झारखंड चुनाव: मुख्यमंत्री रघुवर दास पर कितना असर डालेगी सरयू राय की बग़ावत

तारीख़ थी- 3 फरवरी, साल - 2019. जमशेदपुर में झारखंड के पहले महिला विश्वविद्यालय का शिलान्यास होना था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उस दिन जम्मू में थे. उन्होंने वहीं से इसका ऑनलाइन शिलान्यास किया.
इस मौक़े पर जमशेदपुर वीमेंस कॉलेज परिसर में सैकड़ों लोगों की भीड़ जमा थी. मुख्यमंत्री रघुवर दास उस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे. वह इलाक़ा जमशेदपुर पश्चिमी विधानसभा सीट की परिधि में आता है.
लिहाजा स्थानीय विधायक और राज्य सरकार के वरिष्ठ मंत्री सरयू राय को भी इसका आमंत्रण भेजा गया, लेकिन वे कार्यक्रम में नहीं पहुंचे. उन्होंने इसका बहिष्कार किया, क्योंकि उसके लिए छपे आमंत्रण पत्र पर सिर्फ़ मुख्यमंत्री रघुवर दास का नाम था.
प्रोटोकॉल के मुताबिक़ सरकारी कार्यक्रमों के लिए छपवाए जाने वाले कार्ड पर क्षेत्रीय विधायक का भी नाम छापा जाना चाहिए था.
तब नाराज सरयू राय ने मुख्य सचिव और उच्च शिक्षा सचिव को शो-कॉज़ कर कार्ड पर अपना नाम नहीं होने का कारण पूछा. मुख्य सचिव ने उन्हें क्या जवाब दिया, यह बात सार्वजनिक नहीं की गई.
उन्हीं दिनों हुई कैबिनेट मीटिंग में सरयू राय ने सरकार के कुछ प्रस्तावों पर आपत्ति जताई. मीटिंग से निकल कर बाहर चले आए. उसके बाद मंत्रिमंडल में रहने के बावजूद वे कैबिनेट की किसी मींटिंग में नहीं गए. नतीजतन, उनके और ऱघुवर दास के रिश्ते और तल्ख़ होते चले गए.
ये तल्खी सोमवार को एक नए मुकाम पर पहुंच गई जब मुख्यमंत्री रघुवर दास के ख़िलाफ़ सरयू राय ने जमशेदपुर पूर्व सीट से नामांकन दाखिल कर दिया.

सरयू राय ने अब जमशेदपुर पूर्वी सीट से चुनाव लड़ने की घोषणा की है. मतलब, वे बीजेपी के मौजूदा विधायक और मुख्यमंत्री रघुवर दास के ख़िलाफ़ चुनाव मैदान में ताल ठोकने जा रहे हैं.
सरयू राय ने बीबीसी से कहा, "मैंने रघुवर दास के मंत्रिमंडल और विधानसभा की अपनी सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया है. मैंने राज्यपाल को इस संबंधित पत्र भेज दिया है. मैं जमशेदपुर पूर्वी और जमशेदपुर पश्चिमी दोनों विधानसभा सीटों से चुनाव लड़ने जा रहा हूं."
उन्होंने कहा, "मेरी लड़ाई भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ है. इसमें किसकी जीत या हार होगी, इसकी परवाह करता तो यह क़दम उठा ही नहीं पाता. लिहाज़ा, अब लड़ाई है और भ्रष्टाचार के तमाम मुद्दे मेरे प्रचार का हिस्सा होंगे. ऐसा करने की ताक़त मेरे वोटरों ने ही मुझे दी है."

भाजपा में असमंजस
सरयू राय की बग़ावत से भाजपा कार्यकर्ताओं में असमंजस की स्थिति है. जमशेदपुर निवासी भाजपा के पूर्व प्रदेश प्रवक्ता अमरप्रीत सिंह काले ने कहा कि उन्हें अब भी सुलह की उम्मीदें हैं.
अमरप्रीत सिंह काले ने बीबीसी से कहा, "सरयू राय न केवल भाजपा के हैवीवेट नेता रहे हैं बल्कि पार्टी के प्रति उनकी निष्ठा और समर्पण भी तारीफ़ के क़ाबिल रही है. वे पार्टी के सिद्धांतों पर चलते रहे हैं. मुझे उम्मीद है कि पार्टी की केंद्रीय समिति इसका समाधान निकाल लेगी, क्योंकि कार्यकर्ता अभी असमंजस में हैं. केंद्रीय नेतृत्व इस डेवलपमेंट पर नज़र बनाए हुए है. उम्मीद है कि हमलोग फिर से पूर्ण बहुमत की सरकार बनाएंगे ताकि नरेंद्र मोदी जी के सपनों का झारखंड बनाया जा सके."

