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झारखंड: अपनी कर्मस्थली से ही पहला चुनाव हार गए थे शिबू सोरेन, 2019 में भी पार्टी कर रही संघर्ष

रांची। झारखंड का टुंडी विधानसभा क्षेत्र शिबू सोरेन की दुखती रग है। यहां वे अपने जीवन का पहला चुनाव हार गये थे। 1977 में उन्होंने टुंडी विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा था लेकिन बहुत बड़े अंतर से पिछड़ गये थे। शिबू सोरेन ने टुंडी से ही अपने राजनीतिक आंदोलनों की शुरुआत की थी। यहीं वे आदिवासियों के दिशोम गुरु बने थे। लेकिन यहां से विधायक नहीं बन पाये। शिबू सोरेन को आज भी इस बात की कसक रहती है उनकी कर्मभूमि टुंडी आखिर क्यों नहीं झामुमो का गढ़ बनी। 2019 में भी झामुमो यहां जीत के लिए संघर्ष ही कर रहा है। टुंडी में 16 दिसम्बर को वोट पड़ेंगे।

पहला ही चुनाव हार गये थे शिबू सोरेन

पहला ही चुनाव हार गये थे शिबू सोरेन

1977 के बिहार विधानसभा चुनाव में शिबू सोरेन पहली बार मैदान में कूदे थे। जनता पार्टी के सत्यनारायण दुधानी ने शिबू सोरेन को करीब 9 हजार वोटों से हरा दिया था। आदिवासियों के लिए खून-पसीना एक करने वाले शिबू सोरेन को जिंदगी भर इस हार का मलाल रहा। टुंडी के पोखरिया में उनका आश्रम था। इस आश्रम से ही वे महाजनी प्रथा के विरोध में आंदोलन चला रहे थे। धान काटो आंदोलन और बाहरी भगाओ आंदोलन के कारण वे आदिवासियों के सबसे बड़े नेता थे। लेकिन इसके बावजूद उनकी करारी हार हुई थी। उन्हें केवल 7 हजार 523 वोट ही मिले थे। इस हार से आहत शिबू ने धनबाद का इलाका ही छोड़ दिया। वे संथाल परगना के दुमका चले गये और वहीं अपनी राजनीतिक जमीन तैयार की। 2005 के चुनाव में मथुरा प्रसाद महतो ने झामुमो को ये सीट दिलायी थी। वे 2009 में भी जीते। लेकिन 2014 के विधानसभा चुनाव में झामुमो ने फिर ये सीट गंवा दी। आजसू के राजकिशोर महतो ने झामुमो के मथुरा प्रसाद महतो से ये सीट छीन ली। 2019 में इस सीट पर आजसू के राज किशोर महतो, भाजपा के विक्रम पांडेय, झामुमो के मथुरा प्रसाद महतो और झाविमो के डॉ. सबा अहमद के बीच मुकाबला है।

शिबू की कसक

शिबू की कसक

शिबू सोरेन का जन्म रामगढ़ (तब हजारीबाग) जिले के नेमरा गांव में हुआ था। लेकिन उन्होंने आदिवासियों के हक की लड़ाई के लिए धनबाद जिले के टुंडी में अपना डेरा जमाया था। उन्होंने महाजनी प्रथा के खिलाफ भूमिगत रह कर सशस्त्र आंदोलन छेड़ा था। उन्होंने 1976 में आत्मसमर्पण कर दिया था। 1977 में इमरजेंसी के बाद जब बिहार विधानसभा के चुनाव हुए तो शिबू सोरेन ने टुंडी से चुनाव लड़ा था। यहां से हार जाने के बाद उन्होंने फिर कभी टुंडी का रुख नहीं किया। 1980 के विधानसभा चुनाव में विनोद बिहारी महतो ने पहली बार झामुमो के लिए ये सीट जीती थी। उन्होंने कांग्रेस नौरंगदेव सिंह को हराया था। शिबू सोरेन, विनोद बिहारी महतो और कम्युनिस्ट नेता एके राय ने मिल कर 1972 में झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की थी। 1980 में शिबू सोरेन दुमका से सांसद बन गये थे। इसके बाद शिबू सोरेन ने टुंडी छोड़ कर दुमका को ही अपना घर बना लिया।

2019 में झामुमो की स्थिति

2019 में झामुमो की स्थिति

जिस विनोद बिहारी महतो ने झामुमो की स्थापना की थी उनके ही पुत्र राज किशोर महतो ने 2014 में टुंडी से उसको खूंटा उखाड़ दिया था। राजकिशोर महतो ने कांटे की लड़ाई में झामुमो के मथुरा प्रसाद महतो को सिर्फ 1126 मतों से हराया था। मथुरा प्रसाद महतो इस क्षेत्र के मजबूत कुड़मी ( झारखंड के कुर्मी) नेता हैं। राजकिशोर महतो भी इसी समुदाय से हैं और अपने पिता के नाम की वजह से उनका भी व्यापक जनाधार हैं। 2014 के चुनाव में डॉ. सबा अहमद ने झाविमो के टिकट पर चुनाव लड़ा था और 45 हजार से अधिक वोट लाकर तीसरे स्थान पर रहे थे। 2019 में वे एक बार फिर झाविमो उम्मीवार के रूप में चुनौती पेश कर रहे हैं। टुंडी विधानसभा क्षेत्र अल्पसंख्यक बहुल है। सबा अहमद यहां से राजद प्रत्याशी बन कर 2000 में चुनाव जीत चुके हैं। भाजपा ने गिरिडीह के पूर्व सांसद रवीन्द्र पांडेय के पुत्र विक्रम पांडेय को मैदान में उतारा है। कुल मिला कर इस बार टुंडी में राजकिशोर महतो, मथुरा प्रसाद महतो, डॉ. सबा अहमद और विक्रम पांडेय के बीच चतुष्कोणीय मुकाबले की स्थिति है।

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