Siddaramaiah MUDA: सिद्दारमैया को लेकर क्यों दुविधा में रहेगी कांग्रेस? कर्नाटक की राजनीति भी गजब है!
Karnataka Politics: कर्नाटक में कांग्रेस पार्टी आज लगभग उन्हीं परिस्थितियों का सामना कर रही है, जैसा 2011 में बीजेपी को करना पड़ा था। लेकिन, कांग्रेस पार्टी के लिए इतनी जल्दी और इतनी आसानी से सिद्दारमैया का विकल्प तलाशना आसान नहीं है। हालांकि, सिद्दारमैया के खिलाफ एफआईआर का रास्ता साफ होने और लोकायुक्त पुलिस को जांच का निर्देश मिलने के साथ ही कांग्रेस पार्टी पर उनके इस्तीफे का दबाव बढ़ गया है।
2011 में माइनिंग घोटाले में लोकायुक्त की जांच की वजह से ही तत्कालीन मुख्यमंत्री और भाजपा के दिग्गज बीएस येदियुरप्पा को इस्तीफा देना पड़ गया था। लेकिन, कांग्रेस के लिए बीजेपी की तरह से सिद्दारमैया से इस्तीफा लेना आसान नहीं है। पार्टी पर चाहे कितना भी दबाव है, लेकिन वह जानती है कि सिद्दारमैया से इस्तीफा मांगना कितनी टेढ़ी खीर है।

सिद्दारमैया के सिर पर अभी बना रहेगा कांग्रेस नेतृत्व का हाथ!
मौजूदा हालात में कांग्रेस की ओर से यही संकेत हैं कि फिलहाल पार्टी हाई कमान का हाथ सिद्दारमैया के सिर पर बना हुआ है। इसकी वजह और कुछ नहीं, बल्कि अहिंदा (अल्पसंख्यक, पिछड़े वर्ग और दलित) वोट बैंक पर उनकी मजबूत पकड़ है, जिसने 2023 में कांग्रेस को दक्षिण भारत में सत्ता दिलाने में मदद की थी।
कुछ समय बाद नेतृत्व में बदलाव संभव
मसलन, टीओआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक जाने-माने चुनाव विश्लेषक संदीप शास्त्री कहते हैं, 'इस समय कांग्रेस नेतृत्व मुख्यमंत्री बदलने में हिचकिचाएगा, क्योंकि इस तरह के किसी भी कदम का अर्थ होगा विपक्ष की जीत का संदेश।' वे आगे कहते हैं, 'हालांकि, यह सिर्फ समय की बात है। केस किस तरह से आगे बढ़ता है, यह देखना होगा, नेतृत्व में बदलाव पूरी तरह से संभव है।'
सिद्दारमैया के बाद चार दावेदार कौन?
कांग्रेस आलाकमान के सामने दूसरी बड़ी चुनौती अभी यह है कि सिद्दारमैया नहीं तो फिर कौन? उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार को चुनाव के बाद से ही सीएम पद का सबसे मजबूत दावेदार माना जाता रहा है। लेकिन, उनपर भी कथित वित्तीय धांधली को लेकर कानूनी विवाद हैं। दूसरी बात शिवकुमार का वोक्कालिगा समाज पर तो पकड़ है, लेकिन उन्हें कुर्सी देने से अन्य समुदाय की कैसी प्रतिक्रिया होगी, यह दुविधा का विषय बना हुआ है।
कांग्रेस के सामने एक और दावेदार हैं, जी परमेश्वरा जो दलित समुदाय से आते हैं। उनके लिए कई बार दबे-छिपे रूप में मुख्यमंत्री पद की दावेदारी भी सामने आती रही है। एक और नाम एबी पाटिल का भी है, जो लिंगायत समुदाय से आते हैं। लिंगायत समुदाय कर्नाटक की राजनीति में सबसे ज्यादा प्रभावी रहा है और कांग्रेस पर इसकी ओर से इस पद को लेकर दबाव भी रहा है, लेकिन पार्टी के लिए इसपर फैसला लेना अभी किसी जोखिम लेने से कम नहीं है।
चौथा नाम है सतीश जारकीहोली। वे अनुसूचित जनजाति समुदाय से आते हैं और उनके लिए भी महत्वाकांक्षाएं जाहिर होती रही हैं। लेकिन, कांग्रेस की परेशानी ये है कि ऊपर जिन चारों के भी नाम लिए गए हैं, उनमें से कोई भी ऐसा नहीं है, जिसके समर्थन का दायरा सिद्दारमैया के टक्कर का हो। इसलिए कांग्रेस के हाथ फिलहाल पूरी तरह से तंग लग रहे हैं।
क्यों दुविधा में रहेगी कांग्रेस?
कर्नाटक में कांग्रेस की राजनीति के इतिहास से कुछ ऐसे घटनाक्रम जुड़े हुए हैं, जिससे पार्टी आलाकमान का हौसला मंद पड़ जा रहा है। जैसे 1990 में लिंगायत नेता वीरेंद्र पाटिल को क्या किनारे किया गया, लिंगायतों के बीच कांग्रेस की पहले वाली पकड़ नहीं रह गई। जानकारों को लगता है कि अगर सिद्दारमैया को हटाया गया तो खासकर उनकी कुरुबा बिरादरी नाराज हो सकती है।
उत्तर कर्नाटक के राजनीतिक विश्लेषक हरीश रामाश्वामी का कहना है, 'हाई कोर्ट के फैसले को देखने के बाद ऐसा लगता है कि कांग्रेस मुश्किल में है।' 'सिद्दारमैया को पद से हटने के लिए कहना वीरेंद्र पाटिल से हाथ गंवाने की भयावह यादें ताजा करा सकता है, लेकिन, देखने वाली बात है कि कांग्रेस इस वास्तविकता को कैसे पचा पाती है।'












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