2023 को अपना आखिरी चुनाव बता कर इमोशनल कार्ड खेलने वाले सिद्धारमैया क्यों हैं कांग्रेस के लिए अहम
कर्नाटक चुनाव की तारीखों की घोषणा के बाद कांग्रेस नेता सिद्धारमैया ने ऐलान किया कि ये उनका आखिरी चुनाव है। आइए जानते हैं सिद्धारमैया कांग्रेस पार्टी के लिए क्यों इतने अहम हैं ?

कर्नाटक विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा के बाद प्रमुख राजनीतिक पार्टियां जीत हासिल करने के लिए चुनाव प्रचार में जुट चुकी हैं। भाजपा और कांग्रेस एक दूसरे पर आरोप लगाते हुए प्रचार कर रही हैं वहीं इनसे अलग कर्नाटक की तीसरी प्रमुख पार्टी जेडीएस अपने चुनाव प्रचार में को तवज्जों देते हुए जमींनी स्तर पर वोटरों को साधने में जुटी हैं। चुनाव की तारीखों की घोषणा होते ही कांग्रेस अध्यक्ष डीके शिवकुमार ने 2023 में बहुमत की सरकार बनाने का दावा किया वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सिद्धारमैया ने इस चुनाव को अपने राजनीतिक करियर का आखिरी चुनाव बताते हुए चुनाव में इमोशनल कार्ड खेल कर वोटरों को साधने की कोशिश की है। सिद्धारमैया ने दो सीटों से चुनाव लड़ने का ऐलान करते हुए कहा कि ये मेरा आखिरी चुनाव है। आइए जानते हैं कर्नाटक में सिद्धारमैया कांग्रेस के लिए क्यों बेहद अहम हैं?

कांग्रेस के सबसे वफादार नेता
कभी पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के राजनीतिक नायक माने जाने वाले सिद्धारमैया जेडीएस में रहते हुए उपमुख्यमंत्री बने लेकिन 2006 में जेडी (एस) के मुखिया से मतभेद के बाद जेडीएस से निष्काषित कर दिया था। जिसके बाद वो कांग्रेस में शामिल हो गए थे और तभी से कांग्रेस के वफादार बने हुए हैं।
कांग्रेस के पितामह सिद्धारमैया
कुरुबा समुदाय के नेता सिद्धारमैया की बदौलत ही कांग्रेस सत्ता में आई और 2018 में कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन सरकार बनाने में सिद्धारमैया ने समन्वय समिति के अध्यक्ष के तौर पर अहम भूमिका निभाई थी।
पिछड़े वर्ग के वोटरों के नेता
पिछड़े वर्ग के समुदायों के नेता के रूप में सिद्धारमैया जानें जाते हैं।आंकड़ों के अनुसार कर्नाटक में दलित समाज का प्रतिशत 19.5 प्रतिशत है वहीं ओबीसी 16 प्रतिशत है और मुसलामालों भी 16 प्रतिशत हैं। जातिगत आंकड़ों के हिसाब से भी सिद्धारमैया कांग्रेस के लिए बेहद अहम हैं। उन्हें कांग्रेस किसी भी हालत में कम आंकने की गलती नहीं कर सकती है।
"जन नेता" सिद्धारमैया
कर्नाटक के दो बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने वाले सिद्धारमैया पर जाति आधारित राजनीति को बढ़ावा देने के लिए उनकी आलोचना की जाती रही। राज्य में पिछड़े वर्गों के लिए एक प्रकार के प्रतीक, ओबीसी कुरुबा समुदाय से आने वाले सिद्धारमैया को अक्सर "तगारू" (राम) और "हुलिया" (बाघ) कहा जाता है सिद्धारमैया को जनता का जबदरस्त समर्थन प्राप्त है इसलिए उन्हें "जन नेता" यानी जनप्रिय नेता कहा जाता है।
कर्नाटक के दूसरे ऐसे सीएम जिन्होंने बनाया ये रिकार्ड
साधारण से कृषक परिवार से संबंध रखने वाले सिद्धारमैया जिन्हें उनके पिता डॉक्टर बनाना चाहते थे लेकिन वो पहले वकील बने और उसके बाद अपनी पीढ़ी के पहले शख्स जो राजनीति में आए और सीएम की कुर्सी तक पहुंचे। कोई राजीनीतिक पारिवारिक पृष्ठभूमि ना होने के बावजूद सिद्धारमैया देवराज उर्स के बाद ऐसे मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने पांच साल पूरे किए। कर्नाटक की राजनीति में सिद्धारमैया ऐसे दूसरे मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने बतौर सीएम पांच साल का कार्यकाल पूरा किया।
गरीबों के दर्द को समझा और की ये पहल
भूख मुक्त कर्नाटक का सपना देखने वाले सिद्धारमैया ने अपने कार्यकाल में इंदिरा कैंटीन बनवाई जहां महज 10 रुपये में लोगों को दो समय खाना परोसा जाता है। इतना ही नहीं सरकार के गठन के बाद उन्होंने गरीबों को चावल मुहैया कराया।
कर्नाटक में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़कर रचा ये इतिहास
2010 में सिद्धारमैया ने बेंगलुरू में रेड्डी ब्रदर्स के खिलाफ 320 किमी पद्ययत (बल्लेरी चलो) में बैलेरी की यात्रा की और बल्लेरी चलो अवैध खनन और भ्रष्टाचार पर सत्तारूढ़ बीजेपी को टारगेट किया था। ये घटना कर्नाटक के इतिहास में बड़ी ही ऐतिहासिक है।
सिद्धारमैया की कुल संपत्ति
सिद्धरमैया की संपत्ति की जाए तो एक बार उपमुख्यमंत्री और दो बार कर्नाटक के सीएम रहे सिद्धारमैया के पास 2018 के चुनाव के समय 15.5 करोड़ की संपत्ति थी।
सीमए के तौर पर जनता की पहली पसंद है सिद्धारमैया
कर्नाटक ओपिनियन पोल के अनुसार एबीपी न्यूज सीवोटर रिपोर्ट के अनुसार 115 से 127 सीटें कांग्रेस को मिलने का आसार है वहीं भाजपा को महज 68 से 80 और जेडीएस को 23 से 35 सीटें मिलने की उम्मीद है। इस सर्वे के अनुसार सर्वे में ये भी खुलासा हुआ है कि मुख्यमंत्री के तौर पर पहले नंबर पर पूर्व सीएम सिद्धरमैया ही लोगों की पहली पसंद हैं। इस सर्वे में 39 प्रतिशत जनता ने वोट किया है।












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