर्माण होता है। इस दौरान उन्होंने देश में सभी धर्मों और सभी भाषाओं के लिए भी एकजुटता की बात की।
लोकसभा चुनावों से पहले संघ नेताओं की बैठक क्यों है अहम?
संघ के शीर्ष नेताओं का केरल में ऐसे समय में जमावड़ा लगा है, जब अगले साल लोकसभा चुनाव होने हैं। यह चुनाव भारतीय जनता पार्टी के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होने वाला है, क्योंकि 28 विपक्षी दलों ने इसके खिलाफ इंडिया ब्लॉक बनाकर उसे कड़ी चुनौती देने की ठान रखी है।
जबकि, केरल एक ऐसा राज्य है, जहां इंडिया ब्लॉक में शामिल दो बड़ी पार्टियां कांग्रेस और सीपीएम ही एक-दूसरे के आमने-सामने हैं। दोनों दलों की सियासी लड़ाई यहां पश्चिम बंगाल से ठीक उलट है, जहां दोनों ने पिछले कई चुनावों से हाथ मिला रखे हैं। संघ बीजेपी का वैचारिक संगठन है, इसलिए यहां उसके नेताओं का जुटना काफी मायने रखता है।
खासकर तब जब बीजेपी ने उत्तर-पूर्व के तीन राज्यों में काफी अच्छा प्रदर्शन किया है। इनमें से नागालैंड और मेघालय में इसी साल चुनाव हुए हैं, जो ईसाई बहुल राज्य हैं। जबकि, त्रिपुरा में विधानसभा उपचुनाव में भाजपा ने एक ऐसी सीट जीती है, जो कि मुस्लिम बहुल है। इसी से उत्साहित होकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कह चुके हैं कि बीजेपी की अगुवाई वाला एनडीए आने वाले वर्षों में केरल पर भी शासन करेगा।
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