Karnataka Assembly Election 2023: किन मुद्दों पर मतदान होंगे, वोटर को प्रभावित करने वाले 6 फैक्टर को समझिए
Karnataka Assembly Election 2023 कई मायनों में खास है। इस राज्य में कई अहम लोक सभा सीटें भी हैं। विधानसभा चुनाव के लिए 10 मई को वोट डाले जाएंगे। इससे पहले मतदाताओं के मन और चुनाव में प्रभावी फैक्टर को समझने का एक प्रयास।

Karnataka Assembly Election 2023 इसलिए भी अहम है क्योंकि आज से करीब 14 महीने बाद लोक सभा चुनाव 2024 के लिए भी मतदान होंगे। 10 मई को मतदान से पहले समझना काफी दिलचस्प है कि इस दक्षिण भारतीय राज्य के मतदाता किन मुद्दों या फैक्टर्स पर ध्यान देते हुए वोट करेंगे। कांग्रेस, बीजेपी या जेडीएस के नेताओं के पक्ष में मुहर लगाने से पहले वोटर किन 6 प्रमुख फैक्टर्स को तरजीह देगा? समझिए
भाजपा 43 साल पुराना जिंक्स तोड़ने की कोशिश में
कर्नाटक चुनाव 2023 में 6 प्रमुख फैक्टर हैं जिनसे मतदाताओं की पसंद प्रभावित हो सकती है। वोटिंग से पहले जनमत सर्वेक्षण, एबीपी-सीवोटर सर्वे के अनुसार, कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिलने के आसार हैं। दूसरी ओर भाजपा को उम्मीद है कि 'लगातार दूसरी बार सरकार नहीं' वाला 43 साल पुराना जिंक्स तोड़ने में कामयाब रहेगी।
BJP-Congress और JDS के प्रयास
दरअसल, कर्नाटक में 1980 के बाद से एक भी सरकार ऐसा नहीं बनी है, जो सत्ता में वापसी करने में सफल रही हो। जनता दल सेकुलर (JDS) को भी वापसी की उम्मीद है। करीब 19 महीने यानी 429 दिनों के कार्यकाल के बाद 2019 में अल्पमत में आने के कारण कुमारस्वामी की सरकार गिर गई थी। जानिए कौन से ऐसे 6 फैक्टर हैं जिनसे प्रभावित होकर जनता कांग्रेस-बीजेपी या जेडीएस के उम्मीदवारों को वोट कर सकती है।
पहला फैक्टर-- कर्नाटक की वर्तमान राजनीति की तिकड़ी
भारत में राजनेताओं को आम जनता जिस तरह से रिसीव करती है, बिना शक फिलहाल अधिकांश क्षेत्रों के चुनाव में नेता का ब्रांड यानी उसकी इमेज सबसे महत्वपूर्ण कारक होती है। खुद लोक सभा चुनाव में बीजेपी ब्रांड मोदी के सहारे चुनावी समर में उतरती है। ऐसे में बात कर्नाटक के दुर्ग की करें तो यहां कांग्रेस के वेटरन और पूर्व CM सिद्धारमैया, पूर्व सीएम और 80 साल के भाजपाई बीएस येदियुरप्पा और जेडीएस नेता सह पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा की तिकड़ी है अहम भूमिका में होगी। देवेगौड़ा का नाम इसलिए प्रासंगिक है क्योंकि भले ही उनके बेटे एचडी कुमारस्वामी पूर्व CM रह चुके हैं, लेकिन वोटर के बीच देवेगौड़ा की साख बरकरार है। तीनों कर्नाटक की राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहे हैं। इन्हें राज्य में गठबंधन निर्माता के रूप में भी जाना जाता है।
- सिद्धारमैया एबीपी-सीवोटर सर्वेक्षण में अगले मुख्यमंत्री के रूप में एक स्पष्ट विकल्प के रूप में उभरे
- भले ही येदियुरप्पा 80 साल के हो चुके हैं, लेकिन कर्नाटक में भाजपा के पास इनसे दमदार चेहरा कोई नहीं।
- येदियुरप्पा के साथ छोड़ते ही 110 सीटें जीतने वाली BJP केवल 40 सीटों पर सिमट गई थी।
- अगर JDS सत्ता में लौटना चाहती है तो पूर्व PM और उनके बेटे कुमारस्वामी की जोड़ी की भूमिका अहम होगी।