वहीं, भाजपा के मौजूदा प्रदेश प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव ने सरयू राय और रघुवर दास की चुनावी लड़ाई से संबंधित सवाल पर सीधे तौर पर कुछ भी नहीं कहा.
उन्होंने बीबीसी से कहा, "हम एक स्थिर और विकास करने वाली सरकार देने के लिए प्रतिबद्ध हैं. इस बार पार्टी 65 पार के लक्ष्य पर पहुंचेगी. हमलोग विचारधारा की पार्टी हैं और व्यक्ति विशेष पर टिप्पणी करना हमारे संस्कार में नहीं है."
इस बीच जमशेदपुर में बीजेपी के कई पदधारकों ने सरयू राय के समर्थन में इस्तीफ़ा दे दिया है.

विपक्ष भी पसोपेश में
पूर्व मुख्यमंत्री और झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) के नेता हेमंत सोरेन ने सरयू राय के इस क़दम का स्वागत किया है. उन्होंने रांची में कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में वे सरयू राय के साथ खड़े हैं.
उनके इस बयान के कुछ ही घंटे बाद कांग्रेस पार्टी ने जमशेदपुर पूर्व सीट से अपने चर्चित प्रवक्ता गौरव वल्लभ को पार्टी का प्रत्याशी बनाए जाने की घोषणा कर दी.
कांग्रेस की यह लिस्ट शनिवार की देर रात जारी की गई. झारखंड कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष राजेश ठाकुर ने बीबीसी से कहा कि उनकी पार्टी वहां मज़बूती से चुनाव लड़ेगी.
उहोंने कहा, "गौरव वल्लभ ही महागठबंधन के साझा प्रत्याशी हैं. हमें जेएमएम का भी समर्थन हासिल है क्योंकि सीटों के बंटवारे में जमशेदपुर पूर्वी सीट हमें मिली है. ऐसे में सरयू राय का समर्थन करना हमारा विषय नहीं है."
नामांकन के आख़िरी दिन बीजेपी से मुख्यमंत्री रघुवर दास, कांग्रेस से गौरव वल्लभ, झारखंड विकास मोर्चा से अभय सिंह और निर्दलीय उम्मीदवार के बतौर सरयू राय ने नामांकन किया.

रघुवर दास कितने मज़बूत
रघुवर दास ने साल 1995 में जमशेदपुर पूर्वी सीट से पहली बार चुनाव लड़ा था. तब वे पार्टी के ज़िला मंत्री हुआ करते थे. भाजपा ने तब अपने सिटिंग विधायक दीनानाथ पांडेय का टिकट काटकर उन्हें चुनाव लड़ाया.
इससे ख़फ़ा दीनानाथ पांडेय निर्दलीय चुनाव लड़ गए. उन्हें शिवसेना का समर्थन मिला. तब रघुवर दास 2000 से भी कम वोटों के अंतर से चुनाव जीत सके थे.
वह उनकी ज़िंदगी का पहला और सबसे कठिन चुनाव था. उसके बाद से वे लगातार इस सीट से अपना चुनाव जीतते रहे हैं. यहां से जीतते हुए वे साल 2009 में झारखंड के उपमुख्यमंत्री बने और साल 2014 में मुख्यमंत्री.
पिछला विधानसभा चुनाव उन्होंने 70,000 से भी अधिक मतों के अंतर से जीता था. तब कांग्रेस के आनंद बिहारी दुबे दूसरे नंबर पर रहे थे.
तब यहां बीजेपी को 61.5 फ़ीसदी वोट मिले थे. तब कांग्रेस को 19.8 फ़ीसदी, झारखंड विकास मोर्चा को 12.4 फ़ीसदी और झारखंड मुक्ति मोर्चा को सिर्फ 2.4 फ़ीसदी वोट हासिल हुए. बीजेपी प्रत्याशी के बतौर रघुवर दास को 1,03,427 वोट मिले थे.

अब क्या होगा
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक मधुकर के मुताबिक़ रघुवर दास अब अपने राजनीतिक जीवन के सबसे कड़े मुकाबले में फंस गए हैं. अगर वे इस चुनाव में जीते, तो बीजेपी में राष्ट्रीय स्तर पर उनका कद बढ़ेगा. लेकिन, हार (अगर हुई) उनके राजनीतिक भविष्य पर ग्रहण लगा देगी.
जमशेदपुर पूर्वी सीट पर सबसे अधिक वोटर सामान्य जातियों के हैं. इनमें ब्राह्मणों की संख्या सबसे अधिक है.
यहां के वोटिंग पैटर्न पर जातीय गणित का प्रभाव पड़ता रहा है. यहां 64 हजार-ओबीसी, 27 हजार-एसटी, 24 हजार-एससी, 20 हजार-मुस्लिम, 24 हजार-पंजाबी, 13 हजार-ईसाई और 1 लाख 6 हजार सामान्य जातियों के मतदाता हैं.
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