कर्नाटक में राजनीति की चक्की में पिसेंगे प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्र? कांग्रेस सरकार के फैसले पर सियासी विवाद

कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार ने एक ऐसा कदम उठाया है, जिसकी वजह से न सिर्फ नया राजनीतिक विवाद शुरू है, बल्कि लाखों लोगों को किफायती दवाई खरीदने से भी वंचित रहना पड़ सकता है। सिद्दारमैया सरकार ने राज्य के सरकारी अस्पतालों में मौजूद प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्रों को बंद करने का फैसला किया है।

कर्नाटक के स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा विभाग ने तय किया है कि सरकारी अस्पतालों में जितने भी जन औषधि केंद्र हैं, सबको आगे से बंद कर दिया जाएगा।

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प्रधानमंत्री जन औषधि केंद्रों में मिलती ही सस्ती दवाई
केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री जन औषधि योजना के तहत इन दवा दुकानों पर लोगों को गुणवत्ता वाली जेनरिक दवाइयां किफायती दरों पर उपलब्ध करवाई जाती हैं। हालांकि, कर्नाटक में सीमित संख्या में ही राज्य सरकार के अस्पतालों में अभी ऐसी दुकानें चल रही हैं, जिसमें से बेंगलुरु का केसी जेनरल अस्पताल भी शामिल है।

कर्नाटक सरकार सरकारी अस्पतालों में नहीं देगी अनुमति
लेकिन राज्य सरकार का स्वास्थ्य विभाग इसे जल्द बंद करने जा रहा है। यही नहीं, इन जन औषधि केंद्रों को कांग्रेस सरकार आगे भी राज्य के किसी सरकारी अस्पताल में खोलने की अनुमति नहीं देगी।

कांग्रेस कर रही है नफरत की राजनीति- बीजेपी
कर्नाटक सरकार के इस निर्णय के खिलाफ बीजेपी ने आंदोलन शुरू करने का एलान किया है। जबकि, कांग्रेस नेताओं का दावा है कि सरकारी अस्पतालों में वैसे ही दवाएं मुफ्त दी जाती हैं और जन औषधि केंद्रों की वजह से भ्रष्टाचार को ही बढ़ावा मिलेगा।

बीजेपी करेगी कांग्रेस सरकार के फैसले के खिलाफ आंदोलन
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र ने कांग्रेस सरकार के कदम का विरोध करते हुए कहा है, 'सरकार के इस फैसले में कांग्रेस की नफरत की राजनीति की झलक मिलती है। पहले इसने केंद्र की किसान सम्मान योजना के तहत किसानों को अतिरिक्त 4,000 रुपए देने के लिए बीएस येदियुरप्पा सरकार की ओर से शुरू की गई योजना खत्म कर दी थी। अब यह उन जन औषधि वाली दुकानें बंद करने जा रही है, जो गरीब मरीजों के लिए हैं। हम इसके खिलाफ लड़ेंगे।'

बीजेपी नेता का दावा है कि जन औषधि योजनाओं से करीब 20 लाख परिवारों को फायदा मिल रहा है। कर्नाटक में ऐसे करीब 8,900 केंद्र हैं। बीजेपी कार्यकर्ता और नेता उन सरकारी अस्पतालों के बाहर प्रदर्शन करेंगे, जहां मौजूदा जन औषधि केंद्र बंद होने वाले हैं।

जन औषधि केंद्रों की आवश्यकता नहीं- कर्नाटक सरकार
यह विवाद तब शुरू हुआ जब चिकित्सा शिक्षा मंत्री डॉक्टर शरण प्रकाश पाटिल ने कह दया कि 'जन औषधि केंद्रों की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि सरकारी अस्पतालों को गरीबों को बिना पैसों के मरीजों को दवाई देनी है।'

उन्होंने कहा था, 'हम अपने सभी अस्पतालों में दवाइयों की उपलब्धता सुनिश्चित कर रहे हैं। डॉक्टरों को ऐसी दवाओं की सलाह नहीं देनी चाहिए, जो मरीजों को बाहर से खरीदनी पड़े।'

उनका दावा था कि 'हालांकि, जन औषधि में किफायती कीमतों पर दवा मिलने का दावा किया जाता है, सरकारी अस्पतालों को इसे उन्हें मुफ्त में उपलब्ध करवाना है। यही वजह है, जिसके चलते हम कह रहे हैं कि जन औषधि केंद्रों की जरूरत नहीं है। मौजूदा केंद्रों की लाइसेंस हम रिन्यू नहीं करेंगे।'

राज्य के स्वास्थ्य मंत्री दिनेश गुंडू राव ने भी अपने सहयोगी के विचारों का समर्थन करते हुए दावा किया कि सरकारी अस्पतालों के लिए दवाई की खरीद में पहले से भारी इजाफा किया जा चुका है।

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