जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध से कश्मीरी ख़फ़ा क्यों: ग्राउंड रिपोर्ट

जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध से कश्मीरी खफा
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जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध से कश्मीरी खफा

ये जमात ऐ इस्लामी जम्मू-कश्मीर कौन-सी पार्टी है जिस पर लगी पाबंदी से पूरे कश्मीर में विरोध प्रकट किया जा रहा है.

उमर अब्दुल्लाह और महबूबा मुफ़्ती जैसे राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हों या दो अलग विचारधारा के मालिक या फिर आधुनिक और पारंपरिक लोग, केंद्रीय सरकार द्वारा 28 फ़रवरी को पार्टी पर लगाए प्रतिबन्ध के सभी ख़िलाफ़ हैं.

श्रीनगर में जमात के पूर्व और वर्तमान के नेताओं से मिलने की कोशिश की, लेकिन कोई इसके लिए तैयार नहीं था. जमात से जुड़े एक स्थानीय युवा की कोशिशों से संस्था के महासचिव फ़हीम मोहम्मद रमज़ान से एक गुप्त स्थान पर मुलाक़ात हुई.

पार्टी की लीडरशिप में वो दूसरे स्थान पर हैं. इसके अध्यक्ष या अमीर, अब्दुल हमीद फ़ैयाज़, अपने दर्जनों साथियों के साथ इन दिनों जेल में हैं.

शायद गिरफ़्तारी से बचने के लिए फ़हीम मोहम्मद रमज़ान खुले आम बाहर नहीं निकलते. हमारी मुलाक़ात एक गुप्त जगह पर हुई.

बड़े से एक घर के एक छोटे और धीमी रौशनी वाले कमरे में वो अपने कुछ साथियों के साथ बैठे बातें कर रहे थे. घनी दाढ़ी और कश्मीरी टोपी पहने फहीम रमजान घबराये नहीं थे. उन्होंने इस प्रतिबन्ध को संविधान के ख़िलाफ़ बताया.

फ़हीम मोहम्मद रमज़ान
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फ़हीम मोहम्मद रमज़ान

'कोर्ट जाएंगे'

उन्होंने कहा, "हम अदालत का दरवाज़ा खटखटाएंगे बाज़ाब्ता तौर पर. हम साबित करने की कोशिश करेंगे कि जमात ऐ इस्लामी पर लगे इल्ज़ामात बेबुनियाद हैं, इनकी कोई हक़ीक़त नहीं"

उनके अनुसार उनकी पार्टी सियासी ज़रूर है लेकिन साथ ही धार्मिक और सामजिक भी है जिसका काम समाज में भलाई करना और लोगों तक इस्लाम पहुँचाना है. इसके एक्टिव सदस्य 4,000 से अधिक नहीं होंगे लेकिन इनके हमदर्द लाखों में हैं जो इनकी विचारधारा को मानते हैं.

हमें उन्होंने अपनी संस्था पर लगी पाबंदी से उन हज़ारों लोगों को होने वाले नुकसान की बात बताई जो जमात के माहवारी वज़ीफ़े पर निर्भर करते हैं.

"हमारे बैतूल माल पर हज़ारों ग़रीब लोग निर्भर करते हैं. हमारे दर्जनों शिक्षण संस्थान हैं जहाँ बच्चे हमारे वज़ीफ़े के कारण अपनी पढ़ाई करते हैं. उनका क्या होगा?"

कश्मीरी लोग
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कश्मीरी लोग

आरएसएस की तरह कैडर आधारित पार्टी

जमात ऐ इस्लामी जम्मू कश्मीर भारत की जमात ऐ इस्लामी हिन्द से अलग है. ये आरएसएस की तरह कैडर पर आधारित पार्टी है. आपातकालीन में आरएसएस के साथ जमात पर भी प्रतिबन्ध लगाया गया था.

इसे भारत सरकार अलगाववादी और पाकिस्तान समर्थक बताती है. इसने अतीत में कई चुनाव लड़े हैं, लेकिन फहीम रमजान के मुताबिक़ उनकी पार्टी का चुनाव प्रणाली पर भरोसा उठा गया है.

पार्टी ने 2003 में चुनाव कभी न लड़ने का फैसला किया था, लेकिन कश्मीर में कई लोगों के विचार में पिछले विधान सभा चुनाव में जमात के कैडर की मदद से ही महबूबा मुफ़्ती की पीडीपी ने जमात के गढ़ दक्षिण कश्मीर में कई सीटें जीती थीं.

जमात पर लगी पाबंदी के बाद इसके मुख्यालय में अब ताला लग लग गया है. इसके दर्जनों नेता हिरासत में. कुछ अंडरग्राउंड भी हैं. सरकार का दावा है कि जमात पर पाबंदी लगाने का उसका फ़ैसला सही है.

मोहम्मद यूसुफ़ मंटू
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मोहम्मद यूसुफ़ मंटू

आख़िर पाबंदी क्यों लगी?

जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने फोन पर बीबीसी को इसकी वजह ये बताई, "दुनिया भर में जमात ए इस्लामी जैसी संस्थाएं ही शिक्षा और लोगों की मदद करने जैसे काम की आड़ में टेररिज़्म की फंडिंग, उसको बढ़ाने और रेडिकलाइज़ेशन का काम करती हैं. यहाँ जमात बड़े पैमाने पर कट्टरता फैला रहा था अपने मदरसों में."

राज्य में जमात के स्कूलों का जाल बिछा है, इनमें धार्मिक पढ़ाई के इलावा आधुनिक शिक्षा देने का दावा किया जाता है.

शोपियां में जमात की विचारधारा वाले इस धार्मिक स्कूल में 650 बच्चे पढ़ते हैं. इस स्कूल को चलाने वाली सिराजुल उलूम एजुकेशनल सोसायटी के अध्यक्ष मोहम्मद यूसुफ़ मंटू कहते हैं उनके स्कूल में बच्चों को "नैतिक और धार्मिक शिक्षा के इलावा आधुनिक पढ़ाई भी दी जाती है."

मंटू ने बताया प्रशासन उनके स्कूल भी आया था लेकिन इसे सील नहीं किया. वो इस पाबन्दी पर खेद प्रकट करते हैं, "जमात ऐ इस्लामी जम्मू-कश्मीर को केंद्रीय सरकार शक की निगाह से देख रही है. ग्राउंड में ऐसा नज़र नहीं आ रहा है. मेरे ख्याल में ये अच्छी बात नहीं है उन्होंने इस पर पाबन्दी लगाई है. हिंदुस्तान के लिए, क़ौम के लिए, कश्मीर के लिए मेरे ख्याल में मुश्किलात में बढ़ावा कर दिया है."

जमात पर पहले भी पाबंदी लगाई जा चुकी है. साल 1975 और 1993 में. सवाल ये है कि क्या पार्टी पर पाबंदी से कट्टरता कम होगी? चरमपंथी हमले बंद होंगे?

जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध से कश्मीरी खफा
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जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध से कश्मीरी खफा

नताशा राथर एक मानव अधिकार कैम्पेनर हैं, जिनका काम दूर दराज़ के इलाक़ों में आम लोगों से मिलना है.

वो कहती हैं, "अगर आप बोलना चाह रहे हैं कि जमात लोगों में अपनी विचारधारा पैदा कर रही है और हिंदुस्तान के ख़िलाफ़ लोगों को खड़ा कर रही है तो यह ग़लत होगा. अगर जमात ए इस्लामी जैसे संगठन ना भी हों तो कश्मीर के लोगों में इतनी साझदारी आ चुकी है कि हम एक ऑक्यूपेशन में रह रहे हैं, और हमें इस ऑक्यूपेशन से लड़ना है ताकि हम एक समूह की हैसियत से जीवित रह सकें."

सरकार मानती है कि जमात की विचारधारा ख़त्म नहीं होगी. लेकिन जैसा कि राज्यपाल कहते हैं इसकी गतिविधियों में कमी आएगी, "मैं ये मानता हूँ कि इससे जमात ख़त्म नहीं होगी लेकिन इससे जमात की एक्टिविटी पर अंकुश लगेगा, इससे कट्टरता के फैलाव में रुकावट आएगी, इससे वो जिस तरह की एक्टिविटी कर रहे थे वो रुकेगी."

राज्य के बुद्धिजीवी भी इस प्रतिबन्ध के ख़िलाफ़ हैं. उनका कहना है कि इससे नतीजा उल्टा होगा. शैख़ शौकत हुसैन स्कूल ऑफ़ लीगल स्टडीज़ के अध्यक्ष हैं, "ये कॉंटेरप्रोडक्टिव होगा. इससे जमात की लोकप्रियता बढ़ेगी."

कश्मीरी लोग
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'फैसला लोकतंत्र के ख़िलाफ़'

कश्मीर यूनिवर्सिटी में इंस्टिट्यूट ऑफ़ कश्मीर स्टडीज़ के इब्राहिम वाणी कहते हैं ये फ़ैसला लोकतंत्र के ख़िलाफ़ है. "इस पाबंदी से कश्मीर में सिकुड़ा हुआ सियासी स्पेस और भी सिकुड़ जाएगा."

कश्मीर के युवा भी भारत सरकार के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ नज़र आते हैं. श्रीनगर के लाल चौक पर खड़े एक युवा ने कहा, "उन्होंने जो जमात ऐ इस्लामी पर पाबंदी लगाई है उससे कोई फ़ायदा नहीं होगा, उससे समाज में तनाव और बढ़ेगी. एक और युवा ने कहा, "देखिए बैन करने से टेंस हालात और टेंस हो सकते हैं. तो इससे कुछ होने वाला तो है नहीं."

पाबंदी पांच साल के लिए हैं. नताशा आथर ने कहा कि अभी चुनाव आने वाले हैं. ये पाबंदी भारत में लोगों को खुश करने के लिए लगाई गई है.

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