कश्मीर घाटी में इस बार क्यों हुई ज्यादा वोटिंग, आर्टिकल-370 खत्म होना या अलग है वजह?

Kashmir Lok Sabha Election: कश्मीर घाटी में लोकसभा की तीन सीटें हैं और यहां कुल मिलाकर इस बार 58.5% से ज्यादा मतदान हुआ है। पिछले 35 वर्षों में यह सबसे ज्यादा वोटिंग है, जब वहां हिंसा के दौर की शुरुआत हुई थी और धरती की जन्नत को कलंकित किया गया था।

कश्मीर घाटी की तीन लोकसभा सीटों में बारामूला उत्तरी कश्मीर में नियंत्रण रेखा से सटा चुनाव क्षेत्र है, श्रीनगर सेंट्रल कश्मीर का इलाका है और परिसीमन के बाद बना अनंतनाग-राजौरी दक्षिण कश्मीर में पीर पंजाल रेंज वाला चुनाव क्षेत्र है।

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कश्मीर के वोटरों की चुनाव प्रक्रिया में क्यों बढ़ी दिलचस्पी?
इस बार बारामूला में 59.1%, श्रीनगर में 38.5% और अनंतनाग-राजौरी में 54.9% वोटिंग हुई है। अगर पिछले 8 लोकसभा चुनावों को देखें तो इस बार 15 से 20% ज्यादा वोटर मतदान के लिए निकले हैं, जो कि लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत है। लेकिन, सवाल है कि आखिर 5 वर्षों में ऐसा क्या बदला है कि कश्मीर के लोगों की चुनाव प्रक्रिया में दिलचस्पी बढ़ गई है।

कई उम्रदराज लोगों ने पहली बार किया मतदान
अंग्रेजी अखबार इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुतबिक इस बार 40 और 50 की उम्र वाले ऐसे हजारों लोगों ने मतदान किया है, जिन्होंने अभी तक चुनाव में हिस्सा नहीं लिया था।

ज्यादा वोटिंग की अलग-अलग वजह बता रहे हैं लोग
पहली बार वोट डालने वाले बारामूला के एक बिजनेसमैन मोहम्मद तुफेल के मुताबिक, 'यह वोट यहां जो कुछ हो रहा है, उसके खिलाफ हमारे गुस्से का इजहार है। हमें जबरन चुप करा दिया गया है। यह वोट हमारा एकमात्र इजहार है, जो हमें जेल नहीं पहुंचाएगा।'

जनबाजपोरा के एक और सज्जन साहिल परवेज का कहना है कि,'हम नई दिल्ली को एक पैगाम देना चाहते हैं कि 5 अगस्त, 2019 के फैसले और उसके बाद घाटी में जो कुछ हुआ उससे हम खुश नहीं हैं।'

'पिछले 30 वर्षों में पहली बार...'
लेकिन, घाटी में रहने वाले सारे लोगों का ज्यादा मतदान को लेकर एक ही तरह की सोच नहीं है। श्रीनगर के 40 वर्षीय आईटी प्रोफेशनल काशिम अहमद कहते हैं, 'पिछले 30 वर्षों में पहली बार, मैं चुनावों को लेकर सड़कों पर जैविक बदलाव होते देख रहा हूं।' वैसे बारामूला में ज्यादा मतदान के पीछे पूर्व एमएलए अब्दुल राशिद शेख उर्फ इंजीनियर राशिद के पीछे सहानुभूति को भी बताया जा रहा है, जो जेल में बंद हैं और चुनाव मैदान में हैं।

कश्मीर में ऐसे बदल रही है लोकतंत्र के प्रति सोच
लेकिन, कई मतदाताओं को लगता है कि 'शांतिपूर्ण बहिष्कार' और 'हथियार उठाने' जैसे कथित 'राजनीतिक प्रयोगों' से कोई परिणाम नहीं निकला है और 35 वर्षों की खराब यादें ही रह गई हैं। इसलिए उन्होंने मतदान केंद्रों पर कतार में खड़े होने को प्राथमिकता देने का फैसला किया है।

'मेरा पहला वोट पाकिस्तान के खिलाफ'
कुलगाम के सज्जाद अहमद कहते हैं, 'पाकिस्तान ने हमें नाकाम कर दिया। हम निराश हैं। मैं 51 साल का हूं और मेरा पहला वोट भारत और मोदीजी के समर्थन में और पाकिस्तान के खिलाफ है।'

कश्मीर के युवाओं को दिख रहा है सुनहरा भविष्य
वहीं सोपोर के एक कॉलेज छात्र तौसीफ पंडित को बागवानी सेक्टर में अच्छी नीतियों की वजह से बेहतर भविष्य दिख रहा है और उन्हें मतदान अच्छा विकल्प नजर आ रहा है।

कश्मीर में महिलाएं बनीं मजबूत लोकतंत्र की ब्रांड एंबेसडर
कश्मीर में अब अलगाववादियों के दिन लद चुके हैं। एक जमाना था कि उनकी ओर से खुलेआम चुनाव बहिष्कार का ऐलान किया जाता था। अगर 50 वर्ष का कोई इंसान आजतक मतदान में हिस्सा नहीं ले पाया था, तो हालात की भयानकता समझी जा सकती है।

लेकिन, अब परिस्थियां बदल गई हैं और सबसे दिल जीतने वाली बात ये है कि महिलाओं ने भारतीय लोकतंत्र को मजबूर करने में दिल खोलकर जोश दिखाया है।

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