झारखंड में BJP के हाथ से क्यों छिनी सत्ता, पढ़िए 5 बड़े कारण
नई दिल्ली। झारखंड के चुनावी रण में सत्ताधारी बीजेपी की शिकस्त साफ नजर आ रही है। भले ही अभी फाइनल नतीजे सामने नहीं आए हैं लेकिन जिस तरह के आंकड़े दिख रहे हैं उसमें कहीं न कहीं बीजेपी का झारखंड की सत्ता से बाहर होना तय माना जा रहा है। अब तक आए रूझानों पर गौर करें तो प्रदेश में झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के नेतृत्व में बने कांग्रेस-आरजेडी महागठबंधन को बहुमत के आसार हैं। महागठबंधन ने इस भगवा किले पर फतह के साथ ही सत्ता पर काबिज होने की तैयारी शुरू कर दी है। दूसरी ओर बात करें बीजेपी की तो पार्टी को इस चुनाव में मिली हार के पीछे कई फैक्टर माने जा रहे हैं। एक तो इस चुनाव में पार्टी अकेले चुनाव मैदान में उतरी जिसका सीधा असर नतीजों में दिखा है। इसके अलावा भी कई मुद्दे हैं जिन्होंने चुनाव में गहरा प्रभाव दिखाया।
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गठबंधन को लेकर सहयोगियों से बात नहीं बनना
झारखंड चुनाव में बीजेपी की हार के पीछे जो मुख्य वजह से नजर आ रही वो है पार्टी का अकेले चुनाव मैदान में उतरना। पिछले चुनाव की बात करें तो उस समय पार्टी ने आजसू के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ा था, जिसका फायदा भी पार्टी को मिला और उनकी सरकार भी प्रदेश में बनीं। उस समय बीजेपी को 37 और आजसू को 5 सीटें मिली थीं। इस बार बीजेपी के विधानसभा चुनाव में बीजेपी और आजसू के बीच गठबंधन पर बात नहीं बनी और दोनों पार्टियां अकेले चुनाव मैदान में उतरी। वहीं एनडीए में सहयोगी जेडीयू और एलजेपी ने भी अपने उम्मीदवार उतारे, जिसका असर नतीजों में साफ तौर से देखने को मिला। इस बार बीजेपी और आजसू दोनों की सीटें घटी हैं।

बीजेपी के खिलाफ कांग्रेस समेत विपक्षी दलों की किलेबंदी
झारखंड चुनाव में बीजेपी को घेरने के लिए कांग्रेस समेत प्रमुख विपक्षी पार्टी जेएमएम और आरजेडी एकजुट नजर आए। यही वजह है कि तीनों पार्टियों के दिग्गज नेताओं ने महागठबंधन बनाया और एक साथ चुनाव मैदान में उतरे। उनकी एकजुटता का ही असर रहा कि महागठबंधन ने प्रदेश में बड़ी जीत दर्ज की। जेएमएम को 29 सीटें आईं, कांग्रेस ने 13 सीटें अपने नाम की और आरजेडी भी तीन सीटों पर कब्जा जमाने में सफल रही। दूसरी ओर बीजेपी की बात करें तो उन्हें 24 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। आजसू को तीन सीटें जाती दिख रही हैं।

स्थानीय की जगह राष्ट्रीय मुद्दे उठाने से नुकसान
झारखंड चुनाव में जिस तरह के नतीजे सामने आए हैं उसमें कहीं न कहीं स्थानीय बनाम राष्ट्रीय मुद्दों का असर देखने को मिला। भाजपा ने जहां इस चुनाव में राम मंदिर, कश्मीर से धारा 370 खत्म करने समेत कई अहम राष्ट्रीय मुद्दों को चुनाव में उठाया। दूसरी ओर महागठबंधन ने स्थानीय मुद्दों पर फोकस किया, आदिवासियों के लिए जल-जंगल और जमीन का मुद्दा उठाया। यही नहीं महागठबंधन ने जेएमएम नेता हेमंत सोरेन को सीएम पद का उम्मीदवार बनाया, वहीं बीजेपी ने गैर-आदिवासी समुदाय से आने वाले रघुबर दास को फिर से सीएम पद के लिए घोषित किया। हालांकि, सीएम रहते हुए रघुबर दास के कार्यों पर भी जनता ने भरोसा नहीं जताया, जिसका असर नतीजों में दिखा।

अपनों की नाराजगी भी पड़ी भारी
झारखंड चुनाव में बीजेपी की हार में पार्टी के बड़े नेताओं की नाराजगी अहम फैक्टर माना जा रहा है। खास तौर से रघुबर दास सरकार में मंत्री रहे सरयू राय ने जिस तरह चुनाव से ठीक पहले बगावती तेवर अख्तियार किया, इसका नुकसान पार्टी को हुआ। सरयू राय ने जमशेदपुर पूर्वी सीट पर रघुबर दास के खिलाफ उम्मीदवारी भी की। सरयू राय ही नहीं पार्टी के दिग्गज नेता अर्जुन मुंडा के साथ भी रघुबर दास की खींचतान ने नतीजों में असर दिखाया है। इस चुनाव में बीजेपी को बड़े पैमाने पर अपने ही नेताओं के असहयोग और भीतरघात का भी सामना करना पड़ा।

सत्ता विरोधी लहर का असर
झारखंड चुनाव में कहीं न कहीं सत्ताविरोधी लहर का असर नतीजों में देखने को मिला। रघुबर दास सरकार के खिलाफ नाराजगी का फायदा जेएमएम समेत विपक्षी दलों को मिला। महागठबंधन ने भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, विस्थापन, शिक्षा, स्वास्थ्य और आदिवासी कल्याण जैसे मुद्दों पर प्रदेश सरकार को घेरा। इन मुद्दों को भुनाकर जेएमएम महागठबंधन ने लाभ उठाया। कांग्रेस ने जो गलती महाराष्ट्र में की वही झारखंड में भी दोहरा दी। राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी की कामयाबी को प्रदेश बीजेपी इकाई नहीं भुना सकी। केंद्रीय स्तर पर मोदी इमेज का लाभ झारखंड में बीजेपी नहीं उठा पाई। राज्य के बीजेपी नेता प्रदेश में चुनाव प्रचार के लिए केंद्रीय नेतृत्व पर निर्भर दिखा। इसका लाभ महागठबंधन ने उठाया।
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