क्या झारखंड की किस्मत में लिखी है खिचड़ी सरकार? अगर-मगर के बीच कौन होगा सत्ता का हकदार
नई दिल्ली। क्या झारखंड की किस्मत में केवल खिचड़ी सरकार ही लिखी है ? 2019 के एग्जिट पोल के मुताबिक एक बार फिर त्रिशंकु विधानसभा के संकेत मिल रहे हैं। कुछ सर्वे में किसी भी दल को बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है। एक सर्वे में झामुमो, कांग्रेस और राजद को 44 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। इन सभी सर्वे में एक बात कॉमन है कि इस बार भाजपा को 37 से कम सीटें मिलती हुई दिखायी गयी हैं। एग्जिट पोल के मुताबिक भाजपा के 65 पार का नारा दम तोड़ता दिख रहा है। 2014 में भाजपा और आजसू की स्थिर सरकार बनी थी जो पांच साल तक बेखटक चली। लेकिन 2019 में झारखंड एक बार फिर 2005 और 2009 की तरह ही अनिश्चितता के भंवर में घिरता दिख रहा है। वैसे भाजपा ने चुनाव बाद सर्वे के अनुमानों को नकार दिया है और अपनी सरकार बनने का दावा किया है। दूसरी तरफ झामुमो खेमे में उत्साह है। वैसे चुनाव का वास्तविक परिणाम 23 दिसम्बर को सामने आएगा जब मतों की गिनती पूरी हो जाएगी।

क्या कहते हैं सर्वे के संकेत ?
भाजपा बहुमत से दूर दिख रही है। उसे अधिकतम 36 सीटों तक ही दिखाया जा रहा है। दूसरी तरफ महागठबंधन को 38 से 50 सीटों के बीच रहने का अनुमान लगाया गया है। अगर महागठबंधन 38 सीटों पर ही ठहर जाता है तो फिर सरकार बनाने का दावा कौन करेगा ? बहुमत के लिए 41 का आंकड़ा चाहिए। यानी भाजपा हो या महागठबंधन, सरकार बनाने के लिए अन्य की जरूरत पड़ेगी। ‘अन्य' की यही जरूरत झारखंड की भावी सरकार को कमजोर और अस्थिर बनाएगी। अगर ऐसा हुआ तो यह प्रदेश एक बार फिर राजनीति अस्थिरता के दौर में दाखिल हो जाएगा। 2005 और 2009 की तरह एक बार फिर अवसरवादी राजनीति का बोलबाला हो जाएगा। ये ‘अन्य' अपनी शर्तों पर सरकार में शामिल होंगे और उसके बाद जो होगा उसका अंदाजा लगाया जा सकता है। क्या खंडित जनादेश झारखंड की नियति बन गयी है?

क्या बन सकती है भाजपा की सरकार ?
सर्वे के मुताबिक मान लिया जाय कि भाजपा को अगर अधिकतम 36 सीटें ही मिलती हैं तो वह क्या करेगी ? 2014 में भाजपा का आजसू से गठबंधन था। इस बार दोनों ने गठबंधन तोड़ कर चुनाव लड़ा है। चुनाव बाद अनुमानों में आजसू को 3 से 5 सीटें मिलती हुईं दिखायी गयी हैं। अगर आजसू को अधिकतम पांच सीटें मिलती हैं तो क्या वह भाजपा के साथ मिल कर सरकार बना सकता है ? दोनों मिल कर 41 का आंकड़ा छू सकते हैं। आजसू ने अपनी हैसियत दिखाने के लिए भाजपा से अलग चुनाव लड़ा है। अगर भाजपा को समर्थन देने की नौबत आयी तो आजसू इसकी बड़ी कीमत वसूल सकता है। हालांकि भाजपा ने आजसू प्रमुख सुदेश महतो के खिलाफ प्रत्याशी नहीं देकर दोस्ती की गुंजाइश बरकरार रखी है। भाजपा के दिग्गज नेता अमित शाह कह चुके हैं कि चुनाव बाद आजसू, भाजपा के साथ होगा। लेकिन ये परिस्थितियां तब पैदा होंगी जब भाजपा और आजसू के पास ये आंकड़ा होगा। सर्वे के अनुमान गलत भी साबित हो सकते हैं और ऐसी कोई नौबत ही न आये।