दूसरा फैक्टर-- PM मोदी और CM बोम्मई की इमेज
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि भी कर्नाटक के वोटर का रूख तय करने में अहम साबित होगी। मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई जहां मतदाताओं की उम्मीदों पर खरा उतरने में विफल रहे हैं। एबीपी-सीवोटर सर्वे के मुताबिक, पीएम मोदी की छवि काफी हद तक बरकरार है। हालांकि सर्वेक्षण में शामिल 24 हजार से अधिक लोगों ने चौंकाते हुए ये भी माना है कि CM फेस के रूप में बोम्मई को अपने पद पर बने रहना चाहिए। पीएम मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार के कामकाज से भी वोटर काफी हद तक संतुष्ट माने जा रहे हैं।
तीसरा फैक्टर- करप्शन और कुशासन
भ्रष्टाचार और कुशासन ऐसे फैक्टर्स हैं जिनसे भाजपा और कांग्रेस दोनों के उम्मीदवारों को तगड़े झटके लग सकते हैं। कथित कुशासन के दायरे में कोविड-19 प्रबंधन, शहरी विकास और भ्रष्टाचार के क्षेत्रों में शासन के विभिन्न मुद्दों से वर्तमान भाजपा सरकार त्रस्त दिख रही है। वोटिंग के चंद हफ्चे पहले बीजेपी एमएलए वीरुपक्षप्पा की गिरफ्तारी भी सत्तारूढ़ पार्टी की किरकिरी करा रही है। एबीपी-सीवोटर सर्वेक्षण से पता चलता है कि सत्ता विरोधी लहर पैदा हो गई है। कांग्रेस कई सरकार विरोधी अभियान चलाने और मौके को भुनाने के बारे में सोच सकती है। विरोधी पार्टी ने "PayCM" और "40% सरकार" अभियानों के साथ काफी हद तक वोटर को प्रभावित किया है। इन अभियानों के किसी भी संभावित प्रभाव से सत्ताधारी पार्टी निश्चित रूप से चिंतित होगी ABP-CVoter सर्वेक्षण में 33.3% लोगों में एंटी-इनकंबेंसी की भावना देखी जा सकती है। पूरे कर्नाटक में 24,759 पात्र मतदाताओं ने इस सर्वे में भाग लिया था।
चौथा फैक्टर- राजनीतिक दलों की आंतरिक लड़ाई
राजनीतिक रणनीति का सबसे अहम पहलू है गुटबाजी को रोकना। अलग-अलग गुटों के कारण झगड़े की कथित खबरें भी कांग्रेस और भाजपा दोनों के सपनों को प्रभावित कर सकती हैं। लड़ाई के कारण दोनों दलों की संभावनाएं प्रभावित हो सकती हैं। बीएस येदियुरप्पा को पार्टी सहयोगियों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ रहा है। वहीं कांग्रेस के सिद्धारमैया और कर्नाटक कांग्रेस प्रमुख डीके शिवकुमार की कथित लड़ाई की खबरें भी किसी से छिपी नहीं है। येदियुरप्पा के खिलाफ कुछ भाजपा नेताओं का गुस्सा इतना मुखर हुआ कि उन्हें 2021 में सीएम पद से इस्तीफा देना पड़ा। टकराव अभी भी कम नहीं हुआ है। हाल ही में, जब भाजपा नेता ने कहा कि उनके बेटे विजयेंद्र शिकारीपुरा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ेंगे, तो पार्टी के राष्ट्रीय सचिव सीटी रवि ने पलटवार करते हुए कहा कि उम्मीदवार पार्टी के संसदीय बोर्ड की बैठकों में तय किए जाते हैं और "किसी की रसोई में नहीं।"
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कांग्रेस में डीके शिवकुमार और येदियुरप्पा को सीएम चेहरे के प्रबल दावेदार के रूप में देखा जा रहा था। हालांकि, एबीपी-सीवोटर सर्वेक्षण में सिद्धारमैया सीएम पद के लिए सबसे पसंदीदा नेता के रूप में उभरे हैं। भाजपा उम्मीदवारों को पीछे छोड़ने वाले सिद्धारमैया ने मुख्यमंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान लिंगायत को अलग धर्म के रूप में मान्यता दिए जाने पर जोर दिया था। डीके शिवकुमार वोक्कालिगा को समर्थन की मांग करते हैं। भले ही कांग्रेस ने पार्टी में किसी भी तरह की आंतरिक दरार के दावे से इनकार किया है, लेकिन पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने मल्लिकार्जुन खड़गे को सिद्धारमैया और शिवकुमार के बीच मतभेदों को दूर करने में कड़ी मशक्कत करनी पड़ी है। खास बात ये भी है कि कर्नाटक से निर्वाचित सांसद खड़गे कांग्रेस अध्यक्ष पद संभालने वाले पहले गैर गांधी नेता हैं।
पांचवां फैक्टर-- धार्मिक ध्रुवीकरण
ABP-CVoter सर्वेक्षण में पाया गया कि मतदाताओं के एजेंडे पर सबसे प्रभावशाली विषय धार्मिक ध्रुवीकरण था। ऐसा अनुमान है कि इस बात को समझने के बाद ही बीजेपी ने 80 साल के बीएस येदियुरप्पा के सहारे चुनावी कैंपेन किया है। पूर्व सीएम येदियुरप्पा को लिंगायत समुदाय का समर्थन प्राप्त है। पार्टी नेताओं के कड़े विरोध के बावजूद येदियुरप्पा से बेहतर ऑप्शन ढूंढने में भाजपा को कड़ी मेहनत करनी पड़ रही है। बोम्मई के मुख्यमंत्री होने के बावजूद वोटबैंक पॉलिटिक्स के लिहाज से येदियुरप्पा ही एक तरह से भाजपा का मुख्य चेहरा हैं। बोम्मई सरकार ने राज्य में पिछड़े वर्गों की 2बी श्रेणी के तहत मुसलमानों के लिए 2% आरक्षण को समाप्त कर 2सी और 2डी श्रेणियों के तहत वोक्कालिगा और लिंगायत को कोटा फिर से आवंटित किया। इस कदम को बड़ी "हिंदुत्व" विचारधारा के लिए समर्थन हासिल करने के मास्टर स्ट्रोक के रूप में भी देखा जा रहा है।
छठा फैक्टर-- गठबंधन और 'किंगमेकर' JDS की भूमिका
ABP-CVoter सर्वेक्षण में भले ही कांग्रेस की स्पष्ट जीत का अनुमान सामने आया है, लेकिन मतगणना के दिन किसी भी तरह के नंबर गेम के लिए दोनों दल तैयार हैं। भाजपा जनमत सर्वेक्षण में दूसरे स्थान पर रही है। सर्वेक्षण के अनुसार, कांग्रेस को 115-127 सीटें मिलने की संभावना है। ऐसी स्थिति में इनको समर्थन की जरूरत नहीं पड़ेगी। हालांकि, भाजपा को 68-80 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि जेडीएस के खाते में 23-35 सीटें आ सकती हैं, ऐसे में 224 सीटों वाली कर्नाटक विधानसभा में कुमारस्वामी की जेडीएस 'किंगमेकर' बन सकती है। मैजिक नंबर यानी बहुमत का आंकड़ा 113 है।
यह भी रोचक इलेक्शन का आंकड़ा है कि पार्टी बनने के बाद से JDS कभी भी अपने दम पर सरकार नहीं बना सकी है। हालाँकि, 2006 में भाजपा के साथ और 2018 में कांग्रेस के साथ गठबंधन सरकार बना चुकी जेडीएस सत्ता का स्वाद जरूर चख चुकी है। ओपिनियन पोल के अलावा राजनीतिक हवा की परख का दावा करने वाले सियासी पंडितों का ये भी मानना है कि अगर वोट विभाजित नहीं होते हैं और पारंपरिक वोट बैंक नहीं खिसकने की स्थिति में छोटे दलों का प्रभाव बहुत कम होगा। भले ही कांग्रेस 2023 के विधानसभा चुनावों में जेडीएस के साथ गठबंधन से इनकार कर चुकी है, लेकिन सियासत की नाव मझधार में फंसने पर कुमारस्वामी की पार्टी की भूमिका बहुत अहम होगी।












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