सबसे बड़ा सवाल, अब नवंबर में राजस्थान, मप्र, छत्तीसगढ़ के साथ होंगे लोकसभा चुनाव?
नई दिल्ली: 2019 आम चुनाव कब होंगे? समय पर या समय से पहले? इस बात को लेकर कई महीनों से लंबी-चौड़ी बहस छिड़ी हुई थी, लेकिन कर्नाटक चुनाव करीब आते ही इस बहस पर थोड़ा विराम लग गया था। इंतजार था कर्नाटक चुनावों के नतीजों का। मंगलवार को कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2018 के नतीजों के साथ ही कयासबाजी का दौर एक बार फिर जोर पकड़ने लगा है। सवाल वही पुराना है- क्या कर्नाटक चुनाव में बीजेपी के सबसे बड़ी पार्टी बनने के बाद अब नवंबर में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के साथ ही होंगे लोकसभा चुनाव? ऐसा संभव है। 2019 लोकसभा चुनाव समय से पहले कराए जाने को लेकर हो रही बहस और कयासबाजी के पीछे तीन अहम कारण हैं, डालते हैं इन पर एक नजर:

लोकसभा चुनाव जल्दी करा एमपी, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में एंटी इनकमबैंसी की काट निकाल सकती है बीजेपी
पहला और सबसे अहम कारण राजनीतिक है। साल के अंत में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में चुनाव होने हैं। ऐसे में अगर लोकसभा चुनाव इनके साथ कराए दिए जाते हैं तो बीजेपी को इन राज्यों में पनप रही एंटी इनकमबैंसी की काट मिल सकती है। मध्य प्रदेश की बात करें तो यहां 15 साल से बीजेपी की सरकार है। इसी प्रकार से छत्तीसगढ़ में रमन सरकार को भी लंबा अरसा हो गया। राजस्थान के वोटर का ट्रेंड है- हर पांच साल में सरकार बदलना। ऐसे में आने वाले तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों में बीजेपी को हार डर सता रहा है। दिक्कत यह है कि राज्यों के चुनाव पीछे खिसकाना तो बीजेपी के हाथ में है नहीं। इससे संवैधानिक संकट भी खड़ा हो सकता है, लेकिन लोकसभा चुनाव समय से पहले कराना बीजेपी के हाथ में है। पार्टी की कोशिश यह होगी कि मोदी लहर के सहारे, एमपी में शिवराज सिंह चौहान, छत्तीसगढ़ में रमन सिंह और राजस्थान में वसुंधरा राजे की भी नैया पार हो जाए।

कर्नाटक चुनाव के जरिए मोदी लहर की रफ्तार मापना चाहते थे अमित शाह
दूसरा कारण- अब नवंबर में राजस्थान, मप्र, छत्तीसगढ़ के साथ होंगे लोकसभा चुनाव? इस सवाल के पीछे एक मसला मोदी लहर का भी है। कर्नाटक चुनाव से पहले हुए गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनावों के बाद से मोदी लहर को कुंद माना जा रहा है। वजह थी गुजरात में बीजेपी का 100 से कम सीटें हासिल करना। मोदी के गढ़ में राहुल गांधी की नैतिक चुनावी जीत के मायने निकाले जा रहे थे। हालांकि, इसके बाद नॉर्थ-ईस्ट में बीजेपी ने परचम लहराया, लेकिन बीजेपी समेत राजनीतिक गलियारों में चलह-कदमी करने वाले हर शख्स को इंतजार था कर्नाटक चुनाव का। गुजरात में बाल-बाल बीजेपी क्या कांग्रेस की सत्ता वाले राज्य में उसे हराने का अब भी दम रखती है या नहीं? क्या मोदी फैक्टर कर्नाटक में चलेगा? लेकिन कर्नाटक में जिस प्रकार से बीजेपी ने कांग्रेस को पटखनी दी है, उससे बीजेपी में इस बात की चर्चा को बल मिलेगा कि राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के साथ ही लोकसभा चुनाव भी करा लिए जाएं। लोकसभा चुनाव जल्द कराने को लेकर मोदी सरकार भी दे चुकी है संकेत

लोकसभा-विधानसभा साथ कराने की मुहिम को मिलेगा बल
तीसरा कारण- देश में लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ कराए जाने का मुद्दा मोदी सरकार जोर-शोर से उठा रही है। ऐसे में कम से कम तीन राज्यों के चुनाव और 2019 लोकसभा चुनाव साथ कराए जा सकते हैं। दोनों के बीच कुछ महीनों का फर्क है, इससे एक उदाहरण पेश होगा और देश में एक साथ लोकसभा व विधानसभा चुनाव कराने की मोदी सरकार की मुहिम को बल मिलेगा।












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