महागठबंधन की बनेगी सरकार ?
चुनाव बाद सर्वे में झामुमो की अगुवायी वाले महागठबंधन को 38 से 50 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। यानी महागठबंधन को बहुमत मिल भी सकता है और नहीं भी। महागठबंधन में झामुमो, कांग्रेस और राजद को अलग अलग कितनी सीटें मिलेंगी ये स्पष्ट नहीं है। लेकिन इसे भाजपा से बेहतर स्थिति में दिखाया गया है। अगर महागठबंधन भाजपा से आगे रह कर भी बहुमत से दूर रह गया तो क्या होगा ? जाहिर उसे भी दूसरों का सहरा लेना पड़ेगा। महागठबंधन के साथ कौन-कौन जा सकते हैं ? आजसू भाजपा का स्वभाविक साझीदार रहा है और वह पिछड़ों की राजनीति करता है। महागठबंधन में राजद पहले से पिछड़ों का पैरोकार है, इसलिए आजसू के समर्थन मिलने की आशा कम है। क्या बाबूलाल मरांडी समर्थन दे सकते हैं ? बाबूलाल के साथ नेतृत्व को लेकर परेशानी है। उन्हें हेमंत सोरेन को नेता मानने में परेशानी है। इसी परेशानी की वजह से झाविमो महागठबंधन में शामिल नहीं हुआ था। अगर बाबूलाल ने हेमंत की बजाय किसी और को सीएम बनाने की शर्त रख दी तो ये झामुमो को मंजूर नहीं होगा। तब महागठबंधन निर्दलीयों की तरफ रुख करेगा। अन्य को करीब चार सीटें मिलती हुई दिखायी गयी हैं। अब देखना है कि ये अन्य कौन होते हैं और वे किसके साथ जाना पसंद करेंगे।

झारखंड की राजनीति में कुछ भी संभव
झारखंड की राजनीति में असंभव भी संभव हुआ है। जब यहां खंडित जनादेश मिलता है तो अवसरवादी राजनीति पराकाष्ठा पर पहुंच जाती है। किसी निर्दलीय को मुख्यनंत्री बना कर 23 महीने तक सरकार चलाना झारखंड में ही मुमकिन था। 2006 में झामुमो ने अपने समर्थन से निर्दलीय मधु कोड़ा को मुख्यमंत्री बनाया था। निर्दलीय कोड़ा ने 23 महीने तक सरकार चला कर अपना नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज कराया था। देश कोई भी निर्दलीय विधायक इतने दिनों तक मुख्यमंत्री नहीं रहा। मधु कोड़ा की सरकार ने भ्रष्टाचार के भी नये-नये रिकॉर्ड बनाये थे। एक अचंभा और हुआ। झामुमो ने अपने कट्टर दुश्मन भाजपा के साथ सरकार बना कर सबको हैरान कर दिया था। 2009 के चुनाव में भी किसी दल को बहुमत नहीं मिला था। सरकार बनाने के लिए घनघोर जोड़तोड़ हुई थी। अंत में झामुमो ने भाजपा के समर्थन से सरकार बना कर सबको चौंका दिया था। भाजपा की मदद से शिबू सोरेन सीएम बने थे। पांच महीने में ये सरकार गिर गयी थी। भाजपा के समर्थन वापस लेने पर 31 मई 2010 को शिबू सोरेन ने इस्तीफा दे दिया था। नयी सरकार के लिए फिर गुणा-भाग शुरू हुआ। बात नहीं बनी तो राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा। कुछ दिनों के बाद भाजपा ने भी सत्ता के लिए लोकलाज छोड़ दी। झामुमो के सहयोग से सितम्बर 2010 में भाजपा के अर्जुन मुंडा सीएम बने। शिबू सोरेन की सरकार गिराने वाली भाजपा को झामुमो से समर्थन लेने में तनिक भी शर्म महसूस नहीं हुई। लोभ-लालच के आधार पर बनी अर्जुन मुंडा की सरकार भी जनवरी 2013 में गिर गयी।












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