जेएनयू प्रकरण के चलते दो टुकड़ों में बंटा राष्ट्र
आप सभी को एक नया जेएनयू रचने के लिए बधाई देता हूं। बीते कई दिनों से माध्यमों के जरिए पता चलता रहा है कि जेएनयू में कथित छात्र गणतंत्र दिवस मनाने के बाद से बौराये हुए थे। देश विरोधी नारों ने जेएनयू को मीडिया के सामने एक मुद्दे के तौर पर पेश किया। जिसमें प्रथम दृष्ट्या कन्हैया कुमार का नाम सामने आया। इसके बाद मीडिया के जरिए देश विरोधी नारों की एक पूरी शृंखला लोगों के बीच रखी गई। एक दूसरे पर आरोप चिपकाए गए।
दो टुकड़ों में बंटा राष्ट्र
विचारधाराओं के बीच आरोपों की तलवारें खिंच गईं। मामला केंद्र सरकार तक जा पहुंचा। जिस पर गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि देशद्रोहियों को कतई नहीं बख्शा जाएगा। लेकिन देश द्रोह पर आजादी भारी पड़ गई। फिलवक्त उन्हीं के आधार पर जनता से बार-बार पूछा जा रहा है कि ये बताईये सामंतवाद से, पूंजीवाद से,मनुवाद से आजादी क्या आपको नहीं चाहिए। लीजिए बदल गया पूरा मामला। लेकिन उस आजादी का क्या जिसके कारण दो अलग अलग विचारधाराएं चमकने लगी थीं।
नए-नए मोड़ आ रहे हैं जेएनयू प्रकरण में
कल तक आरोपी का जो तमगा कन्हैया कुमार तक सीमित था, उसने अपना एक और हिस्सेदार तलाश लिया है। जी हां उमर खालिद, जिस पर अफजल गुरू की बरसी पर कार्यक्रम कराने और देश विरोधी नारे लगाने का आरोप है। पर, कन्हैया कुमार की जिस चिट्ठी को दिल्ली पुलिस आयुक्त बीएस बस्सी ने शेयर किया है, उसमें खुद कन्हैया भारत विरोधी नारों की निंदा कर रहा है। लेकिन अचानक हृदय परिवर्तन कैसे।
कन्हैया कुमार उमर खालिद का बेहद करीबी माना जाता है। लगभग हर आयोजन में कन्हैया उसके साथ मौजूद रहा। ये बहस हमारी नहीं बल्कि उन लोगों की है जो चाय की गुमटियों में चाय पीते पीते जेएनयू पर अपनी राय बता रहे हैंं, पान की दुकानों पर असली वजह जानने के लिए एक दूसरे को खबर का हर पहलू बताने समझाने की कोशिश कर रहे हैं।
दूसरी ओर तमाम जख्मों को लिए जेएनयू की वो लाल ईमारत हर रोज अपने साथ अन्याय की गुहार लगा रही है। दरअसल उसका ये कहना है कि जिस धरा पर उसकी नींव रखी गई उसकी मुखालिफत या कहिए टुकड़े टुकड़े करने की धमकी में कन्हैया भी तो शामिल था। कन्हैया कुमार को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार तो कर लिया गया। पर समर्थन में वामदल के कई नेता, कांग्रेस का छात्र संगठन यानि की एनएसयूआई के छात्र उतर आए हैं।
दो टुकड़ों में बंटा राष्ट्
पापुलर हुए कई स्लोगन
जेएनयू राष्ट्र भक्ति और आजादी के नाम पर अलग अलग कोने में बैठकर नए नए स्लोगन तैयार करने मेें लगा है। वैसे काफी पॉपुलर हो गए हैं। कश्मीर की आजादी तक...जंग रहेगी, भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी.... हालांकि आपकी जंग ने रंग दिखाना शुरू कर दिया है। बीते शुक्रवार को घाटी में लोगों और पुलिस के बीच जमकर संघर्ष हुआ। इस दौरान आईएस के झंडे लहराए गए और आताताईयों ने शुक्रिया कहकर जेएनयू में भारत विरोधी नारे लगाने वालों का समर्थन किया।
चिंता मत कीजिए कलम इस खबर को किसी और स्याही की मदद से कुछ और रंग दे देगी। अजी माहिर हैं। नहीं...नहीं बिलकुल फिक्र वाली कोई बात नहीं। अजी देखा नहीं आपने अभी पटियाला हाउस कोर्ट में कन्हैया कुमार की पेशी जो कि पूर्णतया देश विरोधी नारों पर केंद्रित थी, उसे कैसे रंग बदलकर मीडिया के साथ बद्सलूकी बता दिया। अरे माना कीजिए बड़े लोग हैं, संपादक...वरिष्ठ पत्रकार और वगैरह वगैरह।
जबरदस्त फैन फॉलोइंग
जबरदस्त फैन फॉलोइंग होने से कुछ भी बोलेंगे पब्लिक मान लेगी। अरे आपने देखा नहीं स्क्रीन ब्लैक कर इतिहास बनाया जा रहा है। कॉन्सेप्टबाज लोग हैं भाई। हां एक साहब तो ये भी कह रहे हैं कि हां मैं हिंदू हूं और राष्ट्र विरोधी भी हूं। फिर आपके लिए डरने वाली कोई बात ही नहीं।
बहरहाल उन्होंने अनुच्छेद 19 के अनुसार अभिव्यक्ति की आजादी पर अपनी आस्था जताई है। सीधे तौर पर आप समझ सकते हैं कि मीडिया पक्ष पर टिकने लगी है। निष्पक्षता राजनीति पर डिपेंड है भई। चलिए रहने भी दीजिए। रही बात अभिव्यक्ति की आजादी की तो आप भी तो साहब खूब फायदा उठा रहे हैंं। बाद में सीना ठोंककर कहते हैं ''पत्रकार हैं, वो फलां फलां से''।
बंट गया समाज
वैसे ये पूरा मुद्दा तो लगभग आपके ही पक्ष में ही रहा। जिसमें कोई दो राय नहीं। हां एक बात जानना चाहता हूं, अब पाकिस्तान के किस मुद्दे की हिमायत करने की खातिर आप नया जेएनयू रचने वाले हैं। वैसे भारत के टुकड़े तो हो गए...बंट गया दो हिस्सों में समाज। अब बांटकर क्या नया करने की मंशा पाल रहे हैं।
दरअसल आपसे अनुरोध है कि इन सभी मुद्दों की सूचना थोड़ा पहले दे दिया करिए जिससे शांति पसंद करने वाला समाज, एकता और अखंडता की चाह रखने वाले लोग अपनी आंखों को इस पूरे प्रकृम से पहले ही कुछ वक्त तक बंद कर सकें। क्योंकि भारत को शिद्दत के साथ संजोए रखने की खातिर जो प्रहरी दिन रात सीमाओं पर तैनात हैं वे इस घटना के बाद खुद को उद्देश्यविहीन समझ रहे हैं।












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