कैराना में हिट हुआ विपक्ष का नारा, गन्ना के आगे नहीं चला जिन्ना

नई दिल्ली। पश्चिम उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट से उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती भी चुनाव लड़ चुकी हैं और पूर्व प्रधानमंत्री चरण सिंह की पत्नी गायत्री देवी भी सांसद रह चुकी हैं लेकिन ये उपचुनाव शायद 1980 के बाद सबसे ज्यादा चर्चा में है, 1980 में गायत्री देवी और बड़े गुर्जर नेता बाबू नारायण सिंह चुनाव लड़े थे और सीट पर पूरे प्रदेश की नजर थी। 14 सीटों पर देश में चुनाव हो रहा था लेकिन सबकी निगाह कैराना पर थी। इस चुनाव में सबसे खास बात ये रही कि राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) जहां गन्ना, बिजली के बिल और दूसरे मुद्दों पर चुनाव लड़ता रहा, वहीं भाजपा पीएम मोदी, सीएम योगी के चेहरे, हुकुम सिंह की मौत की सहानुभूति और 2013 दंगों की याद दिलाकर चुनाव लड़ती रही। इसे गन्ना (मुद्दों) और जिन्ना (सांप्रदायिकता) के बीच चुनाव कहा गया और जिन्ना पर गन्ना भारी पड़ गया।

जयंत ने बनाया गन्ने को मुद्दा

जयंत ने बनाया गन्ने को मुद्दा

उपचुनाव के ऐलान के बाद कैराना सीट विपक्ष की ओर से रालोद के खाते में आने के बाद पार्टी के उपाध्यक्ष जयंत चौधरी ने प्रचार की कमान संभाली। जयंत ने पहले दिन से ही क्षेत्र के किसानों के भुगतान और बिजली के बिलों को मुद्दा बनाया। हाल ही में भाजपा सरकार ने प्रदेश में बिजली के बिलों को बढ़ाया है, जिसको जयंत ने लगातार उठाया। सीएम योगी ने शामली में सभा में दंगों की जिक्र किया और ये भी कहा कि वो जिन्ना की तस्वीर नहीं लगने देंगे लेकिन उन पर जयंत भारी पड़े। जयंत लगातार ये कहत रहे कि कोई कितना भी बांटे, आपको गन्ने पर टिके रहना है और परिणाम कहते हैं कि ना सिर्फ जाट रालोद की तरफ लौटे हैं बल्कि मुसलमान, दलित और पिछड़ी जातियों का भी वोट भाजपा से टूटा है और गठबंधन के पास आया है।

गन्ना भुगतान बना बड़ा मुद्दा

गन्ना भुगतान बना बड़ा मुद्दा

जयंत ने कैराना में लगातार कहा कि पूरे उत्तर प्रदेश की ही बात छोड़ दें तो कैराना लोकसभा में ही किसानों का 1000 करोड़ रुपया बकाया है, जिस पर भाजपा जवाब दे। भाजपा ने 14 दिन में भुगतान का वादा किया था, जिस पर जयंत सवाल करते रहे। भाजपा लगातार जो भुगतान हुआ उसका आंकड़ा देती रही लेकिन जयंत बकाया का मामला उठाते रहे जो भाजपा पर भारी पड़ा।

चकाचौंध पर भारी पड़े स्थानीय मुद्दे

चकाचौंध पर भारी पड़े स्थानीय मुद्दे

कैराना में उपचुनाव था लेकिन अगर आप पूरा चुनाव प्रचार भाजपा का देखें तो कोई मुद्दा उनके पास जैसे था ही नहीं, सभी जाट नेता जाट मतदाताओं से 2013 के दंगे के नाम पर वोट मांगते रहे, तो जयंत लगातार पुरानी बातों को भूल आगे बढ़ने की बात करते रहे। 2014 और 2017 में भी भाजपा के लिए दंगा अहम मुद्दा इस क्षेत्र में रहा था लेकिन इस बार शायद वो बहुत कामयाब ना हो सका। एक तरफ सीएम योगी ने बड़ी रैलियां की तो विपक्ष ने कोई बड़ी रैली नहीं की, जयंत बिना किसी सुरक्षा और काफिले के चार-चार, पांच-पांच कार्यकर्ताओं को साथ लेकर लगातार गांव-गांव जाकर लोगों से मिलते रहे।

भाजपा के नेता मोदी के देश-विदेश में लोकप्रिय होने की बात कहते रहे तो जयंत ने ट्रैक्टर को कमर्शियस व्हीकल की श्रेणी में रखने पर सवाल किए, बिजली के बिल बढ़ने पर सवाल किए, इस सरकार के आने के बाद पशुओं की खरीद फरोख्त कम होने के चलते आवारा पशुओं के फसल को नुकसान पहुंचाने पर सवाल किए। ये सब मुद्दे भले दूर से छोटे लगें लेकिन क्षेत्र के लोगों के लिए बहुत बड़े हैं और उन्होंने इस सब पर वोट किया।

